बेहद खास है पुरुषोत्तम मास

शास्त्री सौरभ

धर्म ग्रंथों के अनुसार तीन वर्ष में एक बार पुरुषोत्तम मास आता है। इसे अधिक मास भी कहते है। पहले हम ये जान लेते है की पुरुषोत्तम मास है क्या ? ज्योतिष् शास्त्र के अनुसार जिस मास में अमावस्या से अमावस्या के बीच में कोई संक्रांति न पड़े उसे अधिक मास कहते है।
संक्रांति का अर्थ सूर्य का राशि परिवर्तन से है। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को ही संक्रांति कहते है।
ज्योतिषीय गणना के अनुसार एक सौर वर्ष 365 दिन 6 घंटे 11 मिनट का होता है तथा एक चंद्र वर्ष 354 दिन 9 घंटे का माना जाता है।
सौर वर्ष और चंद्र वर्ष की गणना को बराबर करने के लिए अधिक मास की उत्पत्ति हुई।
पुरुषोत्तम मास में पूजा पाठ का विशेष महत्व है। जो जातक पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से उपवास,पूजा पाठ दान कर्म करता है। उसे पुण्य की प्राप्ति एवं कष्टों से मुक्ति मिलती है। इस वर्ष 16 मई से 13 जून तक सूर्य संक्रांति न होने के कारण ज्येष्ठ अधिक मास बनता है। वैसे ज्येष्ठ माह इसके पूर्व 30 अप्रैल से प्रारंभ होकर 27 जून तक रहेगा परंतु कृष्ण और शुक्ल पक्ष के दिनों के मान से अधिकमास मई जून के मध्य भाग में रहेगा। अधिक मास को मल मास, पुरूषोत्तम मास आदि नामों से पुकारा जाता हैं। जिस चंद्र मास में सूर्य संक्राति नहीं होती, वह अधिक मास कहलाता है और जिस चंद्र मास में दो संक्रांतियों का संक्रमण हो रहा हो उसे क्षय मास कहते हैं। इसके लिए मास की गणना शुक्ल प्रतिपदा से अमावस्या तक की गई है।
शास्त्रों के अनुसार मास प्रारंभ के समय भगवान विष्णु की आराधना लाल चंदन,लाल फूल और अक्षत सहित पूजन करना चाहिए।
भगवान को घी,गुड और गेहूं के आटे से मीठे पूवे बना कर कास्य पात्र में फल फूल दक्षिणा वस्त्र के साथ भोग लगा कर दान करना चाहिए। धर्म ग्रंथों के अनुसार अधिक मास में शुभ कार्यों को वर्जित कहा गया है। जैसे नामकरण,गृह प्रवेश,जनेऊ संस्कार, मुंडन, विवाह,
नव वधू प्रवेश, गाड़ी खरीदना, नीव पूजन आदि। इस माह में तामसिक भोजन से भी बचना चाहिए जैसे मास मदिरा,लहसुन प्याज़ आदि।
इस मास में किए जाने वाले कार्य है वार्षिक श्राद्ध,मृत्यु तुल्य कष्ट से मुक्ति पाने के लिए रुद्राभिषेक,गर्भधान संस्कार, दान जप,पुंसवन संस्कार व सीमांत संस्कार हो सकता है। इस मास में पुरुषोत्तम मास में भूमि पर शयन करना चाहिए,सादा और सात्विक भोजन करना चाहिएं।

क्या होता हैं अधिकमास ?

जिस माह में सूर्य संक्रांति नहीं होती वह अधिक मास होता है, इसी प्रकार जिस माह में दो सूर्य संक्रांति होती हैं वह क्षय मास कहलाता है। इन दोनों ही मासों में मांगलिक कार्य नहीं होते हैं। हालांकि इस दौरान धर्म-कर्म के पुण्य फलदायी होते हैं। सौर वर्ष 365.2422 दिन का होता है जबकि चंद्र वर्ष 354.327 दिन का रहता है। दोनों के कैलेंडर वर्ष में 10.87 दिन का अंतर रहता है और तीन वर्ष में यह अंतर 1 माह का हो जाता है। इस असमानता को दूर करने के लिए अधिक मास एवं क्षय मास का नियम बनाया गया है।
आगामी वर्ष सं. 2075 वि. में ज्येष्ठ मास अधिक मास के रूप में प्राप्त हो रहा है। सूर्य-चन्द्र के भ्रमण से 3 वर्ष के अंतर पर अधिक मास की स्थिति बनती है। जिस किसी मास में सूर्य की संक्रांति नहीं आती है वह अधिक मास पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है।
व्यतीत समय में वि.सं. 1999, 2018, 2037 व 2056 संवत् के पश्चात् पुन: महान पुण्यप्रद ज्येष्ठ अधिक मास वि.सं. 2057 सन् 2018 में प्राप्त हो रहा है। प्र. ज्येष्ठ शुक्ल 1 बुधवार ता. 16 मई 2018 से द्वि. ज्येष्ठ कृष्ण 30 बुधवार ता. 13 जून 2018 तक रहेगा। ज्येष्ठ अधिक मास के लिए लिखा है ‘ज्येष्ठद्वये नृपध्वंसो धान्यानि शितिसत्तये धान्य का अधिक उत्पादन और सत्ता पुरुषों का नाश होता है।
अधिक मास में उज्जैन में पुराणोक्त सप्तसागरों (रुद्र, क्षीर, पुष्कर, गोवर्धन, विष्णु, रत्नाकर व पुरुषोत्तम सागर) की यात्रा, स्नान व सागरों के निर्धारित दान करने का विधान है। सम्पूर्ण मास धार्मिक कथा-पुराण, पुरुषोत्तम मास की कथा, श्रीमद् भागवत कथा, अवन्ति महात्म्य आदि कथाओं का श्रवण, भजन-कीर्तन, व्रतादि करना चाहिए।
ज्येष्ठ मास अधिक मास होने पर गंगा दशमी का उत्सव पर्व धिक मास में ही मनाने की शास्त्राज्ञा है, शुद्ध मास में नहीं? लिखा है, ‘ज्येष्ठमलमासेसति तत्रैव दशहरा कार्यानतु शुद्धे तदनुसार गंगा दशहरा उत्सव ज्येष्ठ अधिक मास में ता. 24 मई 2018 गुरुवार को शास्त्र सम्मत रहेगा। कुछ लोग अमवश शुद्ध मास में करते हैं, जो गलत है। भगवान श्री हरि को अधिक मास के कारण 1 मास अधिक जागना पड़ेगा। देवशयनी एकादशी आषाढ़ कृष्ण 11 सोमवार 9 जुलाई को प्राप्त होगी।

शास्त्री सौरभ

(गीता भवन मन्दिर. बंगाली मार्केट,नई दिल्ली)

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