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किसान संगठनों का आरोप, काॅरपोरेट का लाभ चाहते हैं पीएम मोदी 

नई दिल्ली। प्रधानमत्री द्वारा नाटकीय ढंग से किसानों की मांग को विपक्ष द्वारा फैलाई जा रही ‘गलतफहमी’ बताए जाने की कड़ी निन्दा करते हुए एआईकेएससीसी वर्किंग गु्रप ने कहा है कि ये दरअसल उन कानूनों से ध्यान हटाने का प्रयास है जो कारपोरेट व विदेशी कम्पनियों को सशक्त करते हैं और किसानों से उनकी जीविका का साधन छीनते हैं। जिस सवाल को किसानों के विरोध में केन्द्रित करके रख दिया है, यह कि ये ‘‘किसान बनाम कारपोरेट हितों’’ का सवाल है और भारत सरकार कम्पनियों व विदेशी कम्पनियों के साथ खड़ी है, प्रधानमंत्री उससे बचना चाह रहे हैं।

प्रधानमंत्री की यह दलील कि इससे किसानों के लिए अवसर व विकल्प बढ़ेंगे और इनमें पुरानी व्यवस्था समाप्त करने का कोई आदेश नहीं है, एक सफेद झूठ है। कानून साफ लिखते हैं कि व्यापार निजी कारपोरेशन करेंगे और फसल के दाम आॅनलाइन ई-व्यापार से तय होंगे, न कि एमएसपी से, जो पुरानी व्यवस्था है। पुरानी व्यवस्था में बड़े प्रतिष्ठानों द्वारा व्यापार करने पर रोक थी। नया कानून उन्हें अवसर देता है और खेती कराने, खरीद की प्रक्रिया, भंडारण व खाने के व्यापार में उन्हें विकल्प के तौर पर खड़ा करता है।

किसानों की यह दलील पूरी तरह सही है कि प्रधानमंत्री उनकी बात नहीं सुन रहे हैं, और यह कि ठेका खेती, कारपोरेट निजी मंडियां, खेती करने की स्वतंत्रता समाप्त कर देंगी, लागत के दाम, कर्जे व घाटे बढ़ा देंगी और आत्महत्याएं तथा जमीन से विस्थापन बढ़ा देंगी। प्रधानमंत्री ने दावा किया कि अब खाद खुले में बिक रही है पर यह नहीं बताया कि उसके दाम दो गुना से ज्यादा कर दिये हैं।

प्रधानमंत्री ने किसानों की पुरानी एमएसपी व सरकारी खरीद, कर्जमाफी व सस्ती खाद व लागत की मांगों पर खुलकर हमला किया है। ये सभी किसानों पर बोझ बढ़ाती हैं और क्योंकि बड़े कारपोरेट व व्यवसायिक हित मंहगी लागत, खाद, डीजल, बीज, बिजली बेचने में थे और वे नहीं चाहते थे कि सरकारी खरीद व मंडियों वे बाधित हों। प्रधानमंत्री ने दावा किया है कि पुरानी व्यवस्था विफल हो गयी थी और नए कानून नई व्यवस्था ला रहे हैं। नए कानून कारपोरेट दुनिया को खेती पर सीधा हस्तक्षेप व नियंत्रण करने का अधिकार देते हैं। दिल्ली में आए किसान यही बात प्रधानमंत्री को सुनाना चाहते हैं, जिसे सुनने की जगह उन्होंने अपने कान बंद कर लिये हैं।

एआईकेएससीसी ने प्रधानमंत्री से अपील की है कि वे ‘अन्नदाता, आत्मनिर्भर भारत की अगुवाई करेगा’ के  गलत नारे न उछालें क्योंकि उनके कानून व नीतियां किसानों को ‘अन्तदाता कम्पनियों का गुलाम बनेगा’ की ओर ढकेल रही हैं।

 

एआईकेएससीसी ने तीन खेती के कानून व बिजली बिल 2020 पर हमला करते हुए कहा है कि इससे कालाबाजारी, खाने की कीमतों की मंहगाई और राशन व्यवस्था तथा गरीबों की खाद्यान्न सुरक्षा पर हमला होगा। वर्किंग गु्रप के अनुसार प्रधानमंत्री जवाब देने से भाग रहे हैं, वार्ता का मजाक उड़ा रहे हैं, जल्द ही किसान आन्दोलन, जिसकी ताकत भी बढ़ रही है और लड़ने का संकल्प भी, उन्हें सच्चाई का सामना करने के लिए मजबूर करेगा।

 

वर्किंग गु्रप एआईकेएससीसी ने दिल्ली की आप सरकार से अनुरोध किया है कि वह नए मंडी बाईपास कानून की अधिसूचना वापस करे और यह स्पष्ट करे कि वह किसानों के पक्ष में है या कारपोरेट के।

टीम डिजिटल

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