प्रकाश की गुणवत्ता आंखों की रोशनी को करती है प्रभावित

59 प्रतिशत व्यस्क इस बात से सहमत हैं कि प्रकाश गुणवत्ता उनकी नजर पर असर डालती है, पांच लोगों में से केवल एक (21 प्रतिशत) ही अपनी आंखों के लिए आरामदायक रोशनी को चुनेगा। खरीद निर्णय लेते समय आधे भारतीय अपनी आंखों के आराम के बजाये बल्ब की कीमत (48 प्रतिशत) और टिकाऊपन (48 प्रतिशत) पर ध्यान देते हैं। लगभग आधे भारतीय (44 प्रतिशत) नियमित तौर पर अपनी आंखों की जांच नहीं करवाते हैं, आईकेयर को वजन और फिटनेस स्तर नियंत्रण तथा त्वचा देखभाल जैसा महत्वपूर्ण नहीं माना जाता।

नई दिल्ली। फिलिप्स लाइटिंग के ताजा अध्ययन में यह बात सामने आई है कि लगभग दो तिहाई भारतीय यह मानते हैं कि खराब प्रकाश गुणवत्ता आंखों की रोशनी को प्रभावित करते हैं लेकिन वास्तव में केवल 21 प्रतिशत लोग ही अपनी आंखों के लिए सहज लाइट बल्ब खरीदने जैसा सुधारात्मक कदम उठाते हैं। सर्वेक्षण में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि, अधिकांश भारतीयों के लिए आंखों की देखभाल स्किनकेयर और अन्य स्वास्थ्य मुद्दों जैसे किसी व्यक्ति द्वारा वजन और फिटनेस स्तर को बनाए रखने जितना महत्वपूर्ण नहीं है। फिलिप्स लाइटिंग इंडिया के उपाध्यक्ष और प्रबंध निदेशक सुमित जोशी ने कहा कि गुणवत्तापूर्ण प्रकाश न केवल दीर्घायु से संबंधित है, बल्कि यह अविश्वसनीय रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है जब हमारी आंखों को तनावमुक्त रखने को सुनिश्चित करने और आरामदायक महसूस कराने की बात आती है।’ ‘महत्वपूर्ण रूप से लोगों को उच्च गुणवत्ता वाले लैम्प का चुनाव करना चाहिए जो उनकी आंखों के लिए सहज हैं। यह मौलिक है जिस पर हमारी वैज्ञानिकों की टीम बिना थके गुणवत्तापूर्ण और इंडस्ट्री में अग्रणी लैम्प का विकास करने में जुटे हैं, जिसे उपभोक्ता पसंद करें और जो आखों के लिए सहज हों।’
यह अध्ययन भारत समेत 12 देशों में 9000 व्यस्कों के बीच किया गया, जिसमें यह भी पता चला कि लगभग दो तिहाई भारतीय असुविधाजनक आरोपित मानसिकता के साथ यह जानते हैं कि खराब रोशनी गुणवत्ता आँखों की रोशनी को प्रभावित करती है लेकिन केवल 21 प्रतिशत ही वास्तव में उनकी आंखों के लिए आरामदायक बल्ब खरीदने जैसा सही कदम उठा रहे हैं। इस सर्वेक्षण में यह भी पता चला है कि अधिकांश भारतीयों द्वारा आंखों की देखरेख को स्किनकेयर और अन्य स्वास्थ्य मुद्दे जैसे वजन और फिटनेस स्तर को नियंत्रित करने के बराबरा नहीं माना जाता है।
नेत्र रोग विशेषज्ञ इस स्थिति की गंभीरता को समझते हैं और आम जनता को उनकी आंखों की देखभाल के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए हर कदम उठा रहे हैं। ऑल इंडिया ऑप्थैल्मोलॉजी सोसाएटी के अध्यक्ष और कमल नेत्रालय, बेंगलुरु के डा. केएस संथन गोपल, एमडी (एम्स), एफआरसीएस (एडिन), एफआरसीऑप्थ (ब्रिटेन), ने कहा कि, ‘यहां जनता को आंखों की देखभाल के प्रति लगातार शिक्षित करने की जरूरत है। समाज के प्रति हमारी प्रतिबद्धता के हिस्से के रूप में बड़े पैमाने पर इस मुद्दे पर जागरूकता बढ़ाने के लिए, ऑल इंडिया ऑप्थैल्मोलॉजी ने जनता के बीच नेत्र शिक्षा को बढ़ाने के लिए सक्रियता से सामुदायिक आधारित कार्यक्रम, दिशा-निर्देश और संसाधन विकसित किए हैं। हम मरीजों की भुगतान क्षमता पर ध्यान दिए बगैर सभी के लिए उच्च गुणवत्ता वाली आंख देखभाल तक पहुंच सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं। इस लक्ष्य की दिशा में, हमारी सभी 20000 सदस्य भारतीयों की दृष्टि को बचाने और पुनः लौटाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं।’
असल में, हमारी जिंदगी में डिजिटल प्रौद्योगिकी के बढ़ते उपयोग को देखते हुए यह स्थिति खतरनाक है, जिसने स्क्रीन को देखने के समय में इजाफा किया है, सर्वेक्षण में लगभग 70 प्रतिशत भारतीयों ने यह माना है कि वह एक दिन में 6 घंटे से अधिक समय स्क्रीन के सामने बिताते हैं और इतने ही लोगों ने आंखों में तनाव की शिकायत की है। यह परिणाम ऐसे समय आए हैं जब दुनियाभर में निकट दृष्टि दोष रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा व्यक्त अनुमान कि 2050 तक प्रत्येक दो में से एक व्यक्ति अदूरदर्शिता से ग्रसित होगा के साथ, भविष्य में नहीं बल्कि तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है।

दीप्ति अंगरीश

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