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क्या ‘अन्याय’ सिर्फ ‘निर्भया’ के साथ हुआ ?

कुमारी मीनू

‘निर्भया’ को 7 साल, 4 महीना और तीन दिन के बाद आखिरकार इंसाफ मिल ही गया। इतने दिनों की जो लंबी लड़ाई, निर्भया के माता-पिता, उनके वकील, पूरे भारत ने लड़ी आखिरकार वह रंग लाई। 20 मार्च की सुबह साढ़े पांच बजे ‘निर्भया’ के दोषियों को फांसी की सजा मिलने के बाद भारत ने चैन की सांस ली। लगातार मीडिया में चर्चाओं का दौर भी जारी रहा। चारों ओर मिठाई बांटी गई। लेकिन इन सब चीजों में हम एक पक्ष को भूल गए। वह है दोषियों का परिवार। मीडिया द्वारा चर्चाओं में कोई ऐसा शब्द सुनने को नहीं मिला जो दोषियों के परिवारों को बातों से हीं सही ढ़ाढ़ास बंधा सकता। फांसी तो हो चुकी थी फिर भी किसी के लिए दो शब्द नहीं निकले। जैसे गुनाह दोषियों के परिवारजनों ने किया हो।
बलात्कार के इस मामले में फांसी की सजा मिलने के बाद जहां, समाज में एक ओर न्याय की आशा जगी है वहीं दूसरी ओर समाज में एक सीख भी गई। यहां पर हम इन बातों को आंकड़ों के साथ नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से समझने का प्रयास करेंगे।
हम पहले बात करते हैं ‘निर्भया’ की। डाॅक्टर बनने का सपना देखनेवाली ‘ज्योति सिंह’ उर्फ ‘निर्भया’ और उसके परिवार के सपने को ‘हवस के दरिंदा’ ने 16 दिसंबर 2012 की सर्द रात में तोड़ दिया। हवस के वे दरिंदे जिन्हें सही-गलत में कोई अंतर ही पता नहीं चला। सभी सामूहिक रूप से जानवर बन गए। जानवर नहीं अगर ‘पिशाच’ कहें तो सही होगा। कुछ क्षणों के शारीरिक सुख के कारण उन्होंने ऐसा कुकृत्य किया कि एक माता-पिता ने अपनी बेटी, भाई ने अपनी बहन, देश ने एक भावी डाॅक्टर को खो दिया। हालांकि इस क्षणिक सुख का खामियाजां उन्हें भी उठाना पड़ा और उनको अपने जान से हाथ धोना पड़ा। अगर उस समय बलात्कार और हत्या के मामले में शामिल 6 दोषीयों में से किसी में भी थोड़ी सी मानवता होती तो आज तस्वीर कुछ और हंी होती।
इन 6 दोषियों में से एक ने तो पहले ही अपने आप को अपराध के लिए सजा दे दी। वहीं एक अपराधी को नाबालिग होने के कारण छोड़ दिया गया था जो संभवतः सही नहीं कहा जा सकता है। जब कोई नाबालिग बलात्कार जैसा घृणित कार्य करने की सोच रख सकता है तो उसके मानसिक स्तर की कल्पना की जा सकती है। वैसी स्थिति में उसे सजा न देकर सुधारने की प्रक्रिया चलाना ‘निर्भया’ को मिले इंसाफ में कमी खटकती है। निर्भया को न्याय दिलाने के लिए उसके माता-पिता ने जी-जान लगा दी थी। वहीं मीडिया भी संभवतः पहली बार बलात्कार की इस घटना के साथ इतनी मुखर रूप से जुड़ी थी। आखिरकार 7 साल चली लंबी लड़ाई के बाद ‘निर्भया’ को इंसाफ मिला। देश की जनता का भारत की न्याय व्यवस्था पर विश्वास मजबूत हुआ। लोगों को अब लगने लगा है कि न्याय में भले ही देरी हो लेकिन न्याय अवश्य होगा।
अब हम इसी मामले के दूसरे पक्ष यानि दोषियों के परिवारजनों की बात करते हैं। निर्भया के साथ हुई दरिदंगी के बाद हम सबकुछ भूल गए। याद रही तो सिर्फ निर्भया, निर्भया के इंसाफ के लिए बुलंद आवाज। यह याद रखना स्वाभाविक भी था क्योंकि यह भारतीय इतिहास में शायद बलात्कार का पहला मामला होगा जो मीडिया के सामने इस रूप में आई थी। प्रतिदिन झंकझोरनेवाली चीजें सामने आ रही थी। चारों तरफ इंसाफ को पाने के स्वर बुलंद थे।
लेकिन इस ये कैसे भूल सकते हैं कि इस घटना के गुनाहगारों ने अपनी सजा तो पा ली लेकिन उनके परिवारजनों को किस गुनाह की सजा मिली। मां, पत्नी, बच्चा, पिता, भाई ने आखिर ऐसा क्या अपराध किया था कि यह सब हुआ। सभी के परिवारों पर पहाड़ टूट पड़ा। मीडिया को अपनों को खोने का दुख इनसे भी पूछना चाहिए। उन्होंने अपनों को तो खो दिया लेकिन उन्हें दो बोल ढ़ाढ़स के भी ना बंधाए जाए तो फिर इंसानियत किस काम की। दोषियों को सजा की दरकार थी सो मिल गई लेकिन अपनों को खोने का दर्द, आंसू, घुटन उन्हें भी होगी।
दोषियों के परिवारजनों ने इन सात सालों में कितनी जिल्लतों को झेला होगा और उन्हें पूरी जिंदगी यह झेलना पड़ेगा। उनके साथ समाज ऐसा बर्ताव करता होगा जैसे बलात्कार जैसे कुकृत्य के लिए इन्होंने स्वयं ही दोषियों को भेजा हैं और ये इसके दोषी हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। इस घटना के बाद उन्हें हमेशा तिरस्कार के शब्द सुनने को मिलते होंगे। जब इस कुकृत्य की खबर उनतक पहुंची होगी तो उनके मन में भी ‘निर्भया’ के लिए संवेदना रही होगी। ‘निर्भया’ के साथ इस कृकृत्य के लिए उनलोगों ने भी दोषियों को खड़ी-खोटी सुनाई होगी लेकिन उनके अपनों को ऐसी सजा मिले इसकी उन्होंने सोचा नहीं होगा। उनके अपने बच जाए यह सपना भी उनका टूट गया। आखिरकार 20 मार्च 2020 को दोषियों को उनके अपराधों की सजा मिल गई। इस दिन को ‘ निर्भया न्याय दिवस’ के रूप में मनाने की बात कही गई।
भारतीय न्याय प्रक्रिया की कछुआ चाल को देखते हुए ‘न्याय’ भी ‘अन्याय’ सा लगने लगता है। अगर चारों दोषियों की यही अंतिम स्थिति होनी थी ‘न्याय’ की यह प्रक्रिया जल्दी समाप्त हो जानी चाहिए थी। क्योंकि इस न्याय की देरी में सभी पक्ष पीसते रहे हैं। निर्भया की मां जो अपने बेटी को इंसाफ दिलाने के लिए 7 साल का लंबा संघर्ष किया। वहीं दोषियों के परिवारजन जो पिछले 7 सालों से अपने को बचाने के लिए बैचेन रहें। उनके संघर्ष को भी कम नहीं कहा जा सकता। अगर यह सजा पहले ही हो जाती तो दोनों पक्षों के 7 साल के घाव भरते तो नहीं अब तक धीरे-धीरे कम हो जाते। यह सही कहा भी जाता है कि एक का न्याय दूसरे के लिए अन्याय बनता है।

टीम डिजिटल

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