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कोरोना काल में नारी को पुरुष की तुलना में अधिक आर्थिक नुकसान हुआ

नई दिल्ली।  नारी उत्थान व नारी के सर्वांगीण विकास के लिए हमारा देश काफी सजग है। विगत कुछ वर्षों से इस हेतु सामाजिक नीतियों के अंतर्गत कई नए आयामों को स्थापित किया गया है तथा हमारा समाज इस दिशा में निरंतर आगे भी बढ़ रहा है। ‌अब चाहे वह नारी शिक्षा हो या नारी के विकास से संबंधित समाज में प्रचलित कुछ अवधारणाओं का विषय हो।

परंतु अब समय आ गया है जब भारतीय अर्थव्यवस्था के वार्षिक जीडीपी के अंतर्गत पुरुष और नारी के तुलनात्मक आर्थिक योगदान पर एक सार्थक चर्चा प्रारंभ हो। इसे हेतु सरकारी नीतियों व सामाजिक रचना में एक परिवर्तन की आवश्यकता है जिसके तहत भारतीय नारी को अधिक से अधिक उद्यमिता के प्रति जोड़ा जाए।

वर्तमान समय में चल रही कोरोना महामारी ने समाज पर बहुत बड़े आर्थिक दुष्प्रभाव भी डाले हैं। कई रिपोर्ट्स के आंकड़े यह बताते हैं कि समाज में कितने व्यक्ति विगत पांच छह माह के दौरान आर्थिक रूप से प्रभावित हुए हैं। निजी क्षेत्र व असंगठित क्षेत्र के अंतर्गत एक बहुत बड़ी संख्या में रोजगार का नुकसान हुआ है तथा प्रति व्यक्ति आय में भी कमी हुई है।

 

 

परंतु यहां पर यह हैरानी वाली बात है कि इस अवधि में एक कार्यशील नारी को पुरुष की तुलना अधिक आर्थिक नुकसान हुआ है। एक रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक तुलनात्मक रूप में लगभग 4% अधिक महिलाओं ने पुरुषों से लॉकडाउन के बाद अपने रोजगार को खोया है वहीं पर पुरुषों की तुलना में लगभग 5% से अधिक महिलाओं के वेतन में कमी हुई है। यह तथ्य वुमन एंपावरमेंट को निश्चित रूप से प्रभावित करता है।

 

भविष्य में अगर इस सोच को बदलना है तो समाज के अंतर्गत खुद नारी को यह सोचना होगा कि उसे कार्यशील होने के लिए अब खुद के किसी उद्यमिता या स्टार्टअप का चुनाव करना होगा। यह अत्यंत कठिन नहीं है सिर्फ इसके लिए एक सोच को विकसित करना है। उद्यमिता की सफलता में जोखिम पुरुष व महिला में समान रूप से है।
परंतु इसके लिए भारत की शिक्षा प्रणाली में तकनीकी व मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के अंतर्गत महिला उद्यमिता पर एक नए विजन के साथ कार्य किया जाए तथा इसके साथ साथ अभिभावक जो अपनी बच्चियों को यह शिक्षा देने में सक्षम है वह अपनी बच्चियों को यह सपना भी दिखाएं कि इस शिक्षा के बाद उन्हें उद्यमिता की तरफ ही जाना है।

जैसा कि यह सर्वविदित है कि आज उद्यमिता या स्टार्टअप की दुनिया में सफलता के लिए इनोवेटिव आईडिया सबसे जरूरी है। यह आइडिया छोटे वित्तीय स्वरूप के साथ भी शुरू किया जा सकता है तथा इसमें सफलता मिलने के बाद उसका विस्तार किया जा सकता है।

दूसरी बात यह है कि आज सोशल मीडिया का इतना विस्तार हो चुका है तथा आज के समय की शिक्षित नारी लगभग सभी सोशल मीडिया के स्वरूपों के संचालन से अवगत है। चाहे वह फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब या इंस्टाग्राम हो। इन माध्यमों के द्वारा अपने व्यापार या उद्यमिता के स्वरूप को ब्रांड बनाया जा सकता है।

आने वाले भविष्य में अगर हमारे भारतीय समाज के अंतर्गत इस नयी सोच का विकास होता है तो हमारी सामाजिक संरचना में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आएगा। क्योंकि यह सर्वविदित है कि एक शिक्षित व कार्यशील नारी अपने परिवार को एक भिन्न स्वरूप देती है जिसके अंतर्गत वित्तीय सफलता व वित्तीय सुरक्षा तो होती ही है इसके साथ साथ परिवार की आने वाली पीढ़ी तुलनात्मक रूप से ज्यादा विचारवान व सुरक्षित भी होती है।

 


डॉ पी एस वोहरा, शिक्षाविद, प्रखर चिंतक व लेखक

टीम डिजिटल

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