कोरोना में गांव अब आपद धर्म भी भूलने लगा है…

मोहन सिंह, दोकटी

रूसी क्रांति की सफलता पर ​प्रसिद्ध तुर्की कवि नाजिम हिकमत कि यह कविता बेहद मशहूर हुई-
कल बहुत जल्दी होता
…और कल बहुत देर हो चुकी रहेगी
समय है आज।
कोरोना वायरस के फैलने के बाद इंसान की जिन्दगी इस कदर बेबस और लाचार हो चुकी है कि आने वाले कल के बारे में कोई भी कुछ भी दावा करने की स्थिति में नहीं है। पूरी जिन्दगी आज पर टिक गयी है। जैसे आज ही निर्णायक साबित होने वाला है। लाखों लोग हजारों किलोमीटर दूर से ट्रक, टेम्पो, बाइक, साइकिल यहां तक कि पैदल ही गांव की ओर बदहवास होकर भागे चले आ रहे हैं। भले ही गांव आकर अपनों के बीच बेमानी जिन्दगी जीने को विवश होना पड़े। हर अप्रवासी गांव आ रहा है। इस आस में कि गांव में कम से कम दो जून की रोटी और सुकून की जिन्दगी तो बसर होगी। …और आजकल इधर गांव, जैसे छोटी-छोटी बातों को लेकर झगड़ा-झंझट, मारपीट, वैमनस्य के केन्द्र बन रहे हैं। हालात देखकर लगता नहीं कि गांव में लोगों के पास इस बुरे वक्त में कुछ और करने को बचा है। खेती किसानी का काम अभी पूरी तरह निपटा नहीं है। मौसम के बदले मिजाज का खामियाजा किसान अभी भुगत ही रहा है कि इसी बीच ग्राम प्रधानी के चुनाव की आहट ने अचानक हर गांव में राजनीतिक गतिविधियां तेज कर दी है। हर पारिवारिक और पुश्तैनी विवाद के केन्द्र में कहीं न कहीं यह चुनाव आ जा रहा है। सालों साल से चले आ रहे विवाद अब हर गांव का स्थायी चरित्र हो गया है। गांव को मिलने वाले सरकारी धन की लूट में हर आम-ओ-खास घुसपैठ करने के लिए लालायित है। उसकी बेचैनी इस कदर बढ़ रही है कि वह गांव का ‘लम्बरदार’ बनने के लिए कुछ भी करने पर आमादा है। अगड़े, पिछड़े, दलित, सवर्ण सब इस लूट की गंगा में हाथ धो लेने को आतुर हैं। गांव का नवदौलतिया वर्ग अपने पैसे के बूते, तो गांव के तथाकथित बड़कवा अपने रोब,दाब, हांक और तीन तिकड़म के सहारे। कुछ अपवादों को छोड़कर इन भावी स्थानीय प्रतिनिधियों को दिख रहा है कि कोरोना जैसी महामारी के इस संकट कालीन दौर में सैनिटाइजर, मास्क वितरण, छिड़काव, बाहर से आए मजदूरों के खान-पान और रहने के इंतजाम के नाम पर गांव प्रधान से लेकर ग्राम सचिव तक जैसे फर्जी बिल पेश कर पास करवाने के जुगाड़ में मशगूल हैं। हमारे यहां अब पुरानी मान्यता बन चुकी है कि सरकारी अमला तो ऐसे बुरे वक्त का बेसब्री से इंतजार करता ही है। इसका बड़ा रोचक वर्णन सुपरिचित पत्रकार पी साईनाथ ने अपनी ‘तीसरी फसल’ में किया है।
अब ऐसा लगता है कि स्थानीय प्रतिनिधि अपने स्थानीय सरोकार भूल गए हैं। दो-तीन दशक पहले तक आपसी विवाद और पारिवारिक झगड़ों का निपटारा गांव के बड़े बुजुर्ग अथवा गांव की पंचायत करती थी। अब ऐसा नहीं हो रहा है। गांव के प्रधान अब मुंशी प्रेमचंद के जमाने के ‘पंचपरमेश्वर’ नहीं रहे। अब कोई मामला जब स्थानीय प्रशासन और गांव के त​थाकथित बड़कवा के पास पहुंचता है तो न्याय का पलड़ा आमतौर पर पैसे और पहुंच वालों की तरफ ही झुकता नजर आता है। हाल में बलिया जिले के रामपुर कोड़हरा और मुरलीछपरा गांव में ऐसे ही मामले सामने आए। रामपुर कोड़हरा के ग्राम प्रधान और उनके सगे पट्टीदार के बच्चों के बीच क्रिकेट खेलने को लेकर झगड़ा हुआ। दोनो पक्षों के बीच जमकर मारपीट हुई। कई लोगों के सिर फूटे। हाथ पैर टूटे। दोकटी गांव के पासवान बस्ती में भी दो सगे परिवारों में जमीन विवाद को लेकर जमकर मारपीट हुई। दोनों मामलों में कुछ पा लेने की लालच में स्थानीय दलाल भी सक्रिय हो गए। मामला अपने चहेतों के पक्ष में रफादफा हो, इसकी जुगत भिड़ाई जाने लगी। किसी को भी इस बात का कोई ख्याल नहीं कि ऐसे बुरे वक्त के लिए भारतीय शास्त्रों में कुछ आपदधर्म नियम तय किए गए हैं।
कल तक जो जिला ग्रीन जोन मतलब कोरोना महामारी से मुक्त् था। अब ऐसा नहीं है। गांवों तक कोरोना के मरीज मिलने लगे हैं। ऐसे में भी सब लोग बेखौफ होकर घूम-टहल रहे हैं। सरकारी गाइडलाइन, परहेज और सतर्कता को ताक पर रख दिया गया है। लोग स्थानीय मामलों में अपने स्वार्थ के मुताबिक दखलंदाजी कर रहे हैं। अमेरिका, चीन और यूरोप के कई देश इस नाजुक दौर के गुजर जाने का इंतजार कर हरे हैं। पर यहां तो इन सूचनाओं के जानकार भी कूढ़मगज जैसा व्यवहार कर रहे हैं। जैसे सब कुछ सामान्य हो गया है। इन लोगों को लग ही नहीं रहा है कि थोड़ी सी लापरवाही, आने वाले कल को कितनी विकट हालात में पहुंचा देगी। अमिताभ घोष जैसे बड़े लेखक कोरोना महामारी के इस बुरे दौर में आदमी को अपनी गति कम करने की सलाह दे रहे हैं। यह भी बता रहे हैं कि जिन्दगी में अब तक मची आपाधापी के बीच कोरोना के दौर में ठहराव पर भी विचार करने का वक्त आ गया है। अब इस बात के सभी कयास लगाए जा रहे हैं कि कोरोना महामारी के दौर गुजर जाने के बाद लोगों की जिन्दगी अब वैसी नहीं रहेगी जो कल तक थी। खान-पान, आपसी सरोकार सामाजिक और आर्थिक संबंध या तो नये सिरे से तय होंगे अथवा पूरी तरह से बदल जाएंगे। गांव में ऐसे बदलाव थोड़ी देर से होंगे। खासकर ऐसे गांव, जो इस माहामारी की चपेट में नहीं आए हैं अथवा इसका दंश को नहीं झेल रहे हैं। पर इतना तो दिख रहा है कि अमरीका जैसे शक्तिशाली देश और एशियाई महाशक्ति बनने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए बेचैन चीन का आने वाला कल अब वैसा नहीं रहने वाला। जैसा हाल तक दावा किया जा रहा था। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में पेंचिदगियां और बढ़ेंगी। ‘ग्लोबल विलेज’ पर जैसे कोरोना महामारी का असर दिख रहा है, वैसा ही असर आगे भी दिखायी देगा। भले ही कुछ देर से।

( मोहन सिंह, लेखक गाँधी विचार अध्येता है)

टीम डिजिटल

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