समाज की कोई जिम्मेदारी नहीं …

शहादत को सम्मानित कर
अमरत्व का उद् घोष
करने वालों बस एक पल
बस एक पल ठहरो
शरीर जल गया
पर धरा पर हैं उनकी
सिसकती अर्धांगिनी
बिखरे सपने के संग
बिलखते गुमसुम मासूम
के मर्म स्पर्शी भावों को
आह्लादित करने की सोचो
शहीद की चिता के संग ही
क्यों जल जा रही भावना
क्यों ठंडे पड़ जाते हैं जोश
अमरत्व के उद्घघोष की
तभी होगी पूर्ण सार्थकता
जब सहज होगा उनके
कुटुंब का जीवन यापन
उलझे हुए सारे पहलू

कभी सामाजिक जंजीरों में
कभी आर्थिक मजबूरियों में
उर्जित करो इन सहमे हुये
उदास खिलखिलाहटोंं को
जिनकी आंखें बाट जोहतीं
उत्सव समारोह में अनवरत
अमरत्व पद को पाने वाले
तिरंगा में लिपटे पालनहार
का।।।

देख आओ हर त्योहार में
सूनी रहती उनकी रसोई
नहीं बनते वहां पकवान
जिनकी शहादत से मना पा रहे
हम सब इतनी खुशहाली
चलो जला आएंं इक दीप
जहाँ है आज भी उनका रैनबसेरा।।।
तभी सार्थकता से ओतप्रोत
उन्मादित हो सुवासित होगा
शहीद के अमरत्व का
जयकार और उद्घघोष।

 

– अंजना झा, फरीदाबाद,हरियाणा

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