विवाहेतर प्रेम में यही होता है 

बड़ी लोमहर्षक कथा है शैलजा द्विवेदी की। दीमापुर से मौत कैसे  दबे पांव दिल्ली तीन चली आई, वह भी समझ नहीं पाई। कभी शैलजा के पति अंकित और मेजर निखिल हांडा एकसाथ दीमापुर में तैनात थे। दोस्त थे। पारिवारिक प्रेम था लेकिन यह प्रेम विवाहेतर संबंधों में कब बदल गया? शैलजा के पति अंकित के पति ने वीडियो कॉल करते पकड़ा और समझाया कि यह आम रास्ता नहीं है। यह पहाड़ी मोड़ की तरह खतरनाक है।
फिर शैलजा ने बचने का प्रयास किया, लेकिन निखिल बहुत आगे निकल शादी के लिए दबाव बनाने दीमापुर से दिल्ली तक चला आया। जब दबाव काम नहीं आया तब शैलजा को अपनी सिटी होंडा से ले गया, स्नाफर चाकू से बुरी तरह गला रेत दिया। फिर रफूचक्कर हो गया। लेकिन चंद घंटे के भीतर ही मेरठ में काबू कर लिया गया।
संगम फिल्म की लव त्रिकोण की कहानी यही है, लेकिन इसमें प्रेमी राजेन्द्र कुमार अपनी जान देता है। निखिल की तरह प्रेमिका की जान लेता नहीं, वह भी इतनी क्रूरता से। हद है। यही प्रेम है ? यह तो वासना है। तू अगर मेरी नहीं, तो पराई भी नहीं, पर वह तो पहले से पराई ही थी। फिर किसलिए अपने और द्विवेदी परिवार को बर्बाद किया? क्या मिला? सिवाय पछतावे के?
शैलजा के जिस तरह के वीडियोज हैं और फोटोज हैं,  उनसे वह बहुत महत्वाकांक्षी महिला के रूप में सामने आती हैं। हो सकता है पति इतनी आजादी न दे रहे हों। गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका रही शैलजा उच्च शिक्षा प्राप्त थी। कोई कमी नहीं आता थी। मिसेज की प्रतियोगिता में बहुत करीब तक गयी। एक छह साल का बेटा भी। फिर किस सुख की तलाश थी? एक गाने की पंक्तियां हैं :
मेरे दिल ये बता
तेरी मर्जी है क्या
क्या पाया नहीं तूने
क्या खोज रहा है तू ?
शैलजा किस मृगतृष्णा के पीछे भाग रही थी? क्या खोज रही थी? विवाहेतर संबंधों का यही हश्र होता है। वही हुआ। यह आम रास्ता नहीं है, न हो सकता है । इस लव ट्रेंगल से किसी एक को जाना ही होता है। सो, शैलजा को यह खेल छोड़ कर जाना पड़ा। यह खेल बहुत खतरनाक है । इससे बचने का कोई उपाय नहीं मिला निखिल को, पर वह सच्चा प्रेमी था तो शैलजा को क्यों खुद को नुकसान पहुंचाता?
आयुषी कांड ने भी ऐसे ही दहला दिया था। बेशक वह विवाहेतर प्रेम नहीं, बल्कि किशोरवय का प्रेम रहा होगा, पर आज तक इसमें खुलासा नहीं हुआ कि सच्चाई में हुआ क्या था? अभी अक्षय कुमार की फिल्म भी आई नानावटी केस पर। वह भी प्रेम त्रिकोण पर थी। बहुत फिल्में बन चुकीं, लेकिन ज्यादातर संदेश प्रेम के लिए बलिदान का देती हैं न कि हत्या का। संभवत: सीख एक को , सबक हम सबको।
  •  कमलेश भारतीय 

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