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और गुजरात मॉडल धार्मिक हो गया…

कांग्रेस जहां विकास का हिसाब मांग रही है वहीँ बीजेपी गुजरात मॉडल को पीछे छोड़ राहुल गांधी से धर्म से जुड़ा सवाल पूछ रही है। बीजेपी के इस वाला में राहुल गांधी भी फसते गए हैं। राहुल कभी जनेव दिखा रहे हैं तो कभी मंदिर मंदिर जाते दिख रहे हैं। लगता है कि गुजरात के बहाने धर्म की परिभाषा गाढ़ी जा रहे है। लेकिन धर्म को मानता कौन है ? धर्म की उपरोक्त परिभाषा को आत्मसात करता कौन है ? धर्म की राह पर चलता कौन है ?

अखिलेश अखिल

धर्म क्या है ? धर्म का अर्थ होता है धारण करना। अर्थात जिसे धारण किया जा सके. धर्म ,कर्म प्रधान है। गुणों को जो प्रदर्शित करे वह धर्म है। धर्म को गुण भी कह सकते हैं। ‘धर्म’ शब्द का पश्चिमी भाषाओं में कोई तुल्य शब्द पाना बहुत कठिन है। साधारण शब्दों में धर्म के बहुत से अर्थ हैं जिनमें से कुछ ये हैं- कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, सदाचरण, सद्-गुण आदि।सनातन धर्म में चार पुरुषार्थ स्वीकार किए गये हैं जिनमें धर्म प्रमुख है। तीन अन्य पुरुषार्थ ये हैं- अर्थ, काम और मोक्ष। गौतम ऋषि कहते हैं – ‘यतो अभ्युदयनिश्रेयस सिद्धिः स धर्म।’ अर्थात जिस काम के करने से अभ्युदय और निश्रेयस की सिद्धि हो वह धर्म है। उधर मनु ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं –
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥(धृति (धैर्य), क्षमा (दूसरों के द्वारा किये गये अपराध को माफ कर देना, क्षमाशील होना), दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (अन्तरङ्ग और बाह्य शुचिता), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा), सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना) ; ये दस धर्म के लक्षण हैं। जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ नहीं करना चाहिये – यह धर्म की कसौटी है।
हिन्दू धर्म को संस्कृत में सनातन धर्म कहते हैं। विश्व के सभी बड़े धर्मों में सबसे पुराना धर्म है। ये वेदों पर आधारित धर्म है, जो अपने अन्दर कई अलग अलग उपासना पद्धतियाँ, मत, सम्प्रदाय और दर्शन समेटे हुए हैं। ये दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है, पर इसके ज़्यादातर उपासक भारत में हैं और विश्व का सबसे ज्यादा हिन्दुओं का प्रतिशत नेपाल में है। हालाँकि इसमें कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन असल में ये एकेश्वरवादी धर्म है। हिन्दी में इस धर्म को सनातन धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहते हैं। इंडोनेशिया में इस धर्म का औपचारिक नाम “हिन्दु आगम” है। हिन्दू केवल एक धर्म या सम्प्रदाय ही नहीं है अपितु जीवन जीने की एक पद्धति है ” हिन्सायाम दूयते या सा हिन्दु ” अर्थात जो अपने मन वचन कर्म से हिंसा से दूर रहे वह हिन्दु है और जो कर्म अपने हितों के लिए दूसरों को कष्ट दे वह हिंसा है।
तो धर्म की इसी कसौटी पर हम सब अपने अपने को तौले तो पता चलेगा कि हम वास्तव में धार्मिक हैं या अधार्मिक। चुकी धरम आस्था का मामला है और आस्था में किसी तर्क की गुंजाइस नहीं होती इसलिए इस धरा पर सब अपने अपने तरीके से जीते जा रहे हैं। किसी से किसी को कोई परेशानी नहीं। लेकिन जब धर्म ,राजनीति को हांकने लगे या राजनीति धर्म के सहारे आगे बढ़ने लगे तो मामला बिगड़ता जाता है। जातिवादी राजनीति से ज्यादा खतरनाक धार्मिक राजनीति है। पहले जातीय राजनीति ने देश को कमजोर किया और अब धार्मिक राजनीति समाज को कमजोर कर रही है।
ये तमाम बातें इसलिए की जा रही है कि पिछले कुछ दिनों से गुजरात चुनाव को लेकर बीजेपी और कांग्रेस में वाक् युद्ध जारी है। कांग्रेस जहां विकास का हिसाब मांग रही है वहीँ बीजेपी गुजरात मॉडल को पीछे छोड़ राहुल गांधी से धर्म से जुड़ा सवाल पूछ रही है। बीजेपी के इस वाला में राहुल गांधी भी फसते गए हैं। राहुल कभी जनेव दिखा रहे हैं तो कभी मंदिर मंदिर जाते दिख रहे हैं। लगता है कि गुजरात के बहाने धर्म की परिभाषा गाढ़ी जा रहे है। लेकिन धर्म को मानता कौन है ? धर्म की उपरोक्त परिभाषा को आत्मसात करता कौन है ? धर्म की राह पर चलता कौन है ? वैसे भी इस वैज्ञानिक युग में धर्म की उपयोगिता क्या है ?
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कहते हैं कि राहुल गांधी राम मंदिर पर अपना रुख साफ करें। कुछ ऐसा ही सवाल अमित शाह, नरेन्द्र मोदी और तमाम भाजपा से भी किया जा सकता है कि वे भारत पर शासन करने की अपनी नीति साफ करें। पिछले तीन सालों में तो भाजपा ने विकास का जाप कुछ इस तरह किया है मानो इससे पहले देश आदिम युग में जी रहा था। मानो आईआईटी, एम्स, इसरो जैसे संस्थान भाजपा ने ही खड़े किए। मानो देश में कंप्यूटर और मोबाइल का युग भाजपा ही लेकर आई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने लगभग हर भाषण में 70 में देश की क्या दुर्गति हुई, इसका जिक्र करते ही हैं। लेकिन देश जानता है कि आज भारत जहां खड़ा है, वह 3 सालों की नहीं 70 सालों की मेहनत का परिणाम है। देश यह भी जानता है कि भाजपा ने फर्श से अर्श तक का सफर राम मंदिर के मुद्दे को भुना कर तय किया है।
भाजपा की सारी राजनीति मंदिर-मस्जिद विवाद के इर्द-गिर्द खड़ी हुई है। तो प्रधानमंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष देश के सामने साफ-साफ क्यों नहीं कहते कि उनकी प्राथमिकता क्या है? वे सांप्रदायिक तनाव उपजा कर राम मंदिर बनवाना चाहते हैं या आपसी बैर-भाव खत्म कर सचमुच सबका साथ और विकास चाहते हैं? राहुल गांधी की इस वक्त राजनैतिक हैसियत इतनी ही है कि वे विपक्ष में बैठी कांगे्रस के उपाध्यक्ष हैं और जल्द ही अध्यक्ष बनेंगे। फिर उनका रुख जानना भाजपा के लिए इतना जरूरी क्यों है? अमित शाह तो सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष हैं और नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद पर बैठे हैं, इसलिए उनका मंतव्य देश के सामने साफ होना चाहिए कि वे क्या चाहते हैं?
क्या राहुल गांधी किस धर्म से हैं, इसका कोई वास्ता गुजरात या देश के विकास से है? भाजपा प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने ट्वीट किया कि अयोध्या में राम मंदिर का विरोध करने के लिए राहुल गांधी ने ओवैसियों और जिलानियों से हाथ मिला लिया है। राहुल गांधी निश्चित रूप से एक बाबर भक्त और खिलजी के रिश्तेदार हैं। बाबर ने राम मंदिर को नष्ट कर दिया और खिलजी ने सोमनाथ को लूट लिया। नेहरू वंश दोनों इस्लामी आक्रमणकारियों के पक्ष में।
मोदी जी और शाह जी कृपया बताएं कि क्या भाजपा के पास अपनी बात को साफ-साफ कहने के लिए क्या तर्कों का अभाव हो गया है, जो अब इस तरह के निम्न स्तरीय बयान निकल कर आ रहे हैं। क्या भाजपा के पास सचमुच इतिहास की कोई जानकारी नहीं है, जो वह बाबर और खिलजी को इस्लामी आक्रमणकारी बताती है? या उसका भाषा ज्ञान इतना कमजोर है कि वह आक्रमणकारी और शासक में फर्क नहीं जानती है। इतिहास में अलाउद्दीन खिलजी का नाम दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश के दूसरे शासक के रूप में दर्ज है, जिसने 1296 से लेकर 1316 तक राज किया और अपना साम्राज्य मदुरै तक फैला दिया। इतना बड़ा साम्राज्य अलाउद्दीन खिलजी ने खड़ा किया कि अगले 3 सौ सालों तक वैसा राज किसी शासक का नहीं रहा।
बाबर ने भी दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को हरा कर 1526 में मुगल वंश की नींव भारत में डाली और उनके वंशज फिर यहीं के हो कर रह गए। ऐसे में बाबर और खिलजी को आक्रमणकारी कैसे कहा जा सकता है। जहां तक सवाल सोमनाथ को लूटने का है तो भाजपा प्रवक्ता को यह तो पता ही होगा कि इसके लिए भी महमूद गजनवी का नाम लिया जाता है, जिसने एक, दो नहीं 17 बार इस मंदिर का खजाना लूटा था। फिर उन्होंने क्या फिल्म पद्मावती के कारण खिलजी का नाम लिया? जो भी हो, मंदिर-मस्जिद विवाद अदालत में है और उसका निर्णय ही सबके लिए मान्य होना चाहिए। लेकिन राहुल गांधी से बार-बार उनका धर्म और राम मंदिर निर्माण पर उनकी राय पूछने वाली भाजपा को पहले अपने इरादे देश के सामने प्रकट करना चाहिए।

टीम डिजिटल

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