मेटास्टैटिक कैंसर के ऑपरेशन के बाद बेहतर होगा रोगी: डाॅ एमडी रे


नई दिल्ली / टीम डिजिटल।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स के वरिष्ठ कैंसर सर्जन डाॅ एमडी रे ने कहा कि कैंसर के आॅपरेशन से कई रोगियों केा बेहतर किया जा सकता है। अब तक कई प्रकार की कैंसर के आपरेशन से उतनी बेहतर रिकवरी नहीं हो पाती थी। लेकिन, हाल के दिनों में कई रिसर्च हुए हैं, जिसके बाद मेटास्टैटिक कैंसर के ऑपरेशन के बाद कीमोथेरेपी आदि करने से बेहतर परिणाम आए हैं। उन्होंने कहा कि पेट की गुहार में कैंसर आपरेशन और कीमोथेरेपी से बेहतर और सकारात्मक परिणाम आए हैं।
डाॅ एमडी रे दिल्ली कैंट के आर्मी बेस हाॅस्पिटल में एक कार्यक्रम के दौरान अपना विचार रख रहे थे। इस दौरान उन्हें सम्मानित भी किया गया। बता दें कि मेटास्टेटिक कैंसर उसे कहते हैं जब कैंसर सेल्स जहां गठन होता है यानी प्राइमरी स्पॉट से अलग हो जाती हैं और लिम्फ सिस्टम या ब्लड के जरिए अन्य हिस्सों में फैल जाती हैं।
कैंसर सेल्स शरीर के अन्य हिस्सों में ट्यूमर बनाती हैं, जिन्हें मेटास्टेटिक ट्यूमर के रूप में जाना जाता है। मेटास्टेटिक एक गंभीर स्टेज है क्योंकि इसका मतलब है कि कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में फैल सकता है। मेटास्टेटिक कैंसर के प्राइमरी रूप के समान होता है। जैसे यदि ब्रेस्ट कैंसर फेफड़ों में फैलता है, तो इसे मेटास्टेटिक ब्रेस्ट कैंसर कहा जाएगा लंग्स कैंसर नहीं। मेटास्टेटिक कैंसर का उपचार स्टेज IV ब्रेस्ट कैंसर की तरह किया जाएगा।
ट्यूमर के फटने के बाद खून के जरिए यह कैंसर पूरे शरीर में फैलकर सबसे पहले हड्डियों को अपना शिकार बनाता है। इसके बाद यह कैंसर फेफड़ों, लिवर और दिमाग में फैलता है। इसके बाद यह ट्यूमर गर्भाशय, मूत्राशय, बड़ी आंत और ब्रेन बोन की तरफ बढ़ता है। इस कैंसर के सबसे आम लक्षणों में शामिल हैं हड्डियों में दर्द, उनका टूटना, मल-मूत्र पर कंट्रोल खोना, हाथ और पैरों में कमज़ोरी आना, खून में कैल्शियम की मात्रा बढ़ जाने की वजह से चक्कर, उलटी और दस्त होना।

एम्स के कैंसर सेंटर के आंकोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. एमडी रे ने नाभि से नीचे के अंगों के कैंसर की सर्जरी की तकनीक विकसित की है। मरीजों के इलाज में इसके परिणाम बेहतर पाए गए हैं, इसलिए एम्स के इस शोध को दुनिया में पहचान मिली है।  डॉ. एमडी रे ने कहा कि नाभि से नीचे के अंगों में कैंसर होने पर सर्जरी तो हो जाती है, लेकिन पुरानी तकनीक से सर्जरी के बाद मरीजों को परेशानी होने लगती है। जांघ के बीच के हिस्से पर कैंसर से पीड़ित 65 से 80 फीसद मरीजों की सर्जरी के आसपास की त्वचा गलने लगती थी। उन्होंने इस नई तकनीक को रिवर फ्लो इंसिशनल तकनीक (टू पार्लल कर्वीलिनियर इंसिशन) नाम दिया है। इससे कैंसर के 75 मरीजों की 105 सर्जरी हुई। इस तकनीक में सर्जरी के दौरान मरीज को इस तरह चीरा लगाया जाता है, जिससे सर्जरी की जगह की आसपास की त्वचा की नसों को नुकसान नहीं पहुंचता है और रक्त संचार ठीक बना रहता है। इस तकनीक से जनवरी 2012 से सितंबर 2016 के बीच नाभि से जांच के बीच के अंगों के कैंसर के 75 मरीजों की 105 सर्जरी हो चुकी हैं।

एडमिन

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