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बच्चों को दोष न दें, समाज को बच्चों के विकास की जिम्मेदारी लेनी चाहिए

नई दिल्ली। “हर बच्चा या विद्यार्थी एक अलग आकार की बोतल और एक अलग ढक्कन के समान है।जब वे अंत में सीखने में नाकाम रहते हैं तो उसका दोषी उन्हें नहीं बल्कि शिक्षकों और समाज को माना जाना चाहिए, जो ढक्कन को खोलने और बोतल के भीतर कुछ भरने में विफल रहे।” आईएफएफआई 51 इंडियन पैनोरमा नॉन फीचर फिल्म, जादू के निर्देशक शूरवीर त्यागी ने यह संदेश दिया। वह 20 जनवरी, 2021 को पणजी, गोवा में 51वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के दौरान एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।

जादू एक बहुआयामी फिल्म है, जो बच्चों की दुनिया, उनकी भावनाओं और सोच का चित्रण करती है। इसमें दिखाया गया है कि एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत दो छोटी बालिकाओं त्विषा और भक्ति के बीच किस तरह से दोस्ती होती है, जब उन्हें कक्षा से बेदखल करके समान परिस्थितियों में धकेल दिया जाता है।

निर्देशक के अनुसार, अभिभावकों और शिक्षकों की तुलना में समाज बच्चों को एक आकार देने में ज्यादा अहम भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा, “शिक्षा और ज्ञान हासिल करने के अलावा, ऐसी कई बातें हैं जो एक बच्चे के मन में स्थापित किए जाने की जरूरत है। व्यापक संदर्भ में, इसकी पूरी जिम्मेदारी समाज की है। इसके साथ ही, यह भी हकीकत है कि अभिभावक ही बच्चों के पहले शिक्षक हैं। उन्हें बच्चों की आंतरिक दुनिया को समझने में सक्षम होना चाहिए। बच्चों को समझाने के लिए हमें उन्हें क्या बताने की कोशिश कर रहे हैं, उसके लिए हमें पहले उस स्तर और उनके हृदय के अंतःकरण तक पहुंचने की जरूरत है। इसके लिए, हमें उनकी भाषा समझने की जरूरत है।”

निर्देशक ने कहा कि इसीलिए दादा और दादी की भूमिका अहम होती है। निर्देशक बच्चों के लिए थिएटर और अभिनय की कार्यशालाएं चलाते हैं। उन्होंने कहा, “कहा जाता है कि जब एक बुजुर्ग व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो एक हजारों पुस्तकों का एक पुस्तकालय जल जाता है। बच्चे को आकार देने में दादा-दादी अपार ज्ञान के साथ अहम भूमिका निभाते हैं। हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने और पीढ़ियों के बीच की दूरी कम किए जाने की जरूरत है। जब पुरानी और नई पीढ़ियों के बीच एक जुड़ाव होता है तो अच्छे मूल्य अपने आप ही पहुंच जाते हैं।”

त्यागी ने कोविड-19 के दौरान भी इस महोत्सव के आयोजन के लिए आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा, “जब हम फिल्में बनाते हैं तो जब तक फिल्म दर्शकों तक नहीं पहुंचती है तब तक चक्र पूरा नहीं होता है। मैं महामारी के बीच फिल्म महोत्सव के आयोजन के माध्यम से इस चक्र को पूरा करने के लिए आईएफएफआई और डीएफएफ द्वारा किए जा रहे प्रयासों को लेकर आभार प्रकट करता हूं।”

जादू के बारे में

त्विषी और भक्ति एक दूरदराज के गांव के स्कूल में पढ़ती हैं। हर दिन किसी न किसी वजह से उन्हें सजा मिलती है और उन्हें उनकी कक्षाओं से बाहर निकाल दिया जाता है। जहां छोटी त्विषा गरम मिजाज और उर्जा से भरपूर है, वहीं बड़ी भक्ति शांत और शर्मीली है। इन अंतर के बावजूद, धीरे-धीरे उनमें दोस्ती हो जाती है। स्कूल के बाहर, भक्ति जंगल के भीतर किसी स्थान पर छोटी सी गुप्त जगह पर घूमने गई; जल्द ही त्विषा भी उसके साथ जुड़ गई और दोनों धैर्य के साथ किसी जादू के सामने आने का इंतजार करने लगीं।

 

टीम डिजिटल

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