विकास के बीच 13 हजार नवजात बच्चो की मौत !

राजस्थान में पिछले छह माह में सरकारी अस्पतालों में 13 हजार से ज्यादा नवजात बच्चों की मौत हो गई। इनमें से अकेले अक्टूबर में 1527 बच्चों की मौत हुई है। इन आंकड़ों के साथ केवल राजनीति तो हो सकती है ,संभव हो कि रुदाली भी दिखे लेकिन यह स्थिति पैदा क्यों हुयी कि इतनी बड़ी तादात में हमारे बच्चे मौत के मुँह में समाते चले गए?

अखिलेश अखिल

राजस्थान । यह है हमारे लोकतंत्र और विकासवादी राजनीति का नया नजारा कि राजस्थान में पिछले छह माह में सरकारी अस्पतालों में 13 हजार से ज्यादा नवजात बच्चों की मौत हो गई। इनमें से अकेले अक्टूबर में 1527 बच्चों की मौत हुई है। इन आंकड़ों के साथ केवल राजनीति तो हो सकती है ,संभव हो कि रुदाली भी दिखे लेकिन यह स्थिति पैदा क्यों हुयी कि इतनी बड़ी तादात में हमारे बच्चे मौत के मुँह में समाते चले गए? इसके लिए जिम्मेवार कौन होगा ? जब लोकतंत्र के नाम पर वादों की चासनी में जनता को मोह कर अपने बस में करके सरकार बनाने और बिगाड़ने का खेल चलता है तब किसी को इसका भान तक नहीं होता कि जिसके हाथ में सत्ता जनता सौप रही है ,वही सरकार और सत्ता जनता के साथ इस तरह का खेल करेगी। ऐसा नहीं है कि बच्चो की मौत की यह कहानी कोई पहली बार देखने को मिल रही है। अभी कुछ ही महीने पहले भी इसी तरह की कहानी गोरखपुर में भी देखने को मिली थी। पश्चिम उत्तरप्रदेश में देखने को मिली थी और मध्यप्रदेश में भी। सरकारी इलाज के फेर में जिसके वंश ,जिनकी औलाद इस दुनिया से चले गए वे तो लौट कर आएंगे नहीं लेकिन यह लोकतंत्र और ऐसी सरकार बरकरार रहेगी। लेकिन आखिर ये सब किस काम की ?
राजस्थान के अस्पतालों में हुयी इस मौत की जानकारी खुद सरकार ने पेश की है। मौत के ये आंकड़े सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दी गई एक रिपोर्ट में दी गयी है।
आपको बता दें कि राजस्थान के बांसवाडा जिले में 53 दिन में 80 से ज्यादा बच्चों की मौत मीडिया में आने के बाद हाईकोर्ट ने इस पर स्वतः संज्ञान लिया था और सरकार से इस बारे में रिपोर्ट मांगी थी।सरकार की ओर से दिए गए जवाब में बताया गया है कि अक्टूबर तक पिछले छह माह में कुल 13673 बच्चों की मौत हुई है। सरकार ने बताया कि है कि मौतों का सबसे बड़ा कारण मेडिकल स्टाफ की कमी के अलावा अशिक्षा और खस्ताहाल सडकें है। इस मामले की अगली सुनवाई सात दिसम्बर को होगी।
ऐसे में सवाल तो कई उठ रहे हैं। यहां केंद्र सरकार की बातें छोड़ भी दी जाए तो राज्य सरकार से तो पूछ ही जाना चाहिए कि इन मौतों के पीछे जो कारन राज्य सरकार ने बताये हैं उसके लिए जिम्मेदार कौन हैं ? अगर खराब सड़को की वजह से मरीजों की मौत हुयी है तो ख़राब सड़के अभी तक राज्य में क्यों हैं ?फिर वसुंधरा राजे की सरकार अभी तक सड़कों का निर्माण क्यों नहीं कराया है ? जब सड़के जैसी मुलभुत सुविधाएं ही नहीं है तो विकास की सारी बातें बेईमानी के सिवा और कुछ भी नहीं। राज्य सरकार ने यह भी कहा है कि अस्पतालों में सरकारी सटाफ की बहुत कमी है। सरकार का यह भी मानना है कि लोगों में अशिक्षा की वजह से भी बच्चों की मौत हुयी है। ये तमाम कारण वैसे हैं जो राज्य सरकार के जिम्मे आते हैं। अशिक्षित समाज को शिक्षित करने की जिम्मेदारी आखिर राज्य सरकार के ऊपर ही तो है। कहते हैं कि शिक्षा प्रचार और प्रसार के नाम सरकार अरबों रुपये खर्च कर रही है फिर भी अशिक्षा का रोना सामने आ रहा है। सरकार बनाते समय तो सरकार ने यह वादा नहीं किया था कि अशिक्षा के कारण बच्चों की मौत होती रहेगी। फिर अगर अस्पाताल में मेडिकल स्टाफ की कमी है तो इसकी सजा जनता को क्यों दी जा रही है। सरकार को किसने रोका है कि स्टाफ की कमी को दूर नहीं करे।
सच्चाई तो यही है कि जब लूटतंत्र लोकतंत्र पर हावी हो जाए तो उस लोकतंत्र के मायने नहीं रह जाते। जनता को जान की हिफाजत ,स्वास्थ्य ,शिक्षा ,भोजन ,पानी और विजली की जरुरत होती है। जो सरकार इन मुलभुत सुविधाओं को भी मुहैया नहीं करा सकती उसे रहने का क्या औचित्य है।

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