भारतीय बच्चे एडीएचडी की गिरफ्त में

दिल्ली । हाल ही में 2 से 10 वर्ष की आयु के बच्चों पर किए गए एक शोध के अनुसार भारत में मेट्रो शहरों के बच्चे अधिकांश समय गैजेटस के साथ बिताते हैं। साथ ही 45 प्रतिशत बच्चों को कुछ देर पहले पढ़ी हुई बातें याद नहीं रहती। इस बाबत डॉ. मुकेश बत्रा, संस्थापक एवं अध्यक्ष, डॉ. बत्राज ग्रुप ऑफ कंपनीज कहते हैं कि व्यग्रता, आवेग, अति-सक्रियता एवं एकाग्रता की कमी, अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) के संकेतक हैं, जो बचपन से शुरू होने वाली एक गंभीर समस्या है, जो वयस्क होने तक बनी रहती है। यदि इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो व्यक्ति के लिए दैनिक कार्यों को अमलीजामा पहनाना कठिन हो जाता हैै। ऐसे में जरूरी है कि माता-पिता बच्चों में यह लक्षणों को पहचानने और अति शीघ्र सही उपचार बच्चे को उपलब्ध कराएं। इस ओर होम्योपैथी में जड़ से मिटाने वाले बेहरीन इलाज उपलब्ध हैं, जिससे उनके बच्चों में आवेग और व्यग्रता में भी कमी आएगी। नतीजतन स्वाभिमान पुष्ट होगा। इसके अलावा शोध ये भी खुलासा करता है कि अभिवाभक उपचार के ऐसे विकल्पों की तलाश कर रहे हैं जिसका कोई दुष्प्रभाव नहीं हो, साथ ही जो बीमारी को जड़ से दूर करने में सक्षम हो और बच्चों पर सौम्य व प्रभावशाली हो। शोध के आंकड़े कहते हैं कि 93% माता-पिता (राष्ट्रीय) अपने बच्चे के इलाज के लिए होम्योपैथी को आजमाना चाहते हैं, जिनमें से 59% अभिभावक वर्तमान में इस पद्धति से उपचार करा रहे हैं। इसके अलावा, मुंबई और पुणे में 97ः अभिभावक अपने बच्चों के लिए होम्योपैथी को आजमाना चाहते हैं। इसी प्रकार, दिल्ली में 95% माता-पिता होम्योपैथी का चयन करने को इच्छुक हैं, जिनमें से 62% पहले से ही इसका लाभ उठा रहे हैं। साथ ही अहमदाबाद में 96%, कोलकाता में 94%, बेंगलुरु में 91%, हैदराबाद में 90% और चेन्नई में 84% माता-पिता भी उपचार के पसंदीदा विकल्प के तौर पर होम्योपैथी को आजमाना चाहते हैं।

दीप्ति अंगरीश

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