तुम अब तो चलो मेरे शहर

 

निवेदिता मिश्रा झा

कुछ रंग उतरे आँचल से
बह रही है दूध की धार
और आँखों से रक्त टपकता
पेट पर बल पड़ रहे
और पपड़ियाँ तह तह पर चढ़ती
पट सी गयी
वो सफ़ेद ज़मीन

सुनो तुम बना देना
वहाँ स्मृति के लिए कुछ स्मारक
और नहीं तो लगा देना छोटे छोटे पत्थरों की याद
जो तुम्हें शायद याद करायें
जो किसी अन्य घरों की तबाही थी
तुमनें कालांतर में कालाजार भगा दिया
और इसके लिए तुम
सम्मानित हुए कई बडे लोग
कुछ समय बाद सब ठीक होगा
माना दिल्ली दूर है अभी
वो नज़दीक भी तो नहीं रही कभी

कभी हवा निगल लेते हैं
कभी पानी
और कभी पैसा
इस बार ढेर पर बैठा चील भी रो रहा
छोड़कर उड़ना चाहता है
मरघट से दूर
सबकुछ तुम्हें सौंपकर

अब देखो न पानी भरेगा
छप्पर उड़ेंगे और कंधों पर लाश उठाए
पेट के लिए स्टेशन पर क़तार रहेगी

तुम भूल जाओगे मेरी बातें….
किसी और शहर के प्रस्थान की तैयारी होगी #मुजफ्फरपुर

 

टीम डिजिटल

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