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शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो

बाबा साहेब का कहना है कि इतिहास बताता है कि जहाँ नैतिकता और अर्थशास्त्र में संघर्ष होता है वहां जीत हमेशा अर्थशास्त्र की होती है। निहित स्वार्थों को स्वेच्छा से कभी नहीं छोड़ा गया है जब तक कि पर्याप्त बल लगाकर मजबूर ना किया गया हो। यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्मों के धर्मग्रंथों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए। जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता नहीं हासिल कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके किसी काम की नहीं।

सरफराज अहमद सिद्दीकी, एडवोकेट
डेलीगेट, दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी

बाबा साहेब डाॅ बीआर अम्बेडकर जी की महापरिनिर्वाण दिवस पर पर उन्हें स्मरण करने और श्रद्धांजलि अर्पित करने का सबसे सशक्त माध्यम यह है कि हमें उनके विचारों को आत्मसात करें। उनके बताए रास्तों पर चलें। बाबा साहेब का कहना है कि इतिहास बताता है कि जहाँ नैतिकता और अर्थशास्त्र में संघर्ष होता है वहां जीत हमेशा अर्थशास्त्र की होती है। निहित स्वार्थों को स्वेच्छा से कभी नहीं छोड़ा गया है जब तक कि पर्याप्त बल लगाकर मजबूर ना किया गया हो। यदि हम एक संयुक्त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते हैं तो सभी धर्मों के धर्मग्रंथों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए। जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता नहीं हासिल कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके किसी काम की नहीं।
इतना ही नहीं, वे यह भी कहा करते थे कि कानून और व्यवस्था राजनीतिक शरीर की दवा है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़े तो दवा जरूर दी जानी चाहिए। मनुष्य नश्वर है। उसी तरह विचार भी नश्वर हैं । एक विचार को प्रचार-प्रसार की जरूरत है जैसे एक पौधे में पानी की जरूरत की जरूरत होती है। अन्यथा दोनों मुरझा जायेंगे और मर जायेंगे। एक सफल क्रांति के लिए सिर्फ असंतोष का होना काफी नहीं है। जिसकी आवश्यकता है वो है राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों के महत्व, जरुरत व न्याय में पूर्णतया गहराई से दोष। उनका कहना था कि राजनीतिक अत्याचार, सामाजिक अत्याचार की तुलना में कुछ भी नहीं है और एक सुधारक जो समाज को खारिज कर देता है वो सरकार को खारिज कर देने वाले राजनीतिज्ञ से ज्यादा साहसी हैं। हर व्यक्ति जो मिल का सिद्धांत जानता हो कि एक देश दूसरे देश पर राज करने में फिट नहीं है, उसे ये भी स्वीकार करना चाहिये कि एक वर्ग दुसरे वर्ग पर राज करने में फिट नहीं है। लोग और उनके धर्मय सामाजिक नैतिकता के आधार पर सामाजिक मानकों द्वारा परखे जाने चाहिए. अगर धर्म को लोगों के भले के लिये आवश्यक वस्तु मान लिया जायेगा तो और किसी मानक का मतलब नहीं होगा। आज भारतीय दो अलग -अलग विचारधाराओं द्वारा शाशित शोषित हो रहे हैं। उनके राजनीतिक आदर्श जो संविधान के प्रस्तावना में इंगित हैं वो स्वतंत्रता , समानता , और भाई -चारे को स्थापित करते हैं। और उनके धर्म में समाहित सामाजिक आदर्श इससे इनकार करते हैं।
सागर में मिलकर अपनी पहचान खो देने वाली पानी की एक बूँद के विपरीत , इंसान जिस समाज में रहता है वहां अपनी पहचान नहीं खोता। इंसान का जीवन स्वतंत्र है। वो सिर्फ समाज के विकास के लिए नहीं पैदा हुआ है , बल्कि स्वयं के विकास के लिए भी पैदा हुआ है। भारतीय संविधान के निर्माता , सामाजिक समरसता के प्रेरक व एक प्रकार से भारत में सामाजिक क्रांति के संवाहक भारतरत्न डा.भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को महू मध्यप्रदेश में हुआ था। इनके पिता रामजी सकपाल व माता भीमाबाई धर्मप्रेमी दम्पति थे। अम्बेडकर का जन्म महार जाति में हुआ था। जो उस समय अस्पृश्य मानी जाती थी। इस कारण उन्हें कदम – कदम पर असमानता और अपमान सहना पड़ता था। सामाजिक समता,सामाजिक न्याय,सामाजिक अभिसरण जैसे समाज परिवर्तन के मुददांे को प्रधानता दिलाने वाले विचारवान नेता थे डा. अंबेडकर। जिस समय उनका जन्म हुआ तथा उनकी शिक्षा दीक्षा का प्रारम्भ हुआ उस समय समाज मंे इतनी भयंकर असमानता थी कि जिस विद्यालय में वे पढ़ने जाते थे वहां पर अस्पृश्य बच्चों को एकदम अलग बैठाया जाता था तथा उन पर विद्यालयो के अध्यापक भी कतई ध्यान नहीं देते थे। नहीं उन्हें कोई सहायता दी जाती थी। उनको कक्षा के अंदर बैठने तक की अनुमति नहीं होती थी साथ ही प्यास लगने पर कोई ऊंची जाति का व्यक्ति ऊंचाई से उनके हाथंों पर पानी डालता था क्योंकि उस समय मान्यता थी कि ऐसा करने से पानी और पात्र दोनों अपवित्र हो जाते थे। एक बार वे बैलगाड़ी में बैठ गये तो उन्हें धक्का देकर उतार दिया गया । वह संस्कृत पढ़ना चाहते थे लेकिन कोई पढ़ाने को तैयार नहीं हुआ। एक बार वर्षा में वे एक घर की दीवार से लांधकर बौछार से स्वयं को बचाने लगे तो मकान मालिक ने उन्हें कीचड़ में धकेल दिया था। इतनी महान कठिनाईयों को झेलने के बाद डा. अम्बेडकर ने अपनी शिक्षा पूरी की। गरीबी के कारण उनकी अधिकांश पढ़ाई मिटटी के तेल की ढिबरी में हुई । 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास करके बंबई विवि मेें प्रवेश लिया जिसके बाद उनके समाज में प्रसन्नता की लहर दौड़ गयी। 1923 में वे लंदन से बैरिस्टर की उपाधि लेकर भारत वापस आये और वकालत शुरू की। वे पहले ऐसे अस्पृश्य व्यक्ति बन गये जिन्होनें भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी उच्च शिक्षा ग्रहण करने में सफलता प्राप्त की। उस समय वे भारत के सबसे अधिक पढ़े – लिखे तथा विद्वान नेता थे। 1941 से 1945 के बीच उन्होंनेे अत्यधिक संख्या मंे विवादास्पद पुस्तकंे लिखीं और पर्चे प्रकाशित किये। जिसमंे थाट आफ पाकिस्तान भी शामिल है। यह डा. अम्बेडकर ही थे जिन्होनें मुस्लिम लीग द्वारा की जा रही अलग पाकिस्तान की मांग की कड़ी आलोचना व विरोध किया। उन्होनें मुस्लिम महिला समाज में व्याप्त दमनकारी पर्दा प्रथा की भी निंदा की। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वे रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रममंत्री के रूप में भी कार्यरत रहे। भीमराव को विधिमंत्री भी बनाया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्होनें संविधान निर्माण में महती भूमिका अदा की। 2 अगस्त 1947 को अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नये संविधान की रचना के लिये बनी संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया । संविधान निर्माण के कार्य को कड़ी मेहनत व लगन के साथ पूरा किया और सहयोगियों से सम्मान प्राप्त किया। उन्हीं के प्रयासंों के चलते समाज के पिछड़ें व कमजोर तबकों के लिये आरक्षण व्यवस्था लागू की गयी लेकिन कुछ शर्तो के साथ। लेकिन आज के तथाकथित राजनैतिक दल इसका लाभ उठाकर अपनी राजनीति को गलत तरीके से चमकाने में लगे हैं। संविधान में छुआछूत को दण्डनीय अपराध घोषित होने के बाद भी उसकी बुराई समाज में बहुत गहराई तक जमी हुई थी। जिससे दुखी होकर उन्होनें हिंदू धर्म छोड़ने और बौद्धधर्म को ग्रहण करने का निर्णय लिया।
यह जानकारी होते ही अनेक मुस्लिम और ईसाई नेता तरह- तरह के प्रलोभनों के साथ उनके पास पहुंचने लगे। लेकिन उन्हेंे लगा कि इन लोगों के पास जाने का मतलब देशद्रोह है। अतः विजयदशमी (14 अक्टूबर 1956) को नागपुर में अपनी पत्नी तथा हजारों अनुयायियों के साथ भारत में जन्में बौद्धमत को स्वीकार कर लिया। वह भारत तथा हिंदू समाज पर उनका एक महान उपकार है। एक प्रकार से डा. अंबेडकर एक महान भारतीय विधिवेत्ता बहुजन राजनैतिक नेता बौद्ध पुनरूत्थानवादी होने के साथ- साथ भारतीय संविधन के प्रमुख वास्तुकार भी थे। उन्हें बाबा साहेब के लोकप्रिय नाम से भी जाना जाता है। बाबाजी का पूरा जीवन हिंदू धर्म की चतुवर्ण प्रणाली और भारतीय समाज में सर्वव्याप्त जाति व्यवस्था के विरूद्ध संधर्ष में बीता। बाबासाहेब को उनके महान कार्यो कें लिए भारतरत्न से भी सम्मानित किया गया। समाज में सामाजिक समरसता के लिए पूरा जीवन लगाने वाले बाबासाहेब का छह दिसम्बर 1956 को देहावसान हो गया। डा. अम्बेडकर को अनेकानेक विभूतियों से नवाजा गया। डा. अम्बेडकर आधुनिक भारत के निर्माता कहे गये। उन्हें संविधान का निर्माता , शोषित , मजदूर, महिलाओं का मसीहा बताया गया।एक प्रकार से वे महान मानवाधिकारी क्रांतिकारी नेता भी थे। पिछड़ों व वंंिचत समाज के सबसे प्रतिभाशाली मानव थे । डा. अम्बडेकर भारत सशक्तीकरण के प्रतीक बने। आजाद भारत में वे भारत के प्रथम कानून मंत्री तो बने लेकिन उनकी तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी से कभी पटारी नहीं बैठ पायी। उनमें सभी प्रकार के गुण विद्यमान हो गये जो किसी बिरले में ही होते हैं। वह विश्व स्तर के विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, समाजशास्त्री, मानवविज्ञानी, संविधानविद, लेखक, दार्शनिक इतिहासकार, आंदोलनकारी थे। अमेरिका में कोलम्बिया विवि के 100 टाप विद्वानो में उनका नाम था। उन्होनें पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी धाक जमा दी थी। बाबासाहेब ने 1920 में मूकनायक, 1927 में बहिष्कृत भारत,1930 में जनता, 1956 मंे जनता का ही रूपान्तरित प्रबुद्ध भारत जैसेा चार समाचारपत्र भी चलाये थे। उन्होनंे समाचारपत्रीय लेखन का प्ररम्भ अंग्रेजी में ”बाम्बे क्रानिकल“ से किया था। 1924 से बाबासहेब ने अस्पृश्य आंदोलन प्रारम्भ किया। उनके आंदोलन को वैचारिक आधार देने वाला समाचारपत्र मूकनायक था। इस समाचारपत्र मंे उनके 14 लेख प्रकाशित हुुए।
वर्तमान समय में भारत की पूरी राजनीति बाबा साहेब के इर्दगिर्द ही धम रही है। देश व प्रदेश के सभी राजनैतिक संगठन बाबासाहेब को भुनने के लिए जुट गये हैं।यही कारण की आज प्रदेश के सभी राजनैतिक दल व संगठन उनकी जसयंती के अवसर पर कई कार्यक्रमांे, संगोष्ठियों का आयोजन कर रहे हैं। आज दलित और पिछड़े समाज के लोगांें को समर्थ बनाने के लिए प्रेरित करने मंे भी डा. अंबेडकर की ही महान भूमिका थी। इस वर्ष भी बाबासाहेब की जयंती पूरे धूमधाम व उत्साह के साथ सभी सत्ता प्रतिष्ठानों की ओर से मनायी जा रही है। डा. अम्बेडकर किसी एक जाति व दल के नेता नहीं अपितु पूरे भारत के महान नेता के रूप में याद किये जा रहे है।⁠⁠⁠⁠

 

टीम डिजिटल

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