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घुमंतू-बंजारा समाज की संवेदनाओं का कितना मोल? – अतुल मलिकराम

नई दिल्ली। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसे समाज में रहने की आदत है, और वह समाज में आपसी सामंजस्य बनाए हुए रहता है. ये कहावत भारत में अत्यधिक प्रचलित है, क्योंकि भारत में विभिन्न प्रकार की जातिया निवास करती है. हर जाती का अपना एक अलग वजूद होता है और उनकी अपनी एक संस्कृति होती है. ये विभिन्न संस्कृति का मेल-जोल ही भारत को अनोखा राष्ट्र बनाता है.

ये विभिन्न प्रकार की संस्कृति क्या आज भी ये जीवित है, शायद नहीं ?, इसका सबसे बड़ा उदाहरण है भारत की सबसे अहम् माने जाने वाली जनजाति घुमन्तु प्रजाति जो आज लुप्त होने की कगार पर है. घुमंतू समाज का नाम लेते ही हमारे सामने एक ऐसी तस्वीर उभरती है, जिन्हे अक्सर घूमता हुआ देखा जा सकता है. जो अपने साथ अपना यूनिक कल्चर, लोकगीत सुनाते चलते है. ये वहीं समाज है जो देश आज़ाद होने से पहले परिवहन, व्यापार और समाज सुधार का काम किया करते थे. यह समाज आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा हैं. इस समाज को आम लोगों से लेकर सरकार तक  नज़र-अंदाज़ किया जा रहा है. इसमें कहीं न कहीं मीडिया और प्रशासन की भी भूमिका रही है. घुमंतू समाज के लोगों की मुख्य समस्याएं मेनस्ट्रीम मीडिया में भी नहीं आती है.

 

इस जनजाति को देश के आज़ाद होने से पहले ही दबाना शुरू कर दिया गया था. 1857 के विद्रोह में कई जनजातियों ने बढ़-चढ़कर कर हिस्सा लिया था. इससे डरे अंग्रेजों ने इस जनजाति को दबाने के लिए 1871 में ‘आपराधिक जनजाति अधिनियम’ बना दिया और लगभग सभी घुमंतू जनजातियों को ‘आपराधिक जनजाति’ घोषित कर दिया गया.  इस पूरे घटनाक्रम का परिणाम यह हुआ कि समाज में इनकी छवि चोर, लुटेरों, हत्यारों और डकैतों की बन गई. देश की आज़ादी के बाद यह कानून तो समाप्त हो गया लेकिन इनकी छवि हमेशा के लिए बदनाम हो गई.

2011 की जनगणना के अनुसार पूरे भारत में घुमंतू समाज के अंतर्गत लगभग 840 समुदाय आते हैं, जिसमें अकेले राजस्थान से 52 समुदाय हैं. इसमें नट,भाट, भोपा, बंजारा, कालबेलिया, गड़िया लोहार, गवारिया, बाजीगर, कलंदर, बहरूपिया, जोगी, बावरिया, मारवाड़िया, साठिया ओर रैबारी प्रमुख हैं. आज सड़कों पर न कठपुतली की नृत्य कला देखने को मिलती है, न ही इनके पारम्परिक लोकगीत सुनने को मिलते है. अगर यही स्थिति रही तो आने वाले 8 से 10 वर्षों बाद कहानियों को बुनने वाली ये प्रजाति सिर्फ कहानी बनकर ही रह जाएगी. भोपा बच्चे जब सारंगी बजाते है वह आपका मन मोह लेते है. कठपुतली नचाने से लेकर नाटक करना भाट लोग गजब के कलाकार हैं. बहरूपिया की बात करने की कला. बंजारे बेहतरीन शिल्पकार, नक्काशी जानते हैं. हम इस समाज के बच्चों को अच्छी शिक्षा देकर कॉमनवेल्थ गेम्स-जिम्नास्टिक साथ ही कुछ अन्य स्पोर्ट्स में भी ट्रैन कर सकते हैं, क्योंकि इन बच्चों में पुश्तैनी टेलेंट होता है और ये टेलेंट देश के काम भी आ सकता है.

ये समाज न सिर्फ अपनी कला बल्कि आयुर्वेद ज्ञान के लिए भी जाना जाता है. अगर यह समाज नही बचेगा तो इनका ज्ञान, परम्परा और रंग-बिरंगी संस्कृति भी लुप्त हो जाएगी. हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि इनका ज्ञान, सिर्फ बातूनी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि इनकी जीवन यात्रा के दौरान प्राप्त किया हुआ है. अमूमन ये लोग आज भी घूमते रहते है, लेकिन इनके पास रोज़गार नहीं है. सरकार के मुद्दों से ये इसलिए गायब है, क्योंकि इनका कोई एक ठिकाना नहीं है और इस कारण इनमे से कई लोग वोट नहीं दे पाते हैं. अगर इन्हे और इनकी आने वाली पीढ़ियों को सही दिशा और मार्गदर्शन दिया जाए तो निश्चित ही ये भारत का  नाम रोशन कर सकते है.

 

टीम डिजिटल

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