प्रमुख सुर्खियाँ :

साहित्य

नई दिल्ली।  वे बेकार थे और सडकों से अधिक दफ्तरों के चक्कर लगाते थे । भूखे थे और घर से पैसे आने बंद थे । एक होटल में पहुंचे और आवाज लगाई- मस्तराम को बुलाओ । मस्तराम हाजिर हुआ । वहां काउंटर पर सब्जियों से भरे पतीले रखे थे और वे सुबह से भूखे थे
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नई दिल्ली। वह दिन और दिनों जैसा ही था । अब दुर्घटना की याद हो आने पर वही दिन एक उदास दिन के रूप में याद आता है । मैं अपने काम में मगन था कि एकाएक छोटे भाई ने आकर सूचना क्या दी कि जैसे कोई वजनी पत्थर सिर पर दे मारा हो -विक्की
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नई दिल्ली। राहत इंदौरी का एक शेर है, बुज़ुर्ग कहते थे एक वक़्त आएगा जिस दिन, जहाँ पे डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा…बात गहरी है, क्योंकि एक परिवार, पीढ़ियों दर पीढ़ी आगे बढ़ता है. घर के बुजुर्गों से लेकर नवजात बच्चे तक, हम सभी रिश्तों की एक ऐसी डोर में बंधे होते हैं, जिसका धागा
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नई दिल्ली। हम सब शब्दों के जादूगर हैं । किसी भलेमानस ने कहा था और मैंने विश्वास नहीं किया था । अब मैं कह रहा हूं और आपको भी विश्वास नहीं आ रहा होगा । पहली बार हम किसी बात पर विश्वास करते भी नहीं । फिर शब्दों की जादूगरी का दावा लेखक ही क्यों
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नई दिल्ली। इस लॉकडाउन की दुनिया के कारण सभी का जीवन चुनौतीपूर्ण और कठिन हो गया है। इसमें सभी संभावनाएं हैं, कोई भी इंसान इसके प्रभाव से अछूता नहीं है। हम आज ऐसी परिस्थितियों में जीने के लिए मजबूर है जिन्हें हमने पहले कभी अनुभव नहीं किया है, इसने हम सभी को जीवन के वास्तविक
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– अशेष (आचार्य चन्द्रशेखर शास्त्री) हे मानव! तुम शक्तिपुंज हो….! अन्तस् में छिपी है ऊर्जा असीम तुमसे जगमगा सकता है संसार! तुममें है वह शक्ति अपार! यह न कहानी है न चमत्कार! केवल तुम्हें जागना है फिर देखना महिमा अपरंपार!! शक्ति को छिपना ही होता है जन्मजन्मांतर के छल प्रपंच! होते हैं सञ्चित मानस में
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– संजीव राय इतिहास से विलुप्त पुराण से निर्वासित हम लौट रहे हैं इन्द्रप्रस्थ से हमने अपने नाखून से खोदे जलाशय बैल का जुआठ गले में बांध कर, अरावली में चलाया हल, अपनी पीठ को बनाकर हेंगा, विंध्य में उपजाया अन्न हम बनाते रहे सेना के लिए रथ, राजा के लिए सुरंग , मंत्री के
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तपन झा जिंदा रहे तो फिर से आयेंगे बाबू तुम्हारे शहरों को आबाद करने । वहीं मिलेंगे गगन चुंबी इमारतों के नीचे प्लास्टिक के तिरपाल से ढकी झुग्गियों में । चौराहों पर अपने औजारों के साथ फैक्ट्रियों से निकलते काले धुंए जैसे होटलों और ढाबों पर खाना बनाते । बर्तनो को धोते हर गली हर
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नोबेल शांति पुरस्‍कार से सम्‍मानित विश्व प्रसिद्ध बाल अधिकार कार्यकर्ता श्री कैलाश सत्‍यार्थी लॉकडाउन से बेरोजगार हुए प्रवासी मजदूरों और उनके बच्चों को लेकर चिंतित हैं। उनकी मदद के लिए व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास के साथ-साथ वे इसके लिए लगातार सरकार और कोरपोरेट जगत के लोगों से बातचीत कर रहे हैं। पिछले दिनों अपने गांवों
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कोटि-कोटि जगमग दीपों में, एक दीप मेरा भी अर्पण ।। पश्चिम जनित दुष्ट कोरोना, भरतभूमि पर नहीं टिकेगा। महाप्रलय भी ठहर न पाये, इसको भी इतिहास लिखेगा। कर्मवीर कर रहे लोकहित, शोणित की हर बूंद समर्पण।। एक दीप मेरा भी अर्पण..!! आये चाहे रिपुदल बल से, चाहे राष्ट्रद्रोह के छल से । धैर्य-शील अनुशासन के
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