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हार को नियति क्यों माना कांग्रेस ने ?

नई दिल्ली। Congress के सिर पर ठीकरा फूट रहा है बिहार में महागठबंधन की हार का । यह कहा जा रहा है कि यदि राजग के तेजस्वी ने सत्तर सीटें कांग्रेस के खाते में न दी होतीं तो निश्चिततौर पर तेजस्वी मुख्यमंत्री बन गये होते ।

हर राज्य में कांग्रेस अछूत होती जा रही है

वैसे यही आरोप यूपी में हार के बाद समाजवादी पार्टी की ओर से भी लगाये गये थे और चुनाव परिणाम के बाद गठबंधन टूट गया था । फिर अगले विधानसभा चुनाव मे तो मायावती और अखिलेश ने कांग्रेस को गठबंधन में रखने लायक भी नहीं समझा था । बेशक हार उनके गठबंधन को भी मिली लेकिन कांग्रेस को जो फजीहत झेलनी पड़ी उसका क्या ? हर राज्य में कांग्रेस अछूत होती जा रही है । दिव्ली में चुनाव के समय अरविंद केजरीवाल ने समझौते के लिए कोशिश की रेकिन सिरे नहीं चढ़ी और घाटे में कौन रहा ? कांग्रेस ही । एक भी सीट नहीं मिली ।

कांग्रेस को तो होश भी नहीं

अभी पश्चिमी बंगाल  में विधानसभा चुनाव आने वाले हैं । वहां भी कांग्रेस की कोई अहमियत होगी, कहा नहीं जा सकता । सीधा सीधा मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और भाजपा मे होने का रहा है । दोनों तैयारियों में भी जुटे हैं । कांग्रेस को तो होश भी नहीं । इधर बिहार चुनाव परिणाम के बाद वरिष्ठ नेता व वकील कपिल सिब्बल ने कांग्रेस नेतृत्व पर निशाना साधते कहा है कि क्या हार को कांग्रेस और हाईकमान ने अपनी नियति मान लिया है ?

 

कांग्रेस नेतृत्व ने चुप्पी साध रखी है

इस हार से कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में उफान आ गया है । दूसरी ओर कांग्रेस नेतृत्व ने चुप्पी साध रखी है । बिहार में हार के बाद कांग्रेस नेतृत्व चुप क्यों है ? उन्होंने इसी बहाने फिर से कांग्रेस अध्यक्ष और कार्यकारिणी समिति के चुनाव करवाए जाने की चर्चा छेड़ दी । एक नेता ने समर्थन करते कहा कि कांग्रेस और पार्टी में लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए कुछ कर गुजरने का यह सही समय है । पी चिदम्बरम् के बेटे ने भी कपिल सिब्बल के इंटरव्यू को शेयर करते कहा है कि यह आत्म चिंतन और विचार मंथन का समय है और कोई बड़ा कदम उठाने का भी । यह सुखबुगाहटें क्या कहती हैं ? कांग्रेस हाईकमान को इन्हें समय रहते सुनना चाहिए । नहीं तो देर न हो जाए कहीं देर न हो जाए ।


कमलेश भारतीय, वरिष्ठ पत्रकार 

टीम डिजिटल

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