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जीवट ही नहीं, बेहद सहृदय व्यक्ति थे महाशय धर्मपाल जी

दीप्ति अंगरीश

महाशय धर्मपाल गुलाटी जी जितने जीवट व्यक्ति थे, उससे कहीं अधिक सहृदय व्यक्ति थे। बीते साल ही मैंने आखिरी मुलाकात की थी। आखिरी मुलाकात इसलिए कि अब वे दैहिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं। दिवाली के आसपास का समय था। उसके बाद मिल नहीं पाईं। यह पूरा साल तो कोविड के नाम रहा। यूं ही अपनों से मिलने में भी दिक्कत आती है। हां, उससे पहले जब भी वे मिले थे, पितृवत स्नेह दिया। मिलने पर पूरे परिवार का कुशलक्षेम पूछते थे। ऐसा आमतौर पर नहीं होता है। जब आप पत्रकारीय दुनिया में हों और लोगों से व्यवसायिक संबंध हों, तो लोग व्यक्तिगत संबंधों को तरजीह नहीं देते हैं।
कोरोना काल ने कई अपनों को हमसे जुदा किया। पता नहीं था कि साल के आखिरी महीने की एक सुबह ऐसी भी होगी, जब महाशय जी भी हमें छोड़कर सदा के लिए विदा हो जाएंगे। महाशय धर्मपाल गुलाटी (Dharampal Gulati) का जन्म 27 मार्च 1923 में पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ था। 1933 में 5 वी कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने पढ़ना पढाई छोड़ दिया और 1937 में पिता का हाथ बंटाते हुए एक छोटा सा व्यापार प्रारम्भ कर दिया। इस बीच उन्होंने साबुन का कारोबार किया और नौकरी भी की। इस दौरान कपड़े, चावल आदि का भी कारोबार किया लेकिन कोई कारोबार नहीं टिका। फिर उन्होने अपने पारिवारिक कारोबार मसालों का कारोबार शुरू किया।
मसाला ब्रांड एमडीएच के मालिक ‘महाशय’ धर्मपाल गुलाटी का गुरुवार सुबह निधन हो गया है। वे 98 साल के थे। खबरों के मुताबिक, गुलाटी का पिछले तीन हफ्तों से दिल्ली के एक अस्पताल में इलाज चल रहा था। गुरुवार सुबह उन्हें दिल का दौरा पड़ा। उन्होंने सुबह 5:38 बजे अंतिम सांस ली। इससे पहले वे कोरोना से संक्रमित हो गए थे। हालांकि बाद में वे ठीक हो गए थे। पिछले साल उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
महाशियां दी हट्टी (एमडीएच) देश में मसालों का बड़ा ब्रांड है। वह मसालों के मैन्युफैक्चर, डिस्ट्रिब्यूटर और एक्सपोर्टर हैं। एमडीएच की स्थापना साल 1919 में सियालकोट (पाकिस्तान) में महाशय चुन्नी लाल ने की थी। तब वह मसालों कि एक छोटी दुकान चलाते थे। थोड़े ही समय में वह काफी फेमस हो गए थे और उन्हें वहां ‘डेगी मिर्च वाले के नाम से लोग जानने लगे। जब देश का बंटवारा किया गया तो वह भारत लौट आये और 27 सितम्बर 1947 को वह दिल्ली पहुँचे। उन दिनों उनके जेब में महज 1500 रुपये ही थे। इन पैसों से उन्होंने 650 रुपये का टांगा खरीद लिया। जिसे वह न्यू दिल्ली स्टेशन से लेकर कुतब रोड और उसके आस पास चलाते थे। मन में पारिवारिक व्यवसाय को प्ररम्भ करने का जूनून ख़त्म नहीं हुआ था। अपने पिता के कारोबार को आगे बढ़ाने के बारे में सोचा। व्यवसाय को प्रारम्भ करने के लिए छोटे लकड़ी के खोके ख़रीद कर उन्होंने इस व्यवसाय को प्रारम्भ किया। उन्होंने बाद मेंउन्होंने करोल बाग के अजमल खां रोड पर ‘महाशियां दी हट्टी ऑफ सियालकोट (डेगी मिर्च वाले)’ के नाम से दुकान खोल ली। इसके बाद उन्हें कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। आज महाशियां दी हट्टी (एमडीएच) देश में मसालों का बड़ा ब्रांड है। वह मसालों के मैन्युफैक्चर, डिस्ट्रिब्यूटर और एक्सपोर्टर हैं।
गुलाटी की कंपनी ब्रिटेन, यूरोप, यूएई, कनाडा आदि सहित दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भारतीय मसालों का निर्यात करती है। 2019 में भारत सरकार ने उन्हें देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया था। एमडीएच मसाला के अनुसार, धर्मपाल गुलाटी अपने वेतन की लगभग 90 प्रतिशत राशि दान करते थे।

दीप्ति अंगरीश

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