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मध्य प्रदेश के मंत्रीजी लापता हैं!

न तो सरकार के मुखिया को और न ही सत्तारूढ़ पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष को यह चिंता है कि आखिर मंत्रीजी कहां चले गए। ऐसा भी नहीं है कि मत्रीजी ने मुख्यमत्री से कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय की मांग की हो और वह मांग पूरी न होने से वे रूठकर अज्ञात स्थान की ओर कूच कर गए हो। संगठन में भी मंत्रीजी को पूरा सम्मान मिल रहा था इसलिए यह आशंका भी नहीं है कि मंत्री जी सत्तारूढ़ पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष से नाराज होकर कही चले गए हों। पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष का तो उन पर वरदहस्त है।

कृष्णमोहन झा

शिवराज सरकार के एक मंत्री पिछले कई दिनों से लापता है और आश्चर्य की बात यह है कि न तो सरकार के मुखिया को और न ही सत्तारूढ़ पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष को यह चिंता है कि आखिर मंत्रीजी कहां चले गए। ऐसा भी नहीं है कि मत्रीजी ने मुख्यमत्री से कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय की मांग की हो और वह मांग पूरी न होने से वे रूठकर अज्ञात स्थान की ओर कूच कर गए हो। संगठन में भी मंत्रीजी को पूरा सम्मान मिल रहा था इसलिए यह आशंका भी नहीं है कि मंत्री जी सत्तारूढ़ पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष से नाराज होकर कही चले गए हों। पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष का तो उन पर वरदहस्त है। प्रदेशाध्यक्ष को तो अपने इस लाल पर इतना भरोसा है कि वे हमेशा सर ऊंचा कर यह दावा करते रहे है कि नहीं मेरा लाल कोई गलत काम कर ही नहीं सकता। वह तो इतना सीधा साधा और मासूम है कि उसे जबरन ही उसके साथी परेशान करते हैं उसके ऊपर झूठा आरोप लगाकर उसे मानसिक यातना देने की कोशिश करते हैं परंतु पार्टी का यह निष्ठावान और समर्पित  कार्यकर्ता कभी किसी से कुछ नहीं कहता। जब भी ऐसे मिथ्या आरोप उसे उदासी के चक्रव्यू में घेर लेते हैं तो वह एकांतवास पर चला जाता है। प्रदेशाध्यक्ष को अपने इस लाल का स्वभाव मालूम है कि वह एकांतवास में कहां जाता है इसलिए वे सबको एक ही जवाब दे रह हैं कि परेशान मत हो वह देश में ही कही एकांतवास कर रहा है और जोर देने पर वे यहां तक बताते है कि उनका प्यारा लाल प्रदेश में कहीं अपनी उदासी से लड़ रहा है परंतु जिन प्रदेशाध्यक्ष को यह मालूम है कि आखिर प्रदेश में ऐसी कौन सी सुरक्षित जगह है जहां उनका लाल अकेले ही अपनी उदासी से लड़ रहा है। कभी किसी परविार का बेटा रूठकर एक दो दिन के लिए भी कही चला जाए तो पिताजी अखबार में विज्ञापन दे देते हैं कि बेटा तुम जहां कही भी हो तुरंत घर चले आओ तुम्हे कोई कुछ नहीं कहेगा। परंतु प्रदेशाध्यक्ष ऐसा विज्ञापन देने के पक्ष में नहीं हैं क्योंकि उन्हें यह भरोसा है कि उनका लाल जहां कही है पूरी तरह सुरक्षित है। कुछ दिनों में जब उसे यह भरोसा हो जाएगा कि उसे कोई कुछ नहीं कहेगा तो खुद ब खुद वह वापिस लौट आएगा। आखिर वह एक लोकप्रिय सरकार में जिम्मेदार मत्री है और एक जिम्मेदार मत्री को यह तो अच्छी तरह मालूम होता है कि उसके एकाएक लापता हो जाने से उस सरकार को भी शर्मसार होना पड़ता है जिसमें उसके एक जिम्मेेदार मत्री की भूमिका के निष्ठापूर्वक निर्वहन की अपेक्षा की जाती है। हां एक शर्त पर मंत्री जी तुरंत लौटकर अपनी जिम्मेदारियां संभालने के लिए खुशी खुशी राजी हो सकते है और वह शर्त यह है कि मुख्यमत्रीजी अपने इस अधीस्थ मंत्री को यह आश्वासन दे दें कि उनके वापिस लौटते ही उन्हें एक महत्वपूर्ण मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंप दी जावेगी लेकिन मंत्रीजी को कही से कोई आश्वासन नहीं मिल रहा है तो फिर आखिर वे बाहर आएं भी तो कैसे?

मंत्रीजी के लापता होने से उनके विभाग के महत्वपूर्ण कामकाज भी लंबित है। उनकी टेबिल पर उन फाइलों का ढेर बढ़ता ही जा रहा है जिन पर मंत्रीजी की स्वीकृति जरूरी है। पर फाइलों की चिंता तो बहुत छोटी सी बात है फाइलें तो महीनों अटकी रह सकती हैं। विभाग के कामकाज में सुस्ती भी उतनी बात नहीं है असली चिंता की बात तो यह है कि उन उदघाटन समारोह का क्या होगा जहां मंत्रीजी के हाथों फीता काटे जाने की शुभ तिथि का निर्धारण हो चुका है। उन भवनों का निर्माण कैसे होगा जिनके शिलान्यास की अनुमति मंत्रीजी ने सहर्ष प्रदान कर दी थी। वे सारे महत्वपूर्ण काम अब अनिश्चिकाल के लिए स्थगित हो चुके है जिनका शुभारंभ मंत्रीजी के कर कमलों के द्वारा होना था। सबके लिए अफसोस की बात है परंतु मंत्रीजी भी क्या करें। उदासी के घेरे से बाहर निकलने के लिए वे जितने भी प्रयास करते हैं यह घेरा उन्हें अधिक अपनी गिरफ्त में लेता जाता है।

अब चूंकि मंत्रीजी एक सरकार में सम्ममानीय पद पर हैं इसलिए उनकी प्रतिष्ठा की चिंता भी सबको करनी पड़ रही है। सरकार को, संगठन को, पार्टी के कार्यकर्ताओं को, सहयोगी मंत्रियों को। पुलिस उनके बंगले तक जाती हैं उन्हें खोजने के लिए परंतु उसे भी यह फिक्र खाए जाती है कि कही बंगले पर मंत्रीजी मिल गए तो उसे उनके साथ किस तरह पेश आना पड़ेगा। आखिर मंत्रीजी तो सरकार का हिस्सा हैं और पुलिस को तो हमेशा उनके मातहत रहकर ही काम करना पड़ जाए। इसलिए पुलिस भी मंत्रीजी के बंगले में ताला देखकर विनम्रता पूर्वक वापिस चली जाती है। पुलिस को न तो अफसोस होता है और न ही पछतावा। गुस्सा होने का तो सवाल ही नहीं उठता। आखिर कोई छोटी मोटी हस्ती तो हैं नहीं मंत्री है।

धुंधली सी एक उम्मीद की किरण अभी भी दिखाई दे रही है वह यह है कि कोई मंत्रीजी को यह भरोसा दिला दे कि सचमुच ही उन्हें कोई कुछ नहीं कहेगा तो वे लौट सकते है। काश उन्हें अग्रिम जमानत मिल जाए तो वे हंसी खुशी लौट सकते है। पर यह भरोसा कौन दिलाए। केवल इतने पर से काम नहीं चलेगा कि प्रदेशाध्यक्ष उन्हें बाइज्जत बरी कर दें। प्रदेशाध्यक्ष तो बार बार उन्हें क्लीन चिट दे चुके है परंतु मुख्यमंत्री मौन हैं। उनका मौन रहस्यमय है। कही मुख्यमंत्रीजी का मौन इस रहस्य को तो उजागर नहीं कर रहा है कि वे मंत्रीजी से त्याग पत्र की अपेक्षा कर रहे हैं शायद ऐसा ही है। आखिर मुख्यमंत्रीजी का भी विशेषाधिकार है कि वे किसे सरकार में रखे और किसे नहीं। यह भी हो सकता है कि मुख्यमंत्री एवं प्रदेशाध्यक्ष के बीच इस मामले में मतवैभिन्य हो।  मंत्रीजी एकांतवास से बाहर आने का साहस दिखाएं तो कोई रास्ता निकल सकता है। सरकार और पार्टी को भी असहज स्थिति से मुक्ति मिल सकती है। पर इसके लिए जो इच्छा शक्ति चाहिए वह तो प्रदेशाध्यक्ष और मुख्यमंत्री को ही प्रदर्शित करनी पड़ेगी।

इस सारे मामले में विचारणीय पहलू यह है कि उक्त मंत्रीजी उस पार्टी की सरकार में सत्ता सुख का उपभोग कर रहे हैं जो अपनी चाल, चरित्र और चेहरा दूसरे रानीतिक दलों से अलग होने का दावा करती है। अगर प्रदेशाध्यक्ष मंत्री को अदालत में सुनवाई के बिना ही क्लीनचिट देने को गलत नहीं मानते तो इसका अर्थ क्या यह नहीं है कि पार्टी ने उन पूर्व मंत्रियों के साथ अन्याय किया जिन्होंने आरोपों के घेरे में आते ही अपने पद से इस्तीफा देने का साहस दिखाया। दरअसल पार्टी को उन्हीं आदर्शों का पालन करना चाहिए था परंतु ताजे मामले में उसके रूख से ऐसा संदेश मिलता है कि नैतिकता की बातें तो पार्टी के लिए बीते कल की बात रह गई है जो वर्तमान परिस्थितियों में कतई प्रासंगिक नहीं है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं) 

दीप्ति अंगरीश

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