कांग्रेस की नई टीम कितना टक्कर दे पाएगी शिवराज को ?

भोपाल। भारतीय जनता पार्टी की मध्य प्रदेश इकाई में बदलाव के बाद कांग्रेस में भी परिवर्तन हुआ है. पार्टी नेतृत्व ने गुरुवार को प्रदेश इकाई की कमान महाकौशल से आने वाले अपने वरिष्ठ सांसद कमलनाथ को सौंप दी. साथ ही चुनाव अभियान समिति की कमान ज्योतिरादित्य सिंधिया काे दे दी गई. इसके साथ तमाम आंचलिक समीकरणों को साधते हुए चार नेताओं- बाला बच्चन, जीतू पटवारी, रामनिवास रावत और सुरेंद्र चौधरी को कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाया गया है.
प्रदेश कांग्रेस में बदलाव की यह प्रक्रिया काफ़ी समय से लंबित थी. लगभग साल-डेढ़ साल से. इसके साथ ही यह भी तय ही था कि इस बार कांग्रेस संगठन और चुनावी जिम्मेदारियां कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच ही बंटेगीं. इसीलिए राज्य के सियासी गलियारों में ज़्यादा चर्चा इस बात की है कि काफ़ी देर से हुआ यह बदलाव क्या क़रीब-क़रीब ढह चुके कांग्रेस के संगठन में जान फूंक सकेगा. क्या यह पार्टी के ज़मीनी कार्यकर्ताओं को इतनी ऊर्जा दे सकेगा कि वे अपेक्षाकृत अधिक संगठित और शक्ति-संपन्न भाजपा से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार हो जाएं?
मध्य प्रदेश की सियासत के जानकारों की मानें तो प्रदेश कांग्रेस में हुए इस बदलाव से पार्टी का ज़्यादा भला हो पाएगा इसकी बहुत उम्मीद नहीं की जा सकती. चर्चित अखबार दैनिक भास्कर के भोपाल संस्करण के संपादक विजयमनोहर तिवारी सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘मध्य प्रदेश कांग्रेस में बदलाव की ख़बर वैसी ही है जैसे ‘शेर आया, शेर आया’ की कहानी. साल भर पहले तक ऐसी संभावना बनने की ख़बर आती थी तो लोगों के कान खड़े होते थे. लेकिन अब जबकि देर आयद वाले अंदाज़ में यह संभावना सच हुई है तो लोगों को (कार्यकर्ता) सचेत होने में, नए नेतृत्व और परिस्थितियों के हिसाब से ढलने में थोड़ा वक़्त तो लगेगा ही. वे जब तक सचेत होंगे समय और निकल जाएगा.’ विजय आगे कहते हैं, ‘पार्टी को प्रदेश नेतृत्व में परिवर्तन की प्रक्रिया काफ़ी पहले पूरी कर लेनी थी. ख़ास तौर पर इस तथ्य को देखते हुए कि पार्टी 15 साल से प्रदेश की सत्ता से बाहर है. अब उसका संगठन चरमरा चुका है. वित्तीय हालत ख़राब है. इसका सबूत ख़ुद पार्टी ही दे चुकी है जब उसने चुनाव में टिकट मांगने वालों से 50-50 हजार रुपए जमा कराने को कहा था. हालांकि विवाद होने पर बाद में यह प्रस्ताव वापस ले लिया गया. लेकिन इससे पार्टी का सूरते-हाल तो सामने आ ही गया. इस सूरत को बदलने के लिए नए नेतृत्व को वक़्त मिलना चाहिए था जो अब नहीं मिल पाएगा.’
राजधानी के एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार शिवअनुराग पटैरया दूसरे अहम पहलू की तरफ ध्यान दिलाते हैं. वे कहते हैं, ‘विधानसभा चुनाव में अब सिर्फ़ छह महीने ही बचे हैं. लेकिन इस समय तक भी पार्टी के नेता और नीतियां अलग-अलग दिशा का रुख़ करते दिख रहे हैं. उदाहरण के तौर पर पार्टी अध्यक्ष (अब निवर्तमान) अरुण यादव और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह पांच अप्रैल से न्याय यात्रा निकाल रहे थे. पार्टी के नए-नए राज्य सभा सदस्य राजमणि पटेल अपनी अलग संविधान यात्रा निकाल रहे हैं. किसान कांग्रेस के दिनेश गुर्जर कलश यात्रा निकाल रहे हैं.’ वे आगे कहते हैं, ‘यात्राओं के क्रम में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह 3,000 किलोमीटर की नर्मदा यात्रा कर चुके हैं. अब वे भी सियासी यात्रा पर निकलना चाह रहे हैं. उन्होंने खुद यह घोषणा की है. नर्मदा यात्रा के दौरान वे विधानसभा की क़रीब 110 सीटों से गुजरे थे. अब राजनीतिक यात्रा के दौरान 160 से अधिक उन विधानसभा क्षेत्रों (राज्य में 230 विधानससभा सीटें हैं) में जाना चाहते हैं जिन पर भाजपा का कब्जा है. इसका मतलब साफ़ है कि दिग्विजय अब भी प्रदेश की राजनीति से अपना मोह छोड़ नहीं पाए हैं. साथ ही वे पार्टी की संभावनाओं को भी प्रभावित करने की मंशा रखते हैं ताकि भविष्य में अगर सत्ता में वापसी हो तो उनकी राय और भूमिका अहम रहे.’
यानी प्रदेश कांग्रेस के जो हालात हैं उनमें नए नेतृत्व को पहले तो बहुत कम समय में चौतरफ़ा चुनौतियों का हल ढूंढना होगा. फिर वह चुनावी तैयारी की मुहिम शुरू कर पाएगा. शिवअनुराग कहते हैं, ‘लेकिन भाजपा उस वक़्त तक कांग्रेस से कहीं आगे निकल चुकी होगी. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि कमलनाथ और सिंधिया की जोड़ी कैसे पार्टी संगठन में नई जान फूंकती है और उसे चुनावी पायदानों पर कितनी ऊपर ले जाती है.’ हालांकि बहुत से लोगों को इस पर संदेह है कि इस बदलाव से भी बेजान दिखती कांग्रेस का कुछ हो पाएगा. वरिष्ठ पत्रकार गिरीश उपाध्याय कहते हैं, ‘कांग्रेस में हर नेता की अपनी ढपली अपना राग है. पिछले साल मंदसौर गोलीकांड के बाद जब ज्योतिरादित्य ने भोपाल में सत्याग्रह किया था तो उस वक़्त दिग्विजय सिंह कह रहे थे- सिंधिया के नेतृत्व में हम सब (कांग्रेसी) एक हैं. मगर अभी नर्मदा यात्रा के समापन के बाद उन्होंने खुले तौर पर पार्टी की प्रदेश इकाई की कमान कमलनाथ को सौंपे जाने का समर्थन किया.’
ऐसे ही कमलनाथ पहले कह रहे थे कि पार्टी अगर सिंधिया को चुनाव में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाती है तो इसमें उनका पूरा समर्थन होगा. लेकिन इंदौर में अभी हाल में ही वे इसी मसले से जुड़े सवाल पर कह गए, ‘पार्टी को चेहरे की नहीं चेहरों की ज़रूरत है.’ गिरीश उपाध्याय कहते हैं, ‘जाहिर है दिग्विजय के समर्थन से उन्हें संबल मिला है और उनके सुर बदले हैं. इससे ऐसा लगता है कि प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेताओं के लिए एक-दूसरे का भरोसा जीत पाना ही मुश्किल हो रहा है. फिर वे जनता का भरोसा कैसे जीत पाएंगे वह भी इतने कम समय में. यह देखने वाली बात होगी.’
कुल मिलाकर राजनीति के जानकार प्रदेश कांग्रेस के ये हाल देखकर इस बात पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं कि पार्टी इस बार भी संगठित और आक्रामक भाजपा का मुकाबला कर सकेगी. उनके मुताबिक मतभेद भाजपा में भी दिखे हैं लेकिन वहां नेतृत्व ने समय रहते उनका हल निकाल लिया है. उसने शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र सिंह तोमर की पुरानी परखी हुई जोड़ी के नेतृत्व में ही इस बार भी प्रदेश के चुनाव में उतरने का फैसला किया है. राकेश सिंह जैसे व्यक्ति को प्रदेश इकाई की कमान सौंपकर भाजपा ने नेतृत्व के मुद्दे पर उभर सकने वाले किसी असंतोष की संभावना को भी कुंद कर दिया है. हमेशा चुनावी मोड में रहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी प्रदेश पर पूरी नजर रखे हुए हैं. वे यहां लगातार सक्रियता बढ़ा रहे हैं. जबकि कांग्रेस अब तक इसी आशा में दिखती है कि भाजपा को राज्य में 15 साल हो गए हैं. लिहाज़ा सत्ताविरोधी स्वाभाविक रुझान का फ़ायदा उसे ही मिलेगा क्योंकि राज्य में उसके अलावा कोई विकल्प नहीं है.
हालांकि प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी और पूर्व महासचिव माणक अग्रवाल जैसे नेता पार्टी से जुड़ी इन तमाम आशंकाओं को ख़ारिज़ करते हैं. सत्याग्रह से बातचीत में दोनों का कहना था कि उनके नेताओं के बीच न भरोसे की कमी है न ही पार्टी की रीति-नीति में कोई भ्रम है. उनके मुताबिक पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने उचित समय पर उपयुक्त फैसला लिया है और उसे मानते हुए प्रदेश के सभी नेता पार्टी की सत्ता में वापसी के लिए मिलकर मेहनत करेंगे.’ लेकिन स्वाभाविक सवाल तो फिर भी अपनी जगह है. वह यह कि चुनावी तैयारी के लिहाज़ से काफ़ी पिछड़ चुकी कांग्रेस के क्या सिर्फ़ मान लेने भर से या आख़िरी मौके पर मिलकर की जाने वाली कथित मेहनत मात्र से क्या वह प्रदेश की सत्ता में वापसी कर पाएगी?

साभार

टीम डिजिटल

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