दिल और दिमाग का खेल है अभिनय : स्पर्श शर्मा

मुंबई। अभिनय एक जादू है और अभिनेता एक अय्यार। वो शब्दों को जिन्दा करने का हुनर है, वो कायाकल्प वाला जादू है। जब अभिनेता इस जादू को चलाता है तो शब्द दिशाओं से, सदियों से, युगों से, काल खंडों से उखड़ कर वर्तमान से चिपक जाते हैं और अभिनेता के शरीर की धमनियों में ज्वर की तरह असर कर के अपने लिए सुविधाजनक चरित्र का सांचा बना लेते हैं। इस सारे घटनाक्रम में एक बात अत्यंत आवश्यक है अभिनेता को अय्यारी की समझ होना, शरीर को शब्दों के अनुरूप कर देना ताकि चरित्र जीवित रहे। यकीनन, चरित्र को जीवित ही किया है स्पर्श शर्मा ने। फिलहाल एसएस राजामौली के एसोसिएट रह चुके डायरेक्टर वीर नारायण की तीन फिल्मों के प्रोजेक्ट्स स्पर्श के पास हैं, जिसमें उनका काम ही बोलेगा।

अगर स्पर्श शर्मा की फिल्म बटालियन 609 देखें, तो जस्सी के जुनूनी किरदार को जिस गहराई के साथ उन्होंने अभिनय के सांचे में ढाला है, वो तारीफ और तालियों का हकदार है, जो उन्हें दर्शकों से मिली हैं। दर्शकों के बीच बैठकर अपनी फिल्म देख चुके स्पर्श कहते हैं कि मेरे लिए वो पल काफी हैरान कर देने वाले थे जब पूरी फिल्म देखने के बाद दर्शकों और खुद मेरे दोस्तों ने मुझे स्पर्श की बजाय जस्सी कहकर संबोधित किया। इसे मैं अपने किरदार की सफलता ही मानूंगा कि मैं एक सैनिक होते हुए भी सेना की गरिमा को बनाए रखते हुए कॉमेडी कर दर्शकों को हंसाता रहा। इस कैरेक्टर को पोट्रे करना आसान नहीं था लेकिन मैं मैथड एक्टर हूं और मेरी फितरत है कि जैसा मैं हूं, उसके अपोजिट किरदार करूं, जो मुझे मेंटली पेन दे, मुझे टॉर्चर करे। दिमाग और दिल के खेल से ही परफॉरमेंस निकलकर आती है। डॉयलॉग्स बोल देना एक्टिंग नहीं है, भावार्थ पकड़ना जरूरी है और जस्सी के किरदार में मैंने उसी भावार्थ को पकड़ा है। स्पर्श अपनी सफलता का सारा श्रेय अपने गुरूओं श्री सतीश आनंद, डॉक्टर जयदेव तनेजा और अपनी मां को देते हैं।

स्पर्श ठानकर आए हैं कि बचपन में फिल्म दीवार देखते ही तय कर लिया था कि अमिताभ बच्चन जैसा बनना है। दिल्ली और भोपाल से होते हुए पंजाब मेल ने उन्हें आखिरकार अमिताभ की नगरी में ही पहुंचा दिया और अब उन्हें ऐसा ही किरदार चाहिए, जिसे दुनिया दीवार के किरदार विजय की तरह याद करे। स्पर्श कहते हैं कि अमिताभ बच्चन जैसी बुलंदियां छू पाना आसान नहीं, लेकिन मुझे उनका दस प्रतिशत भी मिल जाए, तो गर्व करूंगा। स्पर्श कहते हैं कि मुझे स्टारडम के पीछे नहीं भागना। मेरी लिखी कुटेशन है कि स्टारडम इज़ टैंपरेरी, आर्ट इज़ परमानेंट। इसी आर्ट के सहारे आगे बढ़ना है।

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