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7वीं बार की पारी आसान नहीं होगी नीतीश कुमार के लिए

सुभाष चन्द्र ।। बिहार में नीतीश कुमार ने 7वीं बार मुख्यमंत्री पद का शपथ लिया। यदि यह कहा जाए कि इस बार की पारी नीतीश कुमार के लिए सबसे बडी चुनौती होने वाली होगी, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस बार बडे भाई की भूमिका में भारतीय जनता पार्टी है। ऐसे में माना जाए कि कुर्सी पर भले ही नीतीश कुमार हों, लेकिन शासन-प्रशासन पर पूरी नजर भाजपा की होगी। तभी तो भाजपाा ने दो उपमुख्यमंत्री बना दिया है। मंत्रिमंडल में भाजपा के लोग अधिक होंगे।

जनता की उम्मीदें और अधिक है। इसलिए कहा जा रहा है कि भाजपा इस बार नीतीश कुमार को हर तरह से अपने प्रति जवाबदेह बना रही है। जिस प्रकार से विपक्षी दल खासकर राजद और कांग्रेस ने शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार किया, उससे यह तय माना जाना चाहिए कि सदन में विपक्ष इस बार पहले से अधिक सशक्त और अलग तेवर वाली होगी। मुख्यमंत्री पद पर काबिज होने के बाद नीतीश कुमार को कई चुनौतियों का सामना करना होगा। नीतीश को मजबूत विपक्ष का सामना करना होगा तो दूसरी ओर सहयोगियों के साथ संतुलन भी बनाना होगा।

दरअसल, इस बार जब नीतिश कुमार मुख्यमंत्री बनेगें तो पिछले दो दशकों में सात बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने में उनका नाम शुमार हो जाएगा। उन्होंने सबसे पहली बार साल 2000 में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। इसके बाद राजनीतिक उतार चढ़ाव के चलते वह इस्तीफा देते रहे और मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते रहे हैं। सबसे बडा सवाल यह है कि बिहार को पहले से अधिक सशक्त बनाने के लिए और युवाओं की उम्मीदों को साकार करने की सबसे अधिक अपेक्षा होगी। इसके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनका मंत्रिमंडल क्या करेगा ?

हालांकि राज्य की सत्ता संभालना इस बार नीतीश कुमार के लिए पहले से जैसा आसान नहीं होने वाला है। इस बार सियासी समीकरण के साथ-साथ हालात भी अलग हैं। जिसकी वजह से नीतीश के सामने कई चुनौतियां भी हैं। एक ओर तो उन्हें मजबूत विपक्ष का सामना करना होगा तो वहीं दूसरी ओर अपने सभी सहयोगियों के साथ संतुलन बनाकर रखना होगा।

वहीं इस बार कम सीटें हासिल करने की वजह से नीतीश कुमार के लिए सरकार चलाने और खुलकर फैसले लेने की आजादी पहले जैसी नहीं होने वाली है। इसलिए नीतीश कुमार को अपने नियंत्रण में रखकर सरकार चलाने की चुनौतियों का भी सामना करना होगा।इसके अलावा बिहार की सत्ता संभालने के बाद नीतीश पहली बार मजबूत विपक्ष का सामना करेंगे। बता दें कि इससे पहले तक बिहार में विपक्ष काफी कमजोर स्थिति में रहा है। लेकिन इस बार विपक्ष मजबूत स्थिति में है। नीतीश को घेरने के लिए पहली बार विपक्ष में कम से कम 115 विधायक रहेंगे।

भाजपा अब बिहार में अपना सामाजिक आधार बड़ा करेगी। ध्यान रहे भाजपा कभी भी बिहार की पार्टी नहीं रही है। भारतीय जनसंघ का भी बिहार में बड़ा आधार नहीं था। जब झारखंड का विभाजन नहीं हुआ था तो बिहार में भाजपा को दक्षिण बिहार यानी मौजूदा झारखंड की पार्टी माना जाता था। उसके जो 40-50 विधायक कभी जीतते थे तो ज्यादातर उसी इलाके से होते थे। तभी जब झारखंड अलग हुआ तो पहली सरकार भाजपा की बनी थी। वह भी नीतीश कुमार की बदौलत ही हुआ था। तब भाजपा नीतीश के साथ मिल कर लड़ी थी और झारखंड में नीतीश की पार्टी के छह विधायकों के समर्थन से उसकी सरकार बनी थी।

ना केवल तेजस्वी बल्कि ओवैसी की पार्टी के मुद्दों का सामना करना भी नीतीश के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।इसके अलावा नीतीश के सामने अपनी खोई इमेज को वापस पाने की भी चुनौती है। इस बार चुनाव में उनके खिलाफ लोगों की नाराजगी साफ देखने को मिली। चुनाव के दौरान सत्ताविरोधी लहर साफतौर पर देखने को मिली। लोग नीतीश के प्रति अपना गुस्सा जाहिर कर रहे थे। ऐसे में अब नीतीश कुमार के पास सत्ता संभालने के बाद अपनी खोई हुई सुशासन बाबू की छवि को फिर से मजबूत करने की चुनौती होगी।

नीतीश कुमार पूरी मजबूती और बिना हस्तक्षेप के काम करने वाले सीएम माने जाते रहे हैं। आलोचक उनकी शैली को बिना किसी से विचार किए फैसला लेने वाले सीएम रहने का भी आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन इस बार उनके सामने ऐसी खुली आजादी कतई नहीं होगी। सरकार के अंदर उनकी हिस्सेदारी भी कम होगी। कैबिनेट में बीजेपी के अधिक मंत्री होंगे। इसके अलावा जीतन मांझी और मुकेश सहनी की पार्टी को भी एक-एक पद मिल सकता है।

इस तरह फिर से सीएम बनने वाले नीतीश कुमार काे अपने नियंत्रण में रखकर शासन करने की चुनौती रहेगी। याद रखें कि 2015 में जब आरजेडी अधिक सीट लेकर सरकार में हिस्सेदार हुई तो कुछ महीने बाद ही कई मसलों पर वे असहज हो गये थे। अब सवाल है कि उसके आगे भाजपा क्या करेगी?

सो, भाजपा को बहुत संतुलन बनाना होगा। इसके लिए दो रास्ते हैं। या तो साझा नेतृत्व विकसित करे, जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि में किया गया है या राजद के कोर वोट यानी यादव वोट का एक बड़ा हिस्सा हासिल करने की आक्रामक राजनीति करे। दोनों में जोखिम भी है और स्थायी फायदा भी है। अब भाजपा को तय करना है कि वह किस रास्ते पर आगे बढ़ती है।

असल में, बिहार में भाजपा को वैश्यों की पार्टी माना जाता था। जब लालू प्रसाद के उभार के बाद कांग्रेस का पतन हुआ और भूमिहार, ब्राह्मण व राजपूतों ने एक साथ कांग्रेस को छोड़ा तब जाकर भाजपा को थोड़ा वोट आधार मिला। लेकिन वह भी अकेले राजनीति करने के लिए पर्याप्त नहीं था क्योंकि एकीकृत बिहार में सवर्णों की आबादी 12 फीसदी से ज्यादा नहीं थी। तभी भाजपा को हमेशा किसी न किसी कंधे की जरूरत पड़ी। इस काम में नीतीश कुमार का कंधा भाजपा के बहुत काम आया। अब नीतीश के सहारे भाजपा इस मुकाम पर पहुंच गई है और वह नीतीश के बनाए जमीनी आधार और सामाजिक समीकरण के ऊपर नरेंद्र मोदी के चेहरे की मदद से पिछड़ा और अतिपिछड़ा आधार मजबूत कर सके।

वैसे भाजपा की यह राजनीति दोधारी तलवार की तरह है। इसी चुनाव में अगड़ों के बीच यह मैसेज था कि उनके लिए जैसे भाजपा वैसे राजद। इस नैरेटिव का थोड़ा बहुत नुकसान इस बार भाजपा को उठाना पड़ा है। अगर वह पिछड़ों और अतिपिछड़ों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करेगी तो उसके सवर्ण मतदाता नाराज होंगे। ध्यान रहे विभाजन के बाद बिहार में सवर्ण मतदाताओं की संख्या 17-18 फीसदी तक पहुंच गई। यह एक बड़ी संतुलनकारी ताकत है। अगर इसका रूझान राजद और कांग्रेस की ओर गया तो संतुलन बदल सकता है क्योंकि उनके पास पहले से मुस्लिम-यादव का 30 फीसदी का एक मजबूत वोट आधार है। इस बार इसके ऊपर उसे पांच फीसदी वोट मिले हैं। इसमें अतिपिछड़ी जातियां भी हैं और सवर्ण भी।



सुभाष चन्द्र
, वरिष्ठ पत्रकार

 

 

टीम डिजिटल

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