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नया सियासी शगल, राजनीति वाया पीआर एजेंसी

अहम सवाल है कि चुनाव जीतने और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी पर बढ़त हासिल करने के लिए फर्जी तौर-तरीकों को कितना जायज माना जा सकता है। अगर साधन ही अपवित्र हैं तो फिर उससे भला होने की कितनी उम्मीद की जा सकती है। आखिर समर्थन की जो फर्जी तस्वीर बनाई जा रही है, वह किसके भले के लिए बनाई जा रही है?

सुभाष चंद्र

राहुल गांधी इन दिनों लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। उनके बयान समाचार पत्र और चैनल ही नहीं, सोशल मीडिया पर भी खूब छा रहे हैं। खूब शेयर किये जा रहे हैं। खूब लाइक भी मिल रहे हैं। अभी तक आ रही खबरों से पता चला है कि यह सब नकली समर्थन है। इंटरनेट की दुनिया पहले से ही नकली मानी जाती है। अब उस नकली में भी नकली होने लगे तो…। अब नेताओं और कार्यकर्ताओं का जन-संपर्क अभियान और पब्लिक की नब्ज़ पकड़ने की कला जवाब देने लगी है। कहते हैं दुनिया के पुराने धंधों में से एक ‘राजनीति’ के खिलाड़ी काफी चतुर होते हैं, लेकिन अब उनकी चतुराई के ऊपर भी आदेश देने वाले और रणनीतियां बनाने वाले बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं।

कहा जा रहा है कि राहुल गांधी की टीम ने इसके लिए एक एजेंसी को हायर किया है। वह एजेंसी अपने ग्राहकों का शेयर और लाइक बढ़ाती है। ऐसा नहीं है कि ऐसा पहली बार किया जा रहा है। दरअसल अब सोशल मीडिया का महत्व काफी बढ़ चुका है। दुनिया भर के सभी प्रमुख दलों ने अपनी छवि और प्रचार के लिए इंटरनेट पर काम करने के लिए टीम बना रखी है और एजेंसी को बहाल कर रखा है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान इस तरह की खूब खबरें आई थीं। कई ऐसे नेता थे, जिनके दूसरे देशों के एकाउंट से हर बार शेयर और लाइक मिलते थे। अब सोशल मीडिया पर समर्थकों की संख्या से भी नेताओं का कद आंका जाने लगा है। इसमें भारतीय नेता ही नहीं, दुनिया भर के नेता शामिल हैं।

देखा जाए तो यह ट्रेंड ‘डेमोक्रेसी’ के लिए थोड़ा अटपटा सा है, क्योंकि जनता में जो ‘एजेंसियां’ या ‘कंसल्टेंट’ किसी नेता या पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, वह जनता के प्रति जवाबदेह तो हैं नहीं और उनका उद्देश्य ‘येन, केन, प्रकारेण’ जीत हासिल करना होता है, वह भी ‘कॉर्पोरेट स्टाइल’ में। इसके लिए वह टेक्नोलॉजी से लेकर, तमाम मीडिया ऑप्शन और पैसे का खुलकर प्रयोग करते हैं, जबकि इसकी एवज में राजनीतिक पार्टियां उन्हें दुसरे लाभों के साथ ‘खासी रकम’ भी देती हैं। यह रकम इतनी बड़ी होती है, जिस पर एकबारगी यकीन नहीं होता है, मसलन 500 करोड़ से लेकर हज़ार करोड़ और ऐसे ही आंकड़े! जाहिर है, हमारा चुनाव आयोग तमाम ‘चुनावों’ में कम पैसे खर्च करने पर ज़ोर देता रहा है, किन्तु देश के चुनाव तो एक ‘उद्योग’ के रूप में विकसित हो रहे हैं, एक बड़े उद्योग के रूप में! ऐसे में जनता पर बोझ पड़ना तो तय ही है। पीआर यानि ‘पब्लिक रिलेशन’ और पीआर कंपनियों का काम होता है ‘ब्रांडिंग और इमेज बिल्डिंग’ जिससे नेताओं या पार्टी की समाज में सकारात्मक छवि बनायी जा सके और उसके सहारे उसकी ‘चुनावी’ नैय्या पार हो सके! इसकी कार्यप्रणाली की बात करें तो, पीआर कंपनियां जनता या टार्गेट ऑडियंस के मन में किसी भी पार्टी की सकारात्मक इमेज बनाने में सक्षम होती हैं और इसके लिए, गलत या सही तरीके से टार्गेट ऑडियंस को प्रभावित करने वाले लोगों और चीजों पर उनका ध्यान सर्वाधिक होता है।
एजेंसी को हायर करना कोई गलत बात नहीं है, लेकिन उसके माध्यम से छवि चमकाना और लोगों को भ्रमित करना बेशक गलत है। यह सीधे तौर पर जनता के साथ धोखाधड़ी है। अब तो और भी मामला खतरनाक होने लगा है। साइबर टीम अब अपने नेता के पक्ष में झूठे आंकड़े भी प्रसारित करने लगी है और साथ ही प्रतिद्वंद्वी नेता की छवि खराब करने के लिए भी। प्रयास यह कराया जाता है कि मैसेज किसी तरह वायरल हो जाए।

 

 

सुभाष चन्द्र

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