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कांग्रेस की नई समिति के क्या हैं निहितार्थ ?

सुभाष चन्द्र

आखिरकार उन लोगों को कांग्रेस की विशेष समिति से हटा दिया गया, जिन्होंने बीते दिनों कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक में बगावती सुर अलापा था। सुर का तान इतना तीखा था कि उस समय भी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी तिलमिला उठे थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री व वरिष्ठ कांग्रेसी नेता गुलाम नबी आजाद को लेकर तीखी टिप्पणी भी की थी। अब कांग्रेस ने एक विशेष समिति बनाई है, जिसमें गुलाम नबी आजाद सहित उन वरिष्ठ लोगों को किनारे कर दिया है, जिन्होंने गांधी परिवार से हटकर कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की बात प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से की थी। इसका मतलब यही है कि कांग्रेस अभी भी गांधी-नेहरू परिवार के देहडी पर ही रहेगी। यदि आम कांग्रेसी कार्यकर्ता यह चाहे कि वे अपने बूते, अपने जनाधार के बल पर राजनीति कर लेगा, तो संभव नहीं। हां, यदि वह 10, जनपथ यानी सोनिया गांधी के कृपा पर निर्भर रहेगा, तभी उसका कल्याण होगा।

असल में,कांग्रेस ने पार्टी संगठन में बड़ा फेरबदल करने के साथ ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की मदद के लिए छह सदस्यीय विशेष समिति का गठन किया है। यह समिति कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव होने तक श्रीमती गांधी की मदद करती रहेगी। इस समिति में ए के एंटनी, अहमद पटेल , अंबिका सोनी, केसी वेणुगोपाल , मुकुल वासनिक और रणदीप सिंह सुरजेवाला को शामिल किया गया है।

कांग्रेस ने नई नियुक्ति करते हुए असंतुष्टों में से एक पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद को महासचिव पद से हटा दिया है। एक अन्य असंतुष्ट नेता जितिन प्रसाद को हालांकि पश्चिम बंगाल और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह का प्रभारी बनाकर बड़ी जिम्मेदारी भी सौंपी गई है। यह बड़ा हैरान करने वाला फैसला है। यह दोनों नेता सोनिया गांधी को संगठनात्मक बदलाव के लिए पत्र लिखने वाले 23 नेताओं में शामिल थे। इस बीच, कांग्रेस ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की जिम्मेदारी सौंपने के साथ नौ महासचिव भी नियुक्त किए। प्रियंका गांधी वाड्रा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के लिए मुकुल वासनिक, कर्नाटक के लिए रणदीप सिंह सुरजेवाला, राजस्थान के लिए अजय माकन, आंध्र प्रदेश के लिए ओमन चांडी और पंजाब के लिए हरीश रावत को जिम्मेदारी सौंपी गई है। जबकि महासचिवों में तारिक अनवर केरल और लक्षद्वीप की जिम्मेदारी निर्वहन करेंगे। वहीं जितेंद्र सिंह असम की जिम्मेदारी संभालेंगे। इसके साथ ही के. सी. वेणुगोपाल संगठन के प्रभारी होंगे।
सोनिया गांधी ने पवन कुमार बंसल सहित 17 प्रभारियों को नियुक्त किया है। पूर्व केंद्रीय मंत्री पवन कुमार बंसल को पार्टी प्रशासन की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं छत्तीसगढ़ के लिए पी. एल. पुनिया, झारखंड के लिए आर. पी, एन. सिंह और दिल्ली व बिहार के शक्ति सिंह गोहिल प्रभारी होंगे। वहीं कई प्रदेशों के प्रभार में भी फेरबदल भी किए हैं। रजनी पाटिल को जम्मू-कश्मीर, राजीव शुक्ला को हिमाचल प्रदेश, दिनेश गुंडूराव को तमिलनाडु, पुडुचेरी और गोवा के प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है। राजीव सातव दमन और दीव व अन्य छोटे केंद्र शासित प्रदेशों के अलावा गुजरात की भी जिम्मेदारी संभालेंगे, जबकि एच. के. पाटिल महाराष्ट्र के प्रभारी होंगे।
यूपी की सियासत में ब्राह्मणों के नाम पर हो रही राजनीति के बीच कांग्रेस ने यूपी के ब्राह्मण चेहरों का कद बढ़ा दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर संगठन में हुए बदलाव में लम्बे समय बाद प्रदेश के सात नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर शामिल किया है और इनमें चार ब्राह्मण नेता शामिल हैं। वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी, राजीव शुक्ला, जितिन प्रसाद, राजेश मिश्र के अलावा पीएल पुनिया, आरपीएन सिंह और विवेक बंसल को जगह दी गई है।
संगठन की फेरबदल में महासचिव प्रियंका गांधी को यूपी का प्रभार फिर से दिया गया है। राजेश मिश्र को केन्द्रीय चुनाव समिति में जगह दी गई है। इससे पहले 2012 में राम नरेश यादव इसके सदस्य थे। लंबे समय बाद यूपी के किसी नेता को इस समिति में जगह मिली है। वहीं पूर्व मंत्री जितिन प्रसाद को पश्चिमी बंगाल और अंडमान निकोबार का प्रभारी बना कर उनका कद बढ़ाया गया है। पश्चिमी बंगाल में अगले वर्ष विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। पिछले वर्ष से ब्राह्मणों को कांग्रेस के पाले में करने के लिए जितिन प्रसाद ने ब्राह्मण चेतना यात्रा की शुरुआत की थी। इसके बाद से वह चर्चा में बने रहे। अब कांग्रेस ने उन्हें प्रभारी बना कर उनके कद को बढ़ा दिया है।
कांग्रेस पार्टी ने अधीर रंजन चौधरी को पश्चिम बंगाल का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है। अगले साल अप्रैल-मई में चुनाव होने वाले हैं और प्रदेश अध्यक्ष के नाते अब उनका ज्यादा समय वहां लगना है। तभी दिल्ली में इस बात को लेकर चर्चा शुरू हो गई है कि लोकसभा में अधीर रंजन चौधरी की जगह पार्टी किसको नेता बनाएगी। पिछली लोकसभा में कांग्रेस के उप नेता कैप्टेन अमरिंदर सिंह थे, जिनको पंजाब चुनाव से पहले पंजाब का अध्यक्ष बना दिया गया था, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। बाद में वे पंजाब के मुख्यमंत्री हो गए। पश्चिम बंगाल में ऐसी कोई स्थिति नहीं। अधीर रंजन चौधरी को सिर्फ चुनाव लड़वाना है। सबको पता है कि वहां कांग्रेस का मुख्यमंत्री नहीं बनना है। फिर भी अभी वे अध्यक्ष बने हैं तो माना जा रहा है कि अब अगले लोकसभा चुनाव तक वे बने रहेंगे। इसलिए यह लगभग तय माना जा रहा है कि लोकसभा में कांग्रेस का नेता बदलेगा। कुछ दिन पहले ही कांग्रेस ने लोकसभा में असम के सांसद गौरव गोगोई को उप नेता बनाया है। ध्यान रहे अगले साल असम में चुनाव होने वाले हैं और राज्य की राजनीति में कांग्रेस की एकमात्र उम्मीद गोगोई परिवार ही है।

अगले साल केरल में भी विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। तभी तिरूवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर को लोकसभा में कांग्रेस के नेता बनाए जाने की सबसे ज्यादा संभावना है। वे तीन बार के सांसद हैं और मनमोहन सिंह की सरकार में कई अहम विभागों के मंत्री रहे। संयुक्त राष्ट्र संघ में काम करने का उनका अनुभव है और लगातार तीन बार से एक ही सीट से चुनाव जीत रहे हैं। हालांकि कांग्रेस नेतृत्व को लेकर चिट्ठी लिखने वाले 23 नेताओं में शशि थरूर भी हैं। इसके बावजूद कांग्रेस नेतृत्व का उनको लेकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में बहुत नाराजगी नहीं है। उनका अलावा दूसरा नाम मनीष तिवारी का है। वे दो बार के सांसद हैं और मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री भी रहे हैं। शशि थरूर की तरह वे भी कांग्रेस नेतृत्व को चिट्ठी लिखने वालों में शामिल हैं। पर उनका मामला थरूर से अलग इसलिए है क्योंकि पार्टी के बाकी नेताओं में थरूर को लेकर दिक्कत नहीं लेकिन मनीष तिवारी को लेकर राहुल के करीबी नेताओं में बहुत नाराजगी है। दूसरे पंजाब में भी उनके नाम से कांग्रेस को वोट का फायदा नहीं होना है। इसलिए उनकी संभावना अपेक्षाकृत कम है। केरल के ही नेता के सुरेश का भी नाम है। वे दलित नेता हैं और कांग्रेस में यह सोच थी कि उनको लोकसभा में उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ाया जाए।

सुभाष चन्द्र

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