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सधे शब्दों में कविता की तेज धार

कमलेश भारतीय

भारतीय ज्ञानपीठ की नवलेखन को पुरस्कृत करने की महती योजना के अंतर्गत घनश्याम कुमार देवांश के काव्य संग्रह : “आकाश में देह” को पुरस्कार मिला । नयी प्रतिभा का सम्मान । निशांत ने फ्लैप पर सही लिखा कि सधे हुए शब्दों में अपनी बात बडे आराम से रखने वाले कवि हैं देवांश । इसकी रचनात्मकता पाठक को अचरज से भर देती है ।
इस संग्रह की कविताओं का पाठ और रसास्वादन करते हुए इतना जोड सकता हूं कि ये कविताएं बहुत गहरे तक घाव करती हैं । सचमुच अचरज हुआ और भारतीय ज्ञानपीठ के चयन पर खुशी । सबसे खूबसूरत रचना :

: बच्चे का अंश देखिए
बच्चे
जितनी जल्दी जागने लगते हैं
अपने सपनों से
उतनी ही जल्दी हो जाते हैं
सयाने ।
इसी तरह की मारक कविता है : मछुआरे
और मछुआरे गंगा में डूबे
साध रहे थे मछलियां
उनके चेहरों पर एक पवित्र मुस्कान थी
,,,,,,
मैं हैरान था मछलियां मारने के काम में
इतनी पवित्रता देखकर ,,,
शोषण करने वालों पर कितने सधे और नये ढंग से प्रहार कर रहे हैं युवा कवि देवांश । इसी प्रकार की मार शोषण की दुनिया पर सभ्यता और चूहे कविता में भी महसूस होती हैं जब वे कहते हैं :
मैं मनुष्य को चूहों में बदलते देख रहा हूं
,,,,
वे आदमी की शक्ल में चूहे हैं
जो चूहों को मारकर खा जाते हैं ।
कविता क्या कर सकती है या कविता क्यों लिखी जानी चाहिए ? कवि कर्म आखिर है क्या ? यह भी देवांश बिल्कुल स्पष्ट जानते हैं । उन्हें मालूम है कविता लेखन के मायने साफ साफ । तभी तो लिखते हैं :
लेकिन यही एक काम हैं
जिसे करते हुए
सबसे जरूरी कामों की सत्ता को
चुनौती दे पाता हूं
चिढा पाता हूं उन लोगों को
जो अक्सर बताते हैं कि
सबसे जरूरी काम
स्थगित नहीं किए जा सकते ।
व्यवस्था और भ्रष्टाचार पर चोट करती है कविता : घुन
मैं जब तक घुन नहीं देख लेता
मुझे अनाज के अनाज होने पर
भरोसा नहीं होता
खत्म हो जाएंगे घुन
एक इतने बडे देश से उनका खत्म होना
क्या खबर भी नहीं बनेगा ?
देवांश ने बेरोजगारी, प्रेम और लेखन पुरस्कार जैसी शाम परे भी कविताएं लिखी हैं । कवि के रूप में उनकी चिंताओं में पेड भी शामिल हैं तो रोहित बेम्युला भी । महानगर में एक पैसे से कैसे जिया जाता हैंं और दवा बेरोजगारी में क्या और कैसे लगती हैंं । देवांश लिखते हैं कि
प्यार में यह जरूरी नहीं कि
मैं जो कुछ कहूं
वह तुम समझ ही लो ,,,,
अखबार परे बहुत अच्छी टिप्पणी :
और अखबार की खबरें
देखो भाई
वक्त काटना कोई गुनाह तो नहीं ।
एक एक पंडित बहुत गहरे अर्थ खोलती है । शब्दों का सही चयन किया है। अपनी बात कहने के लिए । एक प्रकार से ये चेतावनी है कवि की ओर से :
डरो
लेकिन ईश्वर से नहीं
एक हारे हुए मनुष्य से
सूर्य से नहीं
आकाश की नदी में
पडे मृत्यु चंद्रमा से ।
सचमुच देवांश की कविताओं में पाठक को अचरज से भरने का सामर्थ्य है । एक युवा कविता कितनी बारीकी से शब्दों का उपयोग करता है यह देखने वाली बात है और सीखने वाली भी । भारतीय ज्ञानपीठ के चयन को ये कविताएं सही साबित करती हैं ।

आकाश में देह : घनश्याम कुमार देवांश के संग्रह की समीक्षा

समीक्ष्य पुस्तक : आकाश में देह
कवि : घनश्याम कुमार देवांश ।
प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ, 18 , इंस्टीट्यूशनल एरिया , लोदी रोड , नयी दिल्ली -110003
पृष्ठ : 132 , मूल्य : 230 रूपये ।

दीप्ति अंगरीश

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