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Madhya Pradesh News : सबल और आत्मनिर्भर हो रही आधी आबादी


 

दीप्ति अंगरीश

संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने कहा था ‘मैं किसी समाज की तरक्की इस बात में देखता हूं कि उस समाज की महिलाओं ने कितनी तरक्की की है।‘ ये सच भी है कि एक सशक्त महिला मज़बूत समाज का निर्माण करती है। कहा जाता है कि घर की एक औरत को पढ़ा दिया जाए, तो पूरी पीढ़ी शिक्षित हो जाती है। ठीक इसी तरह महिलाओं को समान अवसर और अधिकार मिलें तो वे न सिर्फ अपने सपने पूरे करती हैं बल्कि परिवार के लिए संबल भी बनती हैं। मध्यप्रदेश सरकार स्व-सहायता समूहों का गठन कर महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक अवसर देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में निरंतर कार्य कर रही है। समाज और सरकार की साझा कोशिशें रंग ला रही हैं और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं।

मध्यप्रदेश में महिला सशक्तिकरण और जनभागीदारी मॉडल स्थापित करने की दिशा में स्व-सहायता समूह मील का पत्थर साबित हुए हैं। राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत प्रदेश के 45 हज़ार से अधिक गांवों के करीब साढ़े 3 लाख से अधिक स्व-सहायता समूहों में 41 लाख से ज़्यादा महिलाएं काम कर रही हैं। करीब 1245 संकुल स्तरीय संगठन गठित किए जा चुके हैं। साल 2012-13 से अब तक 1158 करोड़ का आर्थिक सहयोग स्व-सहायता समूहों को रिवाल्विंग फंड और सी.आई.एफ के रूप में दिया गया है। अब तक 3325 करोड़ बैंक ऋण बांटा गया है। इन पैसों से समूह के सदस्य कृषि और गैर कृषि आधारित 100 से ज्यादा रोज़गारपरक कार्य कर रहे हैं। समूहों से जुड़कर महिलाओं की ज़िदंगी बदली और वे आर्थिक रूप से सशक्त हुई हैं। लाखों महिलाएं जो पहले हर महीने 3 से 4 हज़ार रुपए कमा पाती थीं, आज उनकी आमदनी 10 हज़ार रुपए से अधिक हो चुकी है।

 


 

आज आपको प्रदेश के हर गांव में स्व-सहायता समूह मिलेंगे, जिनमें महिलाएं ख़ुद को आर्थिक तौर पर मज़बूत करने के लिए काम करती दिखेंगी। कोरोना महामारी के वक्त भी इनके हाथ नहीं रुके, समाज की सहायता के साथ-साथ समूहों की सदस्यों ने न सिर्फ अपने परिवार की ज़िम्मेदारी उठाई बल्कि अन्य दिनों की अपेक्षा ज़्यादा कमाई भी की। उन्होंने महज अपना ही नहीं समाज का भी ख़्याल रखा। मास्क, सैनिटाइजर के प्रोडक्शन के साथ-साथ सेनेटरी नैपकिन और पीपीई किट तक बनाकर मुसीबत के समय अपना कर्तव्य निभाया।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्व-सहायता समूहों को पोषण आहार फ्रैक्ट्री चलाने की बड़ी ज़िम्मेदारी दी। प्रदेश के कुछ ज़िलों में समर्थन मूल्य पर फसल ख़रीदी का कार्य भी स्व-सहायता समूह कर रहे हैं। आजीविका एक्सप्रेस सवारी वाहनों का संचालन समूह सफलतापूर्वक कर रहे हैं। इतना ही नहीं पंचायत स्तर पर गैस सिलेंडर रिफिलिंग, डीजल और लुब्रिकेंट ऑयल की बिक्री के काम की ज़िम्मेदारी देश की प्रमुख पेट्रोलियम कंपनियों ने स्व-सहायता समूहों को दी है। देवास ज़िले में इसके लिए चुने गए 35 ग्रामों में से कुछ गांव में समूहों ने इस पर काम शुरू भी कर दिया है। छोटे व्यवसायों की बात करें तो दीदी कैफे का संचालन स्व-सहायता समूहों द्वारा बेहतर तरीके से किया जा रहा है। आज 128 दीदी कैफे आपको कई तरह के व्यंजनों का स्वाद देने के लिए तैयार हैं। स्कूली ड्रेस की सिलाई का काम करके समूह की सदस्यों ने पिछले दो सालों मे करीब 561 करोड़ का कारोबार किया है। जल जीवन मिशन से जुड़कर आधी आबादी हर घर स्वच्छ जल पहुंचाने में योगदान देने के लिए तैयार है। बुरहानपुर प्रदेश का ऐसा पहला ज़िला है, जहां जल जीवन मिशन के तहत नल कनेक्शन देने के साथ सौ फीसदी पेयजल व्यवस्था समूहों को सौंपी जा रही है।
स्व-सहायता समूहों को नया मंच और आजीविका उत्पादों को बाज़ार देने के लिए सरकार ने आजीविका मार्ट पोर्टल तैयार किया है। पोर्टल में साढ़े 6 हज़ार से अधिक उत्पादों का डिटेल मौज़ूद है। 400 करोड़ से अधिक का विक्रय पोर्टल के माध्यम से किया गया है। सरकार ने गांव में रहने वाली महिलाओं को और सशक्त करने के लिए हर साल दो हज़ार करोड़ रुपए का क्रेडिट लिंकेज उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा है। आने वाले तीन सालों में 25 लाख और महिलाओं को स्व-सहायता समूहों से जोड़ने का लक्ष्य है। महिला समूहों को एक साल में 2 हजार 525 करोड़ रुपए का कर्ज़ न्यूनतम ब्याज दर पर उपलब्ध कराने की योजना है।

इसके साथ ही स्व-सहायता समूहों, महिला उद्यमियों, पीड़ित और महिला हितग्राही आदि को स्व-सहायता महासंघों के जरिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए 100 करोड़ रुपए के मुख्यमंत्री नारी सम्मान कोष की स्थापना की जा रही है। महिलाओं और उनके समहों की ट्रेनिंग, काउंसलिंग, उत्पादों की पैकेजिंग, ब्रांडिंग, मार्केट लिंकेज और डिजिटल मार्केटिंग डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्किंग के लिए नई महिला उद्यम शक्ति योजना लागू की जा रही है। महिला उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए भोपाल और इंदौर में इंडस्ट्रियल पार्क की स्थापना की प्लानिंग है। रोज़गार के लिए नए-नए व्यवसाय गांव तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है, जिससे स्वसहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को इनसे जोड़कर आजीविका के तमाम मौके उपलब्ध कराएं जा सकें और आत्मनिर्भर बनाया जा सके।

स्व-सहायता समूहों ने महिलाओं को हिम्मत दी है कि कठिन परिस्थितियों से लड़ सकें। आज वे समूहों, परिसंघों के पदाधिकारियों के रूप में अलग पहचान बना रही हैं। घर से बाहर निकलने की झिझक ख़त्म हुई है। शिक्षा के महत्व को समझ रही हैं। सामाजिक गतिविधियों में भागीदार हो रही हैं। अपने अधिकारों के प्रति सजग हुई हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने आधी आबादी को मज़बूती प्रदान कर प्रदेश के विकास में उनकी साझेदारी सुनिश्चित की है। आज मध्यप्रदेश जनभागीदारी, सुशासन और सामाजिक न्याय का उदाहरण बन रहा है।

 

दीप्ति अंगरीश

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