प्रकृति के सन्देश को अनदेखा करता इंसान

अरविंद कुमार

परिवर्तन प्रकृति का नियम है| आज के समय में बदलते मौसम और बढ़ती हुई गर्मी से एक बात का अंदाज़ा तो लगाया जा सकता है की इंसान ने प्रकुति को जो नुकसान पहुंचाया है इतने सालों के दोहन से, प्रकृति अब उसे वापस लेने की कोशिश कर रही है| मानवता का अंत भले की किसी युद्ध से हो या ना हो लेकिन प्रकृति के कहर से उसका बच पाना मुश्किल है| बढ़ता शहरीकरण, घटते पेड़, बढ़ती हुई गाड़ियों, बढ़ते प्रदुषण ने ना सिर्फ मौसम को बदला बल्कि उसको इतना अस्वाभाविक कर दिया है की अब जहाँ कही ठण्ड होती थी वहां गर्मी होती है और गरम शहरों में बर्फ़बारी हो जाती है| प्रकृति में बदलाव से ना सिर्फ प्रदुषण बढ़ा बल्कि प्रकृति की वो क्षमता जिससे वो वातावरण के संतुलन को बनाये रखती थी वह भी असंतुलित हो गयी है|

वायु प्रदुषण

अगर बात वायु प्रदुषण की करें तो, दिल्ली का नाम एकदम से ही ध्यान में आता है की कैसे सिर्फ वायु प्रदूषण की वजह से गाड़ियों के ओड ईवन नियम तक को लागु करना पड़ गया था। हाल ही में जारी शोध-रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर-2019’ के अनुसार, भारत में वायु प्रदूषण के कारण 2017 में 12 लाख लोगों की मौत हुई। रिपोर्ट में कहा गया है कि पूरी दुनिया में वायु प्रदूषण से जितने लोगों की मौत होती है, उसकी आधी संख्या भारत और चीन में है। भारत में वायु प्रदूषण स्वास्थ्य संबंधी सभी खतरों से होने वाली मौतों में तीसरा सबसे बड़ा कारण है। अगर वायु प्रदुषण के वजह से होनी वाली मौतों को देखा जाये तो यह आंकड़ा हिरोशिमा और नागाशाकी में हुई मौतों से भी कई गुना ज्यादा है| वायु प्रदुषण की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है की संयुक्‍त राष्‍ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की इस साल की थीम ही वायु प्रदुषण है.

बढ़ता तापमान

आज के समय में बदलती हुई प्रकृति और बढ़ता हुआ प्रदुषण, किसी एक देश की नहीं बल्कि विश्व की सबसे बड़ी समस्या है| प्रदुषण को मुख्यत हवा, पानी और प्लास्टिक के बढ़ते हुए उपयोग से जिससे की कचरा इक्कठा हो रहा है से जोड़ कर देखा जाता है| लेकिन आम मानस को ये समझना होगा की इसका एक बहुत व्यापक असर है जो खाद्य उपलब्धतता से लेकर पृथ्वी के बढ़ते हुए तापमान तक है|

बढ़ते हुए तापमान जिसको सामान्य भाषा में ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं| इसने ना सिर्फ ग्लेशियर की बर्फ को पिघला कर समुद्र का स्तर बढ़ा दिया है बल्कि उसके और भी अनुकूल प्रभाव सामने आ रहें है|

2013 में विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में गेहूं और चावल की खेती पर जलवायु परिवर्तन के असर के बारे में बात की गयी| इस रिपोर्ट के अनुसार 1980 के दशक से एशिया में चावल और गेहूं की पैदावार में हर 1 ° C तापमान बढ़ने से लगभग 8% की कमी आई|

आज समय है हमें इन समस्याओं को समझने का जागरूक होने का और अपना योगदान देने का| सरकारें क्रायक्रम करती हैं, नियम बनाती है लेकिन जिम्मेदारी हम सब की ही होती है उनको सफल बनाने की| आज समय ना सिर्फ हमको एक मौका दे रहा है, अब तक की हुई गलतियों को सुधारने का बल्कि यह एक आखिर संदेश भी है प्रकृति का| अगर हम अब भी ना चेते तो प्रकृति अपने नियम का पालन करके अपने संरचना को वापस पाने की कोशिश करेगी

(यह लेखक के अपने विचार हैं. लेखक एक स्वतत्र टिप्पणीकार है)

 

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