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श्रद्धा से करें श्राद्ध, तो मिलेगा पुण्य


दीप्ति अंगरीश

पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके तर्पण के निमित्त श्राद्ध किया जाता है। यहां श्राद्ध का अर्थ श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों के प्रति सम्मान प्रकट करने से है। श्राद्ध पक्ष में अपने पूर्वजों को एक विशेष समय में 15 दिनों की अवधि तक सम्मान दिया जाता है। इस अवधि को पितृ पक्ष अर्थात श्राद्ध पक्ष कहते हैं। हिंदू धर्म में श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, जब सूर्य का प्रवेश कन्या राशि में होता है तो उसी दौरान पितृ पक्ष मनाया जाता है। पितरों की आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान को सर्वोत्तम माना गया है।
वेद एवं ऋषियों के ग्रन्थ पढ़ने पर यह तथ्य सामने आता है कि शास्त्रों में जहां जहां श्राद्ध का वर्णन हुआ है वह जीवित पितरों का श्राद्ध करने के लिए ही हुआ है। भोजन कौन खा सकता है?, वस्त्र कौन धारण कर सकता है? आशीर्वाद कौन दे सकता है? यह सब कार्य जीवित पितर ही कर सकते हैं। यदि यह सब कार्य हम पण्डितों व पुजारियों को सामान देकर करेंगे तो इसका लाभ पितरों को न होकर उन पण्डित-पुजारियों को ही होगा। आश्चर्य इस बात का है कि आज के वैज्ञानिक युग में भी लोग इन मध्ययुगीन अन्धविश्वासपूर्ण बातों पर विश्वास करते हैं और हमारे पण्डे-पुजारी लोगों की धार्मिक भावना व उनके भोलेपन व सज्जनता का गलत लाभ उठाते हैं।

महर्षि दयानन्द व आर्यसमाज की कृपा से हमारे वेद आदि सभी शास्त्र हिन्दी अनुवाद सहित उपलब्ध है जिसे पांचवी कक्षा पास व्यक्ति भी आसानी से पढ़ व समझ सकता है। अब स्वामी दयानन्द जी कृपा से वेदों पर ब्राह्मण वर्ग का एकाधिकार नहीं रहा अपितु यह मानवमात्र को मिल चुका है। अनेक दलित भाई व बहिन भी आर्यसमाज के गुरूकुलों में पढ़ते हैं और वेदों के अच्छे विद्वान है। यह अतिरंजित बात नहीं अपितु तथ्यपूर्ण है कि हमारे आर्यसमाज के अनेक दलित परिवारों में जन्में स्त्री व पुरूष ब्राह्मणों के शास्त्रीय गुणों कर्म व स्वभाव से पूर्ण हैं और वेदों पर अधिकारपूर्वक प्रवचन करने के साथ यज्ञ व महायज्ञ भी सम्पन्न करते व कराते हैं।
हमारे कत्र्तव्य कर्म उन सभी लोगों के लिए हैं जो वर्तमान में हैं, अतीत में रहे हैं तथा भविष्य में आने वाले हैं। इस दृष्टि से दैवीय गुणों, धर्म-संस्कृति एवं समाज की सनातन परंपराओं से जुड़े व्यक्तियों का सीधा सा संबंध भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों से जुड़ा रहता है। आत्मा नित्य और अमर है, पूर्वजन्म और पुनर्जन्म में हमारा प्रगाढ़ विश्वास है और इस दृष्टि से हमारे प्रत्येक कर्म, स्वभाव और व्यवहार का असर हर युग में पड़ता है।
हमारा यह सनातन रिश्ता न सिर्फ बीते किसी युग से होता है बल्कि कई-कई युगों से हमारे तार मजबूती से बंधे रहते हैं और आने वाले कई जन्मों तक यों ही किसी न किसी रूप में सम्बद्ध रहा करते हैं। संबंधों के मामले में कई सारे साक्षात होते हैं, बहुत सारे आभासी होकर अनुभवित होते हैं और ढेरों संबंध ऎसे हुआ करते हैं जो अदृश्य होते हैं और किसी न किसी कर्षण शक्ति की वजह से हमेशा सेतु के रूप में पीढ़ियों को जोड़े रखते हैं।
यह जरूरी नहीं कि ये मनुष्य-मनुष्य में ही हों। मनुष्य के अदृश्य तंतुओं भरे संबंध प्रायःतर देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों, सिद्धों, तपस्वियों से लेकर पितरों और भूत-प्रेतों तक किसी से भी हो सकते हैं। ये सभी दिव्य आत्माएं हैं जिनके लिए शरीर की आवश्यकता नहीं होती बल्कि इनका समस्त व्यवहार और लोक व्यापार अशरीरी ही होता है।
यही कारण है कि हम वर्तमान में जिन स्थूल पदार्थों को औरों की प्रसन्नता के लिए अर्पित करते हैं वे सूक्ष्म तत्वों के रूप में रूपान्तरित व उनके अनुकूल होकर उन तक पहुंचते हैं। इन सभी तक अपनी श्रद्धा पहुंचाने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग समय निर्धारित है और इसी दौरान जो कुछ श्रद्धा भाव से किया जाता है वह इन्हें प्राप्त होता है। जितनी अधिक श्रद्धा होगी उतनी अधिक इनकी प्रसन्नता का अनुभव किया जा सकता है।
यही कारण है कि पितरों के निमित्त श्राद्ध पक्ष निर्धारित है जिसमें हमारे समस्त पितर पृथ्वी लोक के निकट होते हैं और उन्हें अपने वंशजों से इस अवधि में श्राद्ध के रूप में प्राप्ति और वरदान देने की आकांक्षा साल भर से बनी रहती है।
श्राद्ध पक्ष में हमारा समस्त ध्यान पितरों की तरफ लगा रहे इसलिए दूसरे काम्य कर्मों को वर्जित किया हुआ है अन्यथा हम अपने स्वार्थों में इतने अधिक उलझे रहें कि पितरों की तरफ पर्याप्त ध्यान ही नहीं दे पाएं।
श्राद्ध श्रद्धा का प्रतीक है जिसमें अपने पुरखों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का अहसास करना हम सभी का प्राथमिक फर्ज है। जो इसे फर्ज समझकर पूरी श्रद्धा से निभाते हैं उन्हें आत्मतुष्टि भी प्राप्त होती है और पितरों की कृपा का भी वर्ष भर अनुभव करते रहते हैं।
जो लोग इसे भार या परंपरा समझ कर जैसे-तैसे श्रद्धाहीनता से औपचारिकता पूरी कर लेने के आदी होते हैं उनके लिए कुछ कहना व्यर्थ है क्योंकि जिनमें श्रद्धा का अभाव है वह जीवन में किसी भी प्रकार से सुगंध का अहसास नहीं कर सकते।
श्रद्धा हमारे जीवन के प्रत्येक कर्म के लिए वह ऊर्जा है जो आशातीत सफलता भी दिलाती है और निरन्तर आगे बढ़ते रहने के लिए दिव्य प्रेरणा का संचार भी करती है।
श्राद्ध को लेकर जो भी परंपराएं और नीति-नियम निर्धारित हैं, उनका पूरा-पूरा पालन करते हुए अपनी सम्पूर्ण श्रद्धा और पितरों के प्रति आस्था के साथ श्राद्ध करें और इसमें औपचारिकता निर्वाह की बजाय इस बात का ध्यान रखें कि किस तरह हमारे पितर हम पर प्रसन्न हो सकते हैं।
श्राद्ध पक्ष में अपने पितर विशिष्टतम व दुर्लभ अतिथियों के रूप में उपस्थित रहते हैं। दूसरे अतिथियों को तो साल भर में कभी भी अपनी सहूलियत देखकर बुलाया और जिमाया जा सकता है लेकिन पितरों के लिए केवल श्राद्ध पक्ष ही निर्धारित है। इसमें पूरे मनोयोग से जुटें और पितरों की प्रसन्नता व कृपा प्राप्ति के लिए उदारतापूर्वक सारे जतन करने में कहीं कृपणता का भाव न लाएं।
श्राद्ध में महत्त्व छप्पन भोग, मिष्टान्न और तरह-तरह के व्यंजनों का नहीं है, जीमने वालों की अधिकाधिक संख्या का भी नहीं है बल्कि श्राद्ध के लिए निर्धारित समय में पूरी श्रद्धा समर्पित करने का है। जो जितनी अधिक श्रद्धा से पितरों का आवाहन, तर्पण, भोज आदि करता है उसे उतना अधिक लाभ प्राप्त होता है। भरपूर श्रद्धा समर्पण के साथ पिछली पीढ़ियों के प्रति तन, मन और धन से कृतज्ञता अर्पित करें और जीवन में आनंद पाएं। श्राद्ध में हमारी अपरिमित श्रद्धा भावना से हमारे समस्त पितर तुष्ट हों, गति-मुक्ति को प्राप्त करें, यही कामना है।

दीप्ति अंगरीश

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