परिवर्तन

मैं नहीं बनना चाहती
स्थिर, सुदृढ़ हिमालय जैसा
जिसे नही चाहिेए कोइ परिवर्तन
मैं नहीं चाहती
बर्फ सा ठंडापन
ठंडा शेषनाग झील सा
जो कभी तट के उपर
कभी ना बह सके
एक जगह ठहरी हुई जिंदगी
कैसे जी लेते हैं लोग
मुझे तो चाहिए, प्रवाह
असीमता , आकर्षक परिवर्तन
पता नहिं क्यों बढ़ रहा है
असुरक्षा का भाव हमारे मन में
तोड़ दो इस दीवार को
तोड़ दो इस बन्धन को
मुझे तो बस दे दो
परिवर्तन एक आकर्षक परिवर्तन

– कुमकुम झा

सुभाष चन्द्र

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