असमानता देखकर उसका विरोध करना उचित : उप राष्ट्रपति


रामदास आठवले पर पुस्तक का हुआ विमोचन

नई दिल्ली। उप राष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने दलित नेता और केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास आठवले पर एक पुस्तक का विमोचन किया और उन्हें दलित समाज का‘मुखर नेता’बताया। नायडू ने‘भारत के राजनेता- रामदास आठवले’पुस्तक का यहां लोर्कापण करने के बाद कहा कि आठवले आधुनिक दलित समाज के मुखर नेता है और दबे कुचले लोगों के हकों के लिए जोरदार ढंग से आवाज उठाते रहे हैं। यह पुस्तक आठवले के शांतिपूर्ण प्रतिरोध को दर्शाती है जिससे लोकतंत्र को मजबूती मिलती है। उन्होंने कहा कि समाज में असमानता को पहचानना और इसे भरने के लिए उचित कदम उठाना बेहद जरुरी है। पुस्तक में असमान अवसर, संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व और आदिवासी समाज के संरक्षण पर विचार संकलित किये गये हैं।
पुस्तक विमोचन के बाद अपने संबोधन में उप राष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि भारतीय राजनेताओं के जीवन और उनके योगदान का उत्तम परिचय देने वाली पुस्तकशृंखला के वर्तमान अंक के प्रकाशन के लिए मैं संपादक श्री राजीव सुमन और “दी मर्जीनियलाइज्ड पब्लिकशन” को बधाई देना चाहता हूँ।
इस पुस्तक का अपने आप में ही एक विशेष महत्व है। वर्तमान समय में किसी आदर्श लोकतन्त्र में यह आवश्यक भी है कि ऐसी पुस्तकों का प्रकाशन हो जो राजनेताओं के चरित और उनकी विचारधारा को समाज के सामने लेकर आएँ।
प्रस्तुत पुस्तक महाराष्ट्र के सक्रिय राजनेता और समाज सेवक श्री रामसाद आठवले जी को उद्देश्य करके लिखी गई है। आठवले जी, पैंथर और नामांतर जैसे आंदोलनों के सक्रिय प्रतिभागी रहें हैं। मुझे खुशी है कि यह अंक उनके लिए समर्पित किया गया है। मुझे यह देखकर अच्छा लगा कि राजीव जी ने पुस्तक के आरंभ में अपनी भूमिका में लोकतंत्र के महत्व को उजागर किया है।
आठवले जी आधुनिक समाज में दलितों के उद्धार के लिए अग्रणी एवं मुखर नेता बनकर उभरें हैं। उनका सामाजिक समानता का विचार प्रशंसनीय है। उनका लक्ष्य है कि संपूर्ण मानवता का विकास हो न कि किसी विशेष जाति का, क्योंकि लोकतन्त्र किसी भेदभाव को स्वीकार नहीं करता है। समाज में किसी प्रकार की असमानता देखकर उसका विरोध करना उचित है। पुस्तक में आठवले जी के साक्षात्कार में बताये गये बहुत महत्वपूर्ण विषय हैं। विशेषत: उनकी शांतिपूर्वक विरोध और आंदोलन की नीति लोकतन्त्र को सुदृढ बनाती है।
प्रस्तुत पुस्तक 80 और 90 के दशक की राजनीतिक गहमा-गहमी को जीवंत सा कर देती है। आठवले जी का यह विचार भी मन को भा जाता है कि किसी भी पार्टी की नीति और वैचारिक नीति अलग हो सकती है परंतु सरकार में आने के बाद उसकी नीति सरकार की नीति होनी चाहिए, संविधान की नीति होनी चाहिए। मुझे खुशी है कि आठवले जी देश के समग्र विकास की वर्तमान नीति का पुरज़ोर समर्थन करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि महिलाओं के अधिकारों के संबंध में आपके विचार बहुत उदार हैं। आपके अनुसार समय की मांग के अनुसार संसद का विस्तार होना चाहिए और कैसे भी हो, वहाँ देश की महिलाओं का उचित प्रतिनिधित्व अवश्य होना चाहिए,आशा करता हूँ कि आपकी यह सकारात्मक सोच भविष्य में यथार्थ होगी।

सुभाष चन्द्र

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