हर चार मिनट में सड़क दुर्घटना से एक मौत

भारत में हर साल 4.8 लाख सड़क दुर्घटनाओं के 25 फीसदी शिकार काम पर जाने वाले होते हैं. ‘कंपनियों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि अपने कर्मचारियों में सड़क सुरक्षा की संस्कृति का विकास करें’: फिक्की-ईवाई रिपोर्ट

नई दिल्ली। साल 2016 में भारतीय सड़कों पर दुर्घटनाओं की वजह से करीब 1.5 लाख लोगों की मौत हो गई और इसके अलावा बहुत से लोग घायल हो गए। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार भारत में मौतों की सातवीं सबसे बड़ी वजह सड़क हादसे हैं। दुनिया भर में सड़कों पर होने वाली मौतों का 10 फीसदी हिस्सा भारत में होता हैं। साल 2016 के दौरान भारत में करीब 4.8 लाख सड़क दुर्घटनाएं हुईं, यानी हर मिनट में एक सड़क दुर्घटना और हर चार मिनट में सड़क दुर्घटना से एक मौत।
सड़क दुर्घटनाओं में से 25 फीसदी शिकार काम पर जाने के सिलसिले में यात्रा करने वाले होते हैं। इसलिए कॉरपोरेट जगत को अपने कर्मचारियों की सड़कों पर सुरक्षा के बारे में ज्यादा गंभीर होना चाहिए। सड़क दुर्घटना से होने वाली चोटों/ मौतों का असर लोगों के व्यक्तिगत, सामाजिक और आर्थिक जीवन पर पड़ता है। इन दुर्घटनाओं से होने वाले सीधे आर्थिक नुकसान का तो आकलन किया जा सकता है, लेकिन पीड़ित के आगे कमाई जारी रख पाने की अक्षमता से जो अप्रत्यक्ष नुकसान होता है, उसको मापना कठिन होता है।
एशिया और प्रशांत क्षेत्र के संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक आयोग (यूएनईएससीएपी) के द्वारा एशिया-प्रशांत के 19 देशों में किए गए एक अध्ययन के अनुसार साल 2015 में सड़क दुर्घटनाओं का भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर जीडीपी का 3 फीसदी यानी अगर मूल्य के हिसाब से देखें तो करीब 5,800 करोड़ डॉलर तक था। इस तरह मूल्य के लिहाज से भारत इस मामले में सिर्फ जापान (6300 करोड़ डॉलर) से ही पीछे है, जबकि जीडीपी में हानि के हिसाब से देखें तो यह ईरान के बाद आता है, जहां यह जीडीपी का 6 फीसदी (3,069.70) करोड़ डॉलर तक है। सड़क सुरक्षा की समस्याओं से लड़ने के लिए डब्ल्यूएचओ ने बहुपक्षीय रवैया निर्धारित किया है जिसमें ‘4E’ पर मुख्य जोर है – एजुकेशन (शिक्षा), एनफोर्समेंट (प्रवर्तन), इंजीनियरिंग और इमरजेंसी। ये सड़क सुरक्षा के नियमों के बारे में जागरूकता बढ़ाने, बेहतर रेगुलेशन सुनिश्चित करने और ट्रैफिक नियमों का पालन सुनिश्चित करने, सड़क बुनियादी ढांचे में सुधार और प्लेटिनम/गोल्डन आवर (30/60 मिनट) में सड़क दुर्घटना के पीड़ित को मदद सुनिश्चित करने से संबंधित हैं।
दुनिया भर में होने वाली पेशेगत मौतों का करीब 36 फीसदी हिस्सा सड़क दुर्घटनाओं की वजह से होता है। कर्मचारियों के लिए सड़क सुरक्षा कार्यक्रमों में निवेश से कॉरपोरेट जगत को भी कई फायदे होते हैं, मसलन कर्मचारियों की सुरक्षा, उनके अपने संपत्ति की सुरक्षा, उत्पादकता में होने वाले नुकसान में कमी और कर्मचारियों की नजर में कंपनी के बारे में धारणा बेहतर होना।यह भी महत्वपूर्ण है कि कंपनियां एक ऐसी संस्कृति विकसित करें जो कर्मचारियों में सड़क सुरक्षा को प्रोत्साहित करे और प्रेरित करे।कर्मचारी सुरक्षा एक व्यापक दायरे वाली जरूरत है और इस बारे में रवैया व्यावहारिक तथा सहकारी प्रकृति का होना चाहिए। कॉरपोरेट जगत एक सामान्य “Plan (योजना बनाओ), Do (करो), Check (जांच करो) और Act (कार्रवाई करो)” (P-D-C-A) रवैया अपनाकर अपने कर्मचारियों की सड़क पर सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकता है। संगठनों में पीडीसीए के तहत सड़क सुरक्षा का प्रबंधन करने के लिए जोखिमों की प्राथमिकता तय करने और मूल्यांकन करने, कर्मचारियों से परामर्श करने और उन्हें प्रशिक्षण एवं जानकारी मुहैया कराने, सफलता और सड़क सुरक्षा योजना के विचलन को मापने और अनुभवों से सीख लेते हुए कार्रवाई करने की जरूरत है।
साथ ही, सड़क सुरक्षा पहल के लिए सरकार- कॉरपोरेट गठजोड़ से सबका फायदा हो सकता है। सरकार कारोबार जगत के नवाचार, डेटा, पहुंच और वित्तीय संसाधनों का फायदा उठा सकती है, जबकि कारोबार जगत अपने कर्मचारियों की सड़क सुरक्षा बढ़ाने के लिए सुरक्षित सड़कों, बेहतर कानूनों और बेहतर वाहन मानकों का फायदा उठा सकता है। आंतरिक सुरक्षा पर फिक्की की समिति के अध्यक्ष श्री जी के पिल्लई ने कहा, “फिक्की का यह मानना है कि भारत के कारोबार जगत को इसमें शामिल करने से सरकार के प्रयासों को और तेजी मिल सकती है। संयुक्त राष्ट्र ने साल 2011-20 को सड़क सुरक्षा पर कार्रवाई का दशक घोषित किया है, इसलिए सरकार, उद्योग और नागरिक समाज को मिलकर सामूहिक कार्रवाई करने की जरूरत है। ”

 

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