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हरिद्वार महाकुंभ में लोगों को मुफ्त भोजन कराएगी मिथिला कुँज: संत किशोरी शरण महाराज

वृंदावन। कोरोना महामारी को लेकर कुछ दिन पहले तक हरिद्वार में कुंभ के आयोजन को लेकर कुछ शंकाए थीं। मगर अब वे निर्मूल हो गई हैं। शासन-प्रशासन की ओर से उचित व्यवस्थाएं की जा रही हैं। संतों ने भी अपनी ओर से व्यापक व्यवस्थाएं की हैं। वृंदावन के प्रसिद्ध मिथिला कुंज आश्रम के संत किशोरी शरण जी महाराज ने घोषणा की है कि महाकुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं को भोजन की चिंता नहीं करनी है। आप आएं, पतित पावनी गंगा मंे डुबकी लगाएं। समाज और आश्रम के सहयोग से आपके लिए भंडारे में प्रसाद स्वरूप भोजन की व्यवस्था है।

संत किशोरी शरण जी महाराज का कनहा है कि दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक मेले महाकुंभ में श्रद्धालुओं को हरिद्वार कुंभ में आस्था की डुबकी लगाने के लिए करोड़ों लोग तैयार हैं। मिथिला कुंज आश्रमने कुंभ को ध्यान में रखते हुए श्रद्धालुओं के लिए बड़ा प्लान तैयार किया है। हमारा आश्रम प्रतिदिन लाख लोगों के लिए भंडारे की व्यवस्था करेगा। इसमें आश्रम ने अपने संसाधन का उपयोग किया है। साथ ही समाज के दानवीर आकर हमारा सहयोग करेंगे, ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है। हमने समाज के समर्थ लोगों से आह्वान किया है कि आप श्रद्धालुओं के लिए भोजन की व्यवस्था करें।

कोरोना काल में महाकुंभ का कैसा स्वरूप होगा ? इस सवाल के जवाब में संत किशोरी शरण जी महाराज ने कहा कि ऐसा नहीं कि ऐसी विकट परिस्थिति पहली बार आई है। आज से पहले भी ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियां रहीं हैं। लेकिन संत समाज ने अपनी परंपरा का निर्वाह किया है। श्रद्धालुओं ने भागीदारी सुनिश्चित की है। उन्होंने कहा कि इससे पहले भी पांच ऐसे मौके आए जब कुंभ के दौरान प्लेग महामारी का साया रहा। वर्ष 1844, 1855, 1866, 1879 और 1891 का कुंभ मेला महामारी के बीच संपन्न कराया गया था। वर्ष 1844 में हुए कुंभ में ब्रिटिश सरकार ने बाहरी लोगों के आने पर रोक लगा दी थी। अन्य कुंभ को सख्ती बढ़ाकर संपन्न कराया गया। वहीं, 155 साल पहले 1866 में हुए कुंभ के दौरान पहली बार सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराया गया था। उन्होंने कहा कि गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पुस्कालय में रखी कई किताबों में इस बात का जिक्र किया गया है। इसके अनुसार 1866 में संतों-अखाड़ों ने भी सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया था। उस वक्त प्लेग महामारी के कारण ब्रिटिश सरकार ने खुले में शौच पर रोक लगा दी थी। जगह जगह कूडेदान भी रखे गए थे। घाटों पर गंदगी नहीं एकत्र होने दी जा रही थी। कैंपों में रहने वाले साधु-संतों और यात्रियों को भी कहा गया कि वे अपने यहां स्थित शौचालय का ही प्रयोग करें। हरिद्वार में फैली महामारी का जिक्र हरिद्वार गंगाद्वारे महातीर्थे पुस्तक में भी मिलता है।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि जब समुद्र मंथन में अमृत कलश निकला तो सभी देवता और असुर उसका पान करना चाहते थे। अमृत के लिए देवताओं और दानवों में युद्ध होने लगा। इस दौरान कलश से अमृत की बूंदें चार स्थानों हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन में गिरी थीं। ये युद्ध 12 वर्षों तक चला था, इसलिए इन चारों स्थानों पर हर 12-12 वर्ष में एक बार कुंभ मेला लगता है। इस मेले में सभी अखाड़ों के साधु-संत और सभी श्रद्धालु यहां की पवित्र नदियों में स्नान करते हैं।

टीम डिजिटल

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