साहित्य

नई दिल्ली। महान उद्घोषक अमीन सयानी ने अंग्रेजी उद्घोषणा से अपने कॅरियर की शुरूआत की थी लेकिन जब वह आकाशवाणी के हिन्दी प्रभाग के लिए आडिशन देने गये तो उनसे कहा गया कि उनके उच्चारण में अंग्रेजी और गुजराती का आभास आता है। मगर अमीन सयानी उन लोगों में से नहीं थे जो हतोत्साहित हो
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नवीन जोशी ‘नवल’ सो गया साहित्य तो कवि क्या कहे, खो गयी यदि कलम तो कैसे सहे ? रो रही है लेखनी, कागज भरा है आंसुओं से , दुख रहे हैं नेत्र उसके पश्चिमी तम के धुओं से ! अजिर वंशज भानु के, पथ मांगते हैं उड्गनों से , चाह है नव-पल्लवों की तमस-युत ऊसर
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मैत्री को संबंध का बंधन रूप न देना बस यूँ ही इक दूजे के दिल में संबद्धता से रहना। क्योंकि संबंध तो होता है बंधन से स्थापित जो हो सकता कभी भी विस्थापित संबंध में दिखती जो सार्वभौमिकता नहीं होती भाव भूमि में वास्तविकता संम्पूर्णता में जब होता एकाकीपन तभी स्मृति में आते अपने मित्रगण
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नई दिल्‍ली। जब व्यक्ति अपनी जरूरतों को पूरा कर लेता है। आर्थिक रूप से सक्षम हो जाता है, तो उसके लिए सामाजिक और सांस्कृतिक दायित्वों का निर्वहन करना आसान होता है। यह कहना है मशहूर उद्योगपति माधव बी श्रीराम का। शंकर-शाद मुशायरा के संदर्भ में आयोजित प्रेसवार्ता में उन्होंने कहा कि हमारे परिवार ने जिस
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क्यों और कैसे कहूं कि मेरा कोई घर नहीं मायका का वह घर आज भी तो रह तकता है मेरा अनवरत। बाल्यकाल से यौवन तक कई नादानियां औ अठखेलियां की हैं मैंने साक्षी है आज भी वहाँ की मिट्टी मेरे घर से बाहर जाने से आने तक पिता और भाई की पेशानी पर उभरी गहन
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जंगल में तालाब के किनारे एक बबूल का पेड़ था। उसमें लगे पीले फूल अपनी खूशबू चारों और फैला रहे थे। उस दिन आसमान में चारों तरफ काले बादल छाए थे। ठंडी-ठंडी हवा भी चल रही थी। मौसम बड़ा सुहावना था। जंगल में बारिश होने की उम्मीद थी और सभी जानवर अपने घरों को लौट
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हिंदी साहित्यजगत के चर्चित आलोचक नामवर सिंह ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के अलावा दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में लंबे अरसे तक अध्यापन कार्य किया था। बीएचयू से हिंदी साहित्य में एमए और पीएचडी की डिग्री हासिल करने वाले नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य जगत में आलोचना को नया मुकाम दिया। दीप्ति 
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  शतशत नमन उन शूरवीरों को। शहादत की कीमत चुकानी तो पडे़गी। आज सुबह भी वो जागी थी अरूणोदय की लाली से विरहणी की चूड़ी खनकी थी प्रीत मिलन की खुशहाली से। दो दिन ही तो शेष रहा था छुट्टी में तुम घर आओगे। मन के अरमां उछल रहे थे पता नहीं क्या क्या लाओगे।
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शहादत को सम्मानित कर अमरत्व का उद् घोष करने वालों बस एक पल बस एक पल ठहरो शरीर जल गया पर धरा पर हैं उनकी सिसकती अर्धांगिनी बिखरे सपने के संग बिलखते गुमसुम मासूम के मर्म स्पर्शी भावों को आह्लादित करने की सोचो शहीद की चिता के संग ही क्यों जल जा रही भावना क्यों
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धन्य धन्य हे भारत मां जहां ब्रह्मा विष्णु शिव की गाथायें गायी जाती हैं । ऐसे हम देश में रहते हैं जहां गायें पूजी जाती हैं ।। पेड़ों को साक्षी देव मानकर पेड़ भी सींचे जाते हैं । ये देश है मेरा भारत यहां पत्थर पूजे जाते हैं ।। है स्वाभिमान इस धरती में यह
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