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हाथरस केस: अब पुलिस नहीं, अदालत देख रही है

 

निशिकांत ठाकुर

जब से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर योगी आदित्यनाथ विराजमान हुए, उसके बाद से कानून व्यवस्था को लेकर कई तरह के निर्णय लिए। सरकार को समावेशी और सामाजिक समरसता के साथ काम करने वाला कहा गया। शासन-प्रशासन को राज्य की सुरक्षा और त्वरित कार्रवाई के लिए हमेशा अलर्ट पर रहने को कहा गया। तभी तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए कहा जाता है कि उनके राज्य में अपराधी अपराध करने से थरथर कांपते हैं। इसके कई उदाहरण देखने और सुनने में आते रहते हैं। पर, क्या अब उनके उच्च अधिकारी उनके बनाए नियमों से खिलवाड़ कर रहे है या अपनी खाल बचाने के लिए सत्य को झुठलाने में लगे हुए है ? घटना कुछ होती है और रिपोर्टिंग कुछ और इससे और कुछ तो नहीं होता , लेकिन हां सरकार की छवि जरूर धूमिल होती है। जनता और सरकार के बीच अविश्वास जरूर पैदा होता है ।
ऐसा इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि पिछले दिनों हाथरस जिले के एक गांव बूलगढ़ी के बाहर खेत में चारा अपने मां भाई के साथ काट रही एक उन्नीस वर्षीय युवती पर 14 सितंबर को हमला हुआ और 29 सितंबर को उसकी मौत हो गई । भारी बवाल हुआ और मृतिका के शव का अंतिम संस्कार बिना परिवार की जानकारी के रातों रात जलाकर कर दिया गया । हद तो तब हो गई जब पुलिस ने कहा की चोट लगने से युवती की मौत हुई है और उसके साथ किसी प्रकार का अमानवीय कृत्य अर्थात सामूहिक बलात्कार नहीं किया गया, क्योंकि उसकी पुष्टि नहीं हो सकी है । शव का अंतिम संस्कार रातों रात इसलिए कर दिया गया क्योंकि पुलिस प्रशासन को खुफिया तंत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सुबह होने पर बहुत बड़ा बवाल होने वाला था अशांति फैल जाती जातीय दंगा अगड़ी और पिछड़ी जातियों का शुरू हो सकता था । पुलिस और प्रशासन का भंडाफोड़ न हो जाए इसलिए किसी भी मीडिया को घटना स्थल अथवा परिवार के आसपास पहुचनें नहीं दिया गया।

आपको याद दिला दें कि उस समय कुछ दिनों के लिए हाथरस का यह गांव नेशनल ही नहीं, इंटरनेशनल मीडिया और एक्टिविस्टों के लिए हाॅट केक से कम नहीं रहा। हाथरस और दिल्ली की दूरी मानो चंद फर्लांग की हो, उसी हिसाब से दिल्ली से राष्ट्ीय नेताओं की आवाजाही होती रही। तरह तरह के आरोप प्रत्यारोप एक दूसरे पर लगे । पूरे देश के लिए हाथरस एक मुद्दा बन गया फिर राज्य सरकार को इसके लिए सीबीआई जांच की सिफारिश करनी पड़ी।

और अब फिर सीबीआई ने 67 दिन बाद जो चार्जशीट अदालत में सौंपी है, वह चैंकानेवाला है। सीबीआई ने इस बात की पुष्टि की है कियुवती के साथ सामूहिक बलात्कार भी हुआ और उसकी हत्या भी की गई । अब मामला अदालत के समक्ष है और देखना यह है कि अदालत का निर्णय क्या होता है? हाथरस के मामले में पुलिस इतनी संवेदनहीन क्यों हो गई थी ? जांच इसकी भी की जानी चाहिए। हर बात को राजनीतिक रंग देकर ऐसे लोग ही सरकार को बदनाम करने की साजिश रचते हैं और सरकार को धोखे में रखकर अपना मान सम्मान बढ़ाते है।

निश्चित रूप से सरकार ने यह आदेश अपने किसी प्रशासनिक अधिकारी अथवा पुलिस अधिकारी को नहीं दिया होगा कि वह मृतिका का दाह संस्कार से पहले उसके शव को उसके घर पर नहीं ले जाया जाएगा , उसका रातों रात बिना परिवार के किसी सदस्य की उपस्थिति में दाह संस्कार कर दिया जाय । मीडिया के किसी सदस्य को उसके आसपास फटकने न दिया जाए । फिर किस खुशामद के चलते यह सब किया गया यह बात अब भी उन लोगों को समझने कि जरूरत है जो इसे करने में शामिल थे । यह भी ठीक है कि इन सारी बातों का खुलासा अदालत में ऐसे अधिकारियों को करना पड़ेगा क्योंकि अब तक यह एक रहस्य जैसा लगता है कि इतना पर्दा इस मामले के ऊपर क्यों डाला गया ? जिसे सीबीआई ने अब सड़ांध मारते हुए गंदगी को अदालत के समक्ष चार्जशीट के रूप में दाखिल किया है ।

ऐसा नहीं है कि योगी राज में अधिकारियों का यह पहला रवैया रहा हो। कुछ यही हाल उन्नाव के विधायक कुलदीप सेंगर के मामले में हुआ था । वह इतना दबंग था कि उस पर हाथ कोई रख दें यह संभव नहीं था। पीड़ित परिवार के लोगों की हत्या होती रही , लेकिन पुलिस प्रशासन मूकदर्शक बने रहे । फिर जब सीबीआई जांच हुई और मामला उत्तर प्रदेश से हटकर दिल्ली स्थानांतरित किया गया, तब उसे अदालत ने दोषी करार देते हुए आजन्म कारावास की सजा देकर उसके रसूख और औकात उसे बता दिया।

वैसे भी हाथरस का यह मामला सुनवाई के लिए गया ही है, इस बात की प्रतीक्षा तो करनी ही चाहिए कि अदालत का निर्णय क्या आता है। समझ में यह नहीं आता कि इतनी बड़ी बड़ी घटना राज्य में हो जाती है , लेकिन उसकी सही छानबीन क्यों नहीं की जाती और यदि की जाती है तो अपराधी बच कैसे निकलते हैं? पुलिस का एक इकबाल होता है जिससे दूर दूर तक अपराधी अपराध करने से कांपते हैं, लेकिन अब ऐसा लगता है पुलिस और अपराधियों के बीच में सांठ गांठ हो गई है और वह अपराध करने से नहीं डरते है। यदि ऐसा हुआ होता तो ऐसी क्या जिद थी, पुलिस प्रशासन की जो इतनी बड़ी घटना को दवाकर वह क्या साबित करना चाहती थी? क्या अपराधियों को बचाने के लिए यह सारा षडयंत्र रचा गया था या आम जन के मन में भय पैदा करने के लिए सामूहिक बलात्कार और हत्या के आरोपी को बचाया जाता रहा। क्या हो गया हमारे देश के पुलिस प्रशासन को । उनका काम तो जनता की सेवा करना उनके मन में व्याप्त किसी भय को दूर करना और समाज में संविधान द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन कराना है। जिस परीक्षा को पास करने के बाद उन पर जनता कि सेवा और सुरक्षा की जिम्मेदारी डाली जाती है? वह देश की सबसे श्रेष्ठ और कठिन परीक्षा होती है। फिर उन्हें किस बात का और किसका डर ?

हमारा तो यही मानना है कि यदि उत्तर प्रदेश का प्रशासकीय महकमा और पुलिस के उच्च अधिकारी अपने इस अधिकार को समझते तो प्रदेश सरकार की गरिमा आज तार-तार नहीं हुई होती । सीबीआई ने जो अपनी चार्जशीट अदालत में पेश की है, उससे तो यही प्रमाणित होता है किं यहां की पुलिस और प्रशासन ने कोई काम नहीं किया और दुर्भाग्यपूर्ण हाथरस की घटना को मिट्टी के नीचे दफन करने का प्रयास जरूर किया। अब जब सीबीआई ने उनकी पोल पट्टी खोलकर अदालत के समक्ष पेश कर दिया है तो ऐसे अधिकारी अब कहां अपना मुंह छिपाते फिरेंगे ? देखना तो यह है कि अभी तो मामला अदालत में है , लेकिन जब पीड़िता के पक्ष में यदि निर्णय यदि आता है फिर समाज में उन अधिकारियों का इकबाल कहां जाएगा ? कुछ रुकिए और इंतजार कीजिए, अदालत का निर्णय आने दीजिए तब साफ दूध का दूध और पानी का पानी जानता के समक्ष होगा । निर्णय अब अदालत को ही करना है ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक है)।

सुभाष चन्द्र

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