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योग के साथ मनाएं हैप्पी दिवाली

नई दिल्ली। जहां आपको दिवाली खुशियां देगी, वहीं यही खुशियां आपके लिए अनेक स्वास्थ्य समस्याओं से जकड़ लेगी। कारण आतिशबाजी का धुआं। यह सिर्फ एक दिन नहीं सप्ताह भर तक छाया रहेगा। वातावरण में शुमार प्रदुषण की मोटी परत और मौसम का बदलना श्वास संबंधित रोगों को खुला न्योता है। इस धुएं से श्वास तंत्र प्रभावित होता है। जिसे यह समस्या है उसके लिए दिवाली घातक साबित होती है। और अनेकों को चपेट में ले लेती है। योगाचार्य सुधीर योगी ने कहा दिवाली में व दिवाली के बाद आप खुलकर सांस लें, इसके लिए सुबह-शात कपालभांति करें। इस प्रणायाम को आज से दिवाली के पदं्रह दिनों तक नियमित अभ्यास करें। बेहतर परिणाम के लिए धीरे-धीरे करें। ज्यादा से ज्यादा पानी पीए।ं लंबे श्वास लेने और छोड़ने की आदत डालें। इसे आदत में शुमार करने से फेफड़े अच्छे से काम करते हैं। साथ ही सांस नहीं फूलता और रक्त में प्रचुर मात्रा में आॅक्सीजन पहुंचता है, जो रक्त शु़द्ध करने में सहायक है। इसके अलावा लोम-विलोम प्रणायम का नियमित अभ्यास से प्रदुषित वातावरण में आप खुलकर सांस ले सकते हैं। साथ ही इसका नियमित अभ्यास नर्वस सिस्टम को दुरुस्त रखता है व श्वास संबंधी समस्याओं से सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
योगी सुधीर ने कहा कि इस दिवाली के लिए कपालभाति प्राणायाम सबसे अहम है। कपाल माने माथा और भाति का अर्थ है रोशनी, ज्ञान व प्रकाश। उन्होंने कहा है कि इस प्राणायाम से हमारे मस्तिष्क या फिर सिर के अग्र भाग में रोशनी प्रज्जवलित होती है और हमारे अग्र भाग की शुद्धि होती है। कपालभाति प्राणायाम षटकर्म की क्रिया के अन्र्तगत भी आता है। इसे कपाल शोधन प्राणायाम भी कहा जाता है। उन्होंने बताया कि ज़मीन पर पद्मासन या फिर सुखासन की अवस्था में बैठे फिर पूरे बल से नासिका से साँस को बाहर फेंके, श्वास को लेने का प्रयास न करें, श्वास स्वतः आ जाएगा। जब हमारा श्वास बाहर निकलेगा उसी समय हम अपने पेट का संकुचन करेंगे। पहले धीरे-धीरे इसका अभ्यास करें, उसके बाद धीरे-धीरे श्वास छोड़ने और पेट के संकुचन की गति बढ़ा दें। शुरू-शुरू में नये अभ्यासी कम से कम 20 चक्रों का अभ्यास करें। एक सप्ताह उपरांत 50 चक्रों तक अभ्यास को बढ़ा दें। ध्यान रहे कमर और गर्दन सीधी हो, आँखें बन्द (या खोलकर भी अभ्यास कर सकते है) हो। दोनों हाथ ज्ञान मुद्रा में हो। उन्होंने बताया कि इस प्राणायाम के अभ्यास से नाक, गले एवम् फेफड़े की सफाई होती है, चेहरे पर कांति, लालिमा और ओजस्व आता है। इसे करने से चेहरे की झुर्रियाँ, दाग, फुन्सी आदि दूर होते हैं। कपालभाति प्राणायाम से ईडा नाड़ी और पिंगला नाड़ी की शुद्धि होती है। दमा, तपेदिक, टाईसिल / टाउंसिल आदि के विकार दूर हो जाते हैं। महिलाओं में गर्भाशय के विकार, मासिक धर्म सम्बंधि कठिनाई और गर्भाशय जनित दोष दूर होते है। यह प्राणायाम पाचन संस्थान को मजबूत बनाता है तथा नर्वस सिस्टम में संतुलन लाता है। इससे कपाल की नस-नाड़ियों की शुद्धि होती है, इसलिए इसके अभ्यास से ध्यान की एकाग्रता बढ़ती है, जिससे व्यक्ति तनावमुक्त होता है।
सावधानियां: हृदय रोगी, उच्च रक्तचाप के रोगी, मिर्गी स्ट्रोक, हार्निया और अल्सर के रोगी तथा गर्भवती महिलाएं इसका अभ्यास ना करें। श्वास जल्दी छोड़ने से पेट में दर्द हो सकता है।

टीम डिजिटल

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