प्रमुख सुर्खियाँ :

खेत होगा खुशहाल, तो लोग होंगे संपन्न: सुभाष चंद्र त्यागी

नई दिल्ली। जब तक देश के अन्नदाता सुखी और खुशी नहीं होंगे, देश का अपेक्षित विकास नहीं होगा। इसके लिए जरूरी है कि हमारे खेतों की उर्वरता बरकरार रहे और फसलों पर किसी प्रकार का दुष्प्रभाव नहीं पडे। बुराडी गांव के किसान और समाजसेवी सुभाष चंद्र त्यागी बीते कई वर्षों से खेतों की उर्वरता को कायम रखने के लिए अभियान चलाए हुए हैं। वे कहते हैं कि जब हम किसान जैविक खेती की ओर बढेंगे, तो हमारे खेत भी उन्नत होंगे। फसल भी बढिया होगा। जाहिर है इससे किसान खुशहाल होगा, तो समाज और देश की तरक्की खुद ब खुद होगी।
किसान और समाजसेवी सुभाष चंद्र त्यागी ने विभिन्न जैविक उत्पादों को तैयार करने की विधि के बारे में किसानों को जागरूक किया। जिसमें मुख्य रूप से पंचगव्य का फसलों में प्रयोग तथा उसके बनाने की विधि किसानों को बताई गई। उन्होनें बताया कि 1 लीटर गोमूत्र से हम कम से कम लागत में अधिकतम उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं जिसका दुष्प्रभाव हमारे शरीर पर नहीं पड़ेगा। उन्होनें कहा कि बीजों को गौमूत्र एवं मट्ठे से बोने से उसमें रोग एवं कीटों का प्रभाव कम से कम होता है। साथ ही जमाव भी अच्छा होता है। इसके प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता भी अच्छी बनी रहती है। वर्तमान परिस्थितियों में पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा देने की जरूरत है। उन्होनें किसानों को वेस्ट डी कंपोजर, जीवामृत तथा पौधों से तैयार होने वाले फसल सुरक्षा उपायों की विस्तार से जानकारी दी। जैविक खेती ही एक ऐसा माध्यम है जिससे हम सतत एवं सुरक्षित उत्पादन ले सकते हैं।
सुभाष चंद्र त्यागी ने अपने खेतों में वेस्ट डी कंपोजर भी खुद ही तैयार करता है। इसके लिए जहां खेतों में पानी की सिंचाई के लिए मुख्य सप्लाई वाली जगह पर 200 लीटर का ड्रम रखा हुआ है। जिसमें वह पानी भरकर 2 किलो गुड़ डाल देता है और उसमें डी कंपोजर मिला देता है। और एक सप्ताह के लिए ऐसे ही छोड़ देता है और केवल सुबह शाम दिन में दो बार उस मिश्रण को डंडे के साथ घोलता है। जब फसल को सिंचाई की जरूरत होती है, तो वह सिंचाई वाले पानी के साथ मिश्रण डी कंपोजर से भरे ड्रम का नल भी खोल देता है, जिससे पानी के साथ वह मिश्रण भी खेतों में चला जाता है।
सुभाष चंद्र त्यागी ने बताया कि वेस्ट डी कंपोजर सौलुशन राष्ट्रीय खेती अनुसंधान केंद्र गाजियाबाद का उत्पाद है। एक टन जैविक खाद को तैयार करने में 20 से 25 लीटर वेस्ट डी कंपोजर सौलुशन का इस्तेमाल किया जाता है। इस सौलुशन को गोबर और कृषि अवशेषों में अच्छी तरह मिलाकर ढेर किया जाता है। ढेर को अच्छी तरह बड़े पत्तियां, प्लास्टिक या जुट के बोरा से मलचिंग कर दिया जाता है ताकि ढेर में धुप और पानी से बचाव हो सके। 30 से 40 दिन बाद गोबर और कृषि अवशेष का ढेर पूर्ण रूप से जैविक खाद बन जाता है । यह जैविक खाद मिट्टी में बिगड़ते संतुलन को संभालने का काम करता है। साथ ही फसलों में कीट व रोगों में लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। किसान इस विधि से जैविक खाद का निर्माण कर अपनी आमदनी को बढ़ा भी सकते हैं।

सुभाष चन्द्र

Related Posts

leave a comment

Create Account



Log In Your Account