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कानून अपनी जगह , राजनीति अपनी जगह 

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मीडिया से रूबरू होते कहा है कि राहुल गांधी अयोध्या के राम मंदिर पर कांग्रेस का रूख साफ करें । जहां राहुल गांधी अपने आप को शिव भक्त और जनेऊधारी हिंदू बता रहे हैं , वहीं कोर्ट में कपिल सिब्बल राम मंदिर के निर्माण की बात सन् 2019 तक टालने के लिए जिरह कर रहे हैं । वे शिया वक्फ बोर्ड की ओर से अदालत में पेश हो रहे हैं ।
कपिल सिब्बल ने कहा है कि सारे दस्तावेज नहीं रखे गए । सात जजों की बैंच सुनवाई करे । अनुवाद करवाये गये दस्तावेज भी औपचारिक तरीके से जमा नहीं हुए । इन तर्कों को लेकर अमित शाह ने कांग्रेस पर निशाना साधा । वैसे भी आज बाबरी मस्जिद के विवाद को पच्चीस वर्ष बीत गये हैं । इस बाबरी मस्जिद के ढांचे को गिराने के आरोप में लालकृष्ण आडवाणी जी राष्ट्रपति बनते बनते रह गये । बडे पेचोखम हैं राजनीति के । बाबरी मस्जिद विवाद के चलते कई लोगों की किस्मत बनी और कई लोगों की किस्मत बिगड़ी। रथ पर सवार होकर हवा बनाई आडवाणी जी ने और सत्ता तक पहुंच गये मोदी जी । अपनी अपनी मेहनत है । अपनी अपनी किस्मत ।
शाह कहते रहे हैं कि राहुल गांधी मंदिरों में घूम रहे हैं जबकि सिब्बल सुनवाई टलवा रहे हैं । पहले यह साफ जान लीजिए कि कपिल सिब्बल वकील हैं और यह उनकी रोजी रोटी और पेट का सवाल है । वे वकालत नहीं करेंगे तो खाएंगे कहां से ? फिर आपके सुब्रह्मण्यम स्वामी कैसे कहा रहे हैं कि अगले वर्ष कैसे दीपावली पर राम मंदिर में दीपक जलायेंगे ? यह कैसा विश्वास ?  गुजरात के चुनाव के चलते ही राम मंदिर के निर्माण की चर्चा क्यों ? राम मंदिर को चुनाव के साथ क्यों जोड रहे हो ? चुनाव तो निकल जाने दो । फिर मंदिर भी बनवा लेना । फिर तो आप भी भूल जाते हो कि मंदिर भी बनवाना है । चुनाव एजेंडा न बनाइए । दिल से बनाइए । हम आपके साथ हैं । राम मंदिर में दीपक जलाने भी चलेंगे । बस , थोडा राजनीति छोड दीजिए ।
राहुल गांधी के जनेऊधारी होने , हिंदू होने पर बहुत होने चुका । अब जरा प्याज टमाटर के भाव भी देखिए । मंदिर तो वहीं बन जाएगा , जरा जनता की सुध लीजिये ।
बाबरी मस्जिद के विध्वंस की रजत जयंती हो गयी । मुगलों की निशानियों को मिटाने की कसमें भी हो गयीं लेकिन इतिहास को इतिहास रहने दीजिए । लालकिला वहीं रहेगा और ताजमहल भी । चित्तौड़गढ का भी स्तुतिगान किया । पद्मावती को याद किया । फिर वह भी इतिहास है तो यह भी इतिहास है । अपनी मर्जी का इतिहास न बनाइए । बस । इतनी विनती है ।
न समझोगे तो बहुरंगी संस्कृति कहां रहेगी ? गंगा-यमुना की तहजीब  कहां बचेगी ?
चाहे मंदिर मस्जिद ढा दे
पर इस दिल को न तोड़ना
इसमें रब्ब बसदा ए,,,,,
इसमें प्यार भरा दिल रहदा ए,,,,,
कमलेश भारतीय,वरिष्ठ पत्रकार 

सुभाष चन्द्र

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