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बाजार से सीधे जुड़ेंगे किसान

सॉफ्ट ड्रिंक्स में दो फीसदी फलों का रस मिलाने की प्रधानमंत्री की सलाह के बाद किसानों को लाभ होने वाला है। हालांकि इसे पूरी तरह से लागू करने में अभी कंपनियों को छूट भी देनी पड़ेगी। 

मानवेंद्र

सॉफ्ट ड्रिंक्स में दो फीसदी फलों का रस मिलाने की प्रधानमंत्री की सलाह के बाद किसानों को लाभ होने वाला है। हालांकि इसे पूरी तरह से लागू करने में अभी कंपनियों को छूट भी देनी पड़ेगी। कंपनियों को इससे उसे अपने लागत पर ज्यादा खर्च करना पड़ेगा वहीं सॉफ्ट ड्रिंक्स का एक्सपायरी डेट भी कम हो जाएगा। सरकार के इस पहल से यह तो तय है कि खेती में कांट्रेक्ट फार्मिंग को बढ़ावा मिलेगा। जहां सॉफ्ट ड्रिंक्स के रोजगार से करीब डेढ़ लाख लोग जुड़ें हैं जिसमें किसानों के साथ जुड़ने से यह क्षेत्र और भी बढ़ा हो जाएगा। प्रधानमंत्री के इस पहल से किसान नकदी फसल की ओर ज्यादा आकर्षित होंगे।

कितना बड़ा है यह बाजार

50 बिलियन रुपए का बाजार है सॉफ्ट ड्रिंक्स का। जो प्रत्येक साल 6-7 प्रतिशत विकसित हो रहा है। भारतीय बाजार में कोका कोला की 58 फीसदी हिस्सेदारी है जबकि पेप्सिको की हिस्सेदारी 38 फीसदी है। साफ है कि करीब 95 फीसदी पर इन दोनों कंपनियों कब्जा है। सॉफ्ट ड्रिंक्स इंडस्ट्री में करीब 1,25,000 लोग रोजगार पाते हैं। कोका कोला और पेप्सी की 64 कारखाने है पूरे भारत में। कोका कोला डेयरी प्रॉडक्स में उतरने को तैयार तो अमूल एनर्जी ड्रिंक्स में हाथ आजमा रही। सॉफ्ट ड्रिंक्स की लोकप्रिय ब्रांड कोका कोला,पेप्सी,स्प्राइट, थम्सअप, लिमका,फंटा और माजा। डाबर के अलग अलग डिब्बाबंद और कई स्वादों में उपलब्ध उत्पाद का सालाना कारोबार 400 करोड़ रुपए से ज्यादा का है। नेस्ले, रसना, कैडबरी, पार्ले एग्रो सहित कई कंपनियां सॉफ्ट ड्रिंक्स इंडस्ट्री में। पेप्सिको और कोका कोला का भारत में साझा बाजार 11 हजार करोड़ रुपए सालाना का है। वहीं पैकेज्ड जूस और स्पोर्ट्स ड्रिंक का बाजार 22 हजार करोड़ रुपए का।

व्यावसायिक प्रोत्साहन आवश्यक

केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती किसानों को व्यावसायिक बनने के लिए प्रोत्साहित करना है। कुछ प्रदेशों के किसान व्यावसायिक खेती की महत्ता को अच्छी तरह समझ रहे हैं और वे इससे जुड़ी खेती कर भी कर रहे हैं, लेकिन ज्यादातर प्रदेशों में आज भी परंपरागत खेती होती है। सरकार लगातार इस कोशिश में लगी है कि किसी भी तरह किसानों की माली हालत में सुधार किया जाए। इसके लिए उसने कई तरह की योजनाओं की घोषणा की है, जिसमें फसल बीमा योजना अहम है। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एयरेटेड ड्रिंक्स कंपनियों से आग्रह किया है कि वे अपने पेय पदार्थों में दो फीसदी फलों का रस मिलाएं, जिससे किसानों द्वारा उपजाए जाने उत्पादों को आसानी से बाजार मिल सके।

वैसे जिस प्रकार से प्रधानमंत्री ने कहा, उससे कंपनियों को कई तरह की दिक्कत आ सकती है। मसलन, क्या यह फैसला सरकारी कानून के खिलाफ नहीं होगा, क्या ट्रेडमार्क फॉर्मूले की मान्यता रह जाएगी? ऐसे कई सवाल हैं, जिसका जवाब आसानी से नहीं मिल रहा है।

क्या इसे लागू किया जा सकता है

यह तो साफ है कि यह फैसला कानून के खिलाफ है और इसे पूरी कैटेगरी में लागू करना संभव नहीं। सॉफ्ट ड्रिंक्स कंपनियां अगर अपने सभी प्रॉडक्स में फलों का रस शामिल करती हैं, तो तय है कि उसका ट्रेडमार्क फॉर्मूला खत्म हो जाएगा। अब जरा फूड रेगुलेटर फूड स्टैंडडर्स एंड सेफ्टी अथॉरिटी ऑफ इंडिया के मौजूदा नियमों पर गौर फरमाएं तो इसके मुताबिक, लाइम ड्रिंक के मामले में कम से कम पांच फीसदी फ्रूट जूस या पल्प कंटेंट और दूसरे फल होने पर दस फीसदी पल्प मिलाने पर ही कोई ड्रिंक जूस माना जाएगा। अगर एफएसएसएआई इस नियम को नहीं बदलता है तो कम से कम पांच फीसदी जूस या पल्प मिलाना ही होगा, जिससे सॉफ्ट ड्रिंक्स कंपनियों की लागत में बढ़ोत्तरी हो जाएगी। इसके अलावा इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए ज्यादा प्रिजवेंटिव्स डालने होंगे, हालांकि इसकी भी एक सीमा तय है। दरअसल एयरेटेड ड्रिंक्स की शेल्फ लाइफ चार से छह महीने होती है, लेकिन जूस मिलाने से इनकी शेल्फ लाइफ घटकर एक से तीन महीने रह जाएगी।

शीतल पेय कंपनियों की लागत

सरकार जीएसटी भी लागू करने जा रही है। यानी इस इंडस्ट्री पर चालीस फीसदी जीएसटी लागू होने के बाद लागत में बढ़ोत्तरी तय है, जिससे उपभोक्ताओं को बीस फीसदी तक ज्यादा कीमत चुकानी होगी। इसके परिणाम स्वरूप बिक्री में गिरावट आ सकती है। गौरतलब है कि इस इंडस्ट्री की हालत पहले से ही पतली बताई जा रही है और इस सेक्टर की कंपनियां फिलहाल 18 फीसदी एक्साइज ड्यूटी देती हैं। ऐसे में, इनकी मुश्किलें और बढ़ जाएंगी, क्योंकि सरकार के आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने सलाह दी है कि इस सेक्टर को तंबाकू प्रॉडक्ट की कैटेगरी में शामिल किया जाए। ऐसा माना जा रहा है कि जिस प्रकार से प्रधानमंत्री को सलाह दी गई और उसे लागू कर दिया जाता है, तो तय है कि यह इंडस्ट्री भी बीमार हो जाएगी। हालांकि, कई कंपनियां फिजी जूस ड्रिंक्स डेवलप करने पर बातचीत कर रही हैं, जिसमें कोका कोला सबसे आगे है, जिसका फायदा भविष्य में किसानों को मिल सकता है। प्रधानमंत्री की यह पहल भले ही सॉफ्ट ड्रिंक्स पर लागू होने में दिक्कत हो, लेकिन इसे प्रोटीन आधारित स्पोटर्स ड्रिंक्स पर लागू किया जा सकता है। इसका लाभ किसान व कंपनियों दोनों को मिलेगा। इस इडंस्ट्री का बाजार भी करीब दो सौ करोड़ रुपये का है और इसमें पिछले साल आठ से दस सालों में 30 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि दर देखी गई है। अब इस सेगमेंट में अमूल जैसी बड़ी कंपनियां भी आ रही हैं। गौरतलब है कि अमूल पहले भी इसे लांच कर चुकी थी, लेकिन उसे उस समय सफलता हासिल नहीं हो पाई थी। एनर्जी ड्रिंक्स में भी फ्रूट जूस मिलाकर उत्पाद का लाभ लिया जा सकता है, जिसका करीब सात सौ करोड़ रुपये का बाजार है। वैसे जिस तरह से कोल ड्रिंक्स इंडस्ट्री को सलाह दी गई है, अगर उस पर अमल होता है तो तय है कि आने वाले दिनों में किसानों में उत्साह आएगा और किसान व्यावसायिक खेती की ओर तेजी से आगे बढ़ेंगे।

विशेषज्ञ की राय

बाजार के विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार का यह घोषणा काफी उत्साहजनक है। जिसपर काम होना चाहिए। कंपनियों को प्रधानमंत्री की घोषणा पर अमल करना चाहिए। प्रधानमंत्री का यह सुझाव से कई तरह के परिवर्तन आएंगें। सरकार के ही कानून के खिलाफ है और पूरी कैटेगरी में इसे लागू करना नामुमकिन है। कंपनियों के लिए अपने सभी मौजूदा प्रॉडक्ट्स में फ्रूट जूस शामिल करना संभव नहीं है, इससे ट्रेडमार्क फॉर्मूला खत्म हो जाएगा। लेकिन, यह भी संभव है कि दूसरे वैरिएंट्स पर जूस और कार्बोनेटेड ड्रिंक को मिलाया जा सकता है। अभी इसके लिए शोध करना आवश्यक हो जाता है।

क्या लागत बढ़ जाएगी इसके जवाब में पुष्कर श्रीवासत्व कहते हैं कि एफएसएसएआई यानी फूड रेगुलेटर फ्रूट स्टैंडडर्स एंड सेफ्टी अथॉरिटी ऑफ इंडिया नियम नहीं बदलती है, तो कम से कम पांच फीसदी जूस या पल्प मिलाना होगा, जिससे लागत बढ़ जाएगी, जो कि इंडस्ट्री के लिए घातक है। लेकिन किसानों को तो लाभ होगा यह महत्वपूर्ण है। इससे यह तो तय है कि व्यावसायिक खेती की ओर किसान उत्साहित होंगे जिसका लाभ आर्थिक विकास में मिलेगा। इस सेक्टर में सेल्स घटा है, जो सिंगल डिजिट तक चला गया है। किसानों को फायदा पहुंचाने के लिए पहले उस पर होमवर्क करना चाहिए, उसके बाद ही इसे लागू करने की आवश्यकता है। लेकिन प्रधानमंत्री ने जिस तरह से घोषणा की है इससे यह तय है कि किसानों को तो लाभ मिलेगा।

कंपनियों की पहल

सभी कंपनियां तो पहल नहीं करती हैं लेकिन अमूल जैसी कंपनी इस क्षेत्र में नया है ने पहल की है। 2006 में अपने प्रॉडक्ट्स लांच किए थे, जो चल नहीं पाए। फिर से इस सीजन में बाजार में आ रहे हैं। सभ कंपनियां शोध नहीं कर सकती हैं, लेकिन कोका कोला पहले से ही सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट से बातचीत कर रही है। ताकि, जल्दी से जल्दी देश में फिजी जूस ड्रिंक्स का विकास किया जा सके। इसका लाभ किसानों को मिलेगा।

कांट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा

हमारे देश में खेती हमेशा जीविका चलाने और जीवन का एक हिस्सा जरूर है पर कभी वस्तु बाजार या व्यवसाय नहीं। आज की कंपनियों की पहली शर्त खेती को वस्तु बनाकर व्यवसाय के लिए बाजार तक पहुंचाना है। इसलिए आज की कांट्रेक्ट फार्मिंग का मूल आधार ही लाभ है। सरकार के इस पहल से किसान बड़े फार्मिंग में व्यावसायिक खेती को उत्साहित होंगे ऐसा माना जा रहा है। इसके पहले भी पेप्सी जैसी कंपनियां देश में कई फार्म हाउस से सीधे तौर पर उत्पादन लेते हैं लेकिन यह सीमित दायरे में होता है। अगर सॉफ्ट ड्रिंक्स इस पहल पर कार्य करती हैं तो तय है कि इसे विस्तार देना होगा। जिसमें खुद व खुद किसान आकर्षित होंगे। किसान खाद्यन्न फसलों को पैदा करने के स्थान पर नकद फसलों का उत्पादन करेंगे तथा उनके उत्पादित माल का निर्यात होगा। लिहाजा विदेशी मुद्रा में इजाफा होगा, साथ ही किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगी। फसल विभिन्नीकरण के लिए बड़ी पूंजी की जरूरत होगी जिसकी आपूर्ति निजी क्षेत्र से भी होगी इसलिए बड़ी बड़ी कंपनियां और बैंक तथा विशेषज्ञ के गठजोड़ से संविदा खेती के सहायक बनेंगे।

दीर्घकालिक नीति बनाने की आवश्यकता

आज कृषि के लिए दीर्घकालिक नीति बनाने की आवश्यकता है। जिस प्रकार से सरकार ने फसल बीमा की घोषणा की है वह काफी उत्साहजनक है। देश में कृषि योग्य जमीन का रकबा लगातार कम होता जा रहा है। कृषि मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 30 वर्षो में 54 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य जमीन कम हुई है। इसमें उत्तर प्रदेश और हरियाणा का बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में 48 हजार हेक्टेयर खेती की जमीन का अधिग्रहण कर किसानों को उजाड़ दिया गया है। ताजा आंकड़ों में अगर 2014 के आंकड़ों को भी शामिल कर लिया जाए तो यह रकबा और ज्यादा बढ़ जाएगा। देश में प्रति व्यक्ति कृषि भूमि की उपलब्धता पहले 0.27 हेक्टेयर थी जो अब घटकर 0.18 हेक्टेयर रह गई है। देश में आज 82 फीसदी किसान लघु एवं सीमांत श्रेणी के हैं। ऐसे किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है। गांव में निरंतर जमीन के पारिवारिक घरेलू बंटवारे की वजह से भी कृषि भूमि का रकबा घटता जा रहा है। अगर खेती की जमीन घटती रही और उत्पादन नहीं बढ़ा तो आने वाले दिनों में देश के सामने बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। ऐसे में सरकार द्वारा व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देने के लिए दीर्घकालिक नीति बनाने की आवश्यकता है जिसपर सरकार को कार्य करना होगा। सरकार जिस प्रकार से लगातार किसानों के लिए घोषणाएं कर रही है यह तय है कि आने वाले दिनों में किसानों की माली हालत में होगा।

 

टीम डिजिटल

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