लैंडस्‍लाइड अर्ली वॉर्निंग मॉडलों के परीक्षण का जिम्मा के पास जीएसआई

 

 मुंबई । जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) वर्तमान में दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के नीलगिरि जिले में लैंडस्‍लाइड अर्ली वॉर्निंग सिस्‍टम (एलईडब्ल्यूएस) का परीक्षण कर रहा है। इस प्रणाली का संचालन करने से पहले इन दोनों स्थानों पर सत्यापन के लिए कुछ मानसून वर्षों तक इसका परीक्षण किया जाएगा। यह जानकारी हाल ही में केंद्रीय कोयला और खदान के प्रभारी मंत्री प्रहलाद जोशी ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर पोस्ट की है।

जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के जीएचआरएम डिवीजन के निदेशक डॉ. साईबाल घोष ने कहा कि, “कुछ अन्य विकसित देशों की तरह, जहां इस तरह के क्षेत्रीय लैंडस्‍लाइड अर्ली वॉर्निंग मॉडल संचालन में हैं, भारत भी कुछ दिनों के लिए एलईडब्ल्यूएस मॉडल को लागू करने से पहले इसका मानसून के कुछ वर्षों और कुछ अन्य भूस्खलन संभावित राज्यों में व्यापक जमीनी सत्यापन और परीक्षण भी करेगा।  जीएसआई ने इस तकनीक को भूस्खलन, जलवायु और सोशल डायनामिक्स क्षेत्रों के भारतीय और यूरोपीय शोधकर्ताओं के एक बड़े समूह के साथ काम करते हुए  एक पहले से  चल रहे सहयोगी अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान कार्यक्रम- लैंडस्लिप के बाद विकसित किया है।”

भारत में, पहाड़ और पहाड़ी क्षेत्र पूर्वोत्तर भारत के उप-हिमालयी भागों और  भूस्खलन को लेकर संवेदनशील  पश्चिमी घाटों में 16 राज्यों में और 2 केंद्र शासित प्रदेशों में फैले हुए हैं, हैं। भूस्खलन को लेकर इन संवेदनशील  क्षेत्र में 170 से अधिक जिलों में लगभग 12.6 फीसदी भारतीय भू-भाग (4.2 लाख वर्ग किमी) आता  है।

 

 

हाल के समय में, गैर-संरचनात्मक उपायों की आवश्यकता बढ़ी है क्योंकि इस तरह के उपायों के  सफल विकास और उपयोग किए जाने पर हम अपेक्षाकृत कम लागत पर  आपदा को रोक सकते हैं। भूस्खलन के लिए संरचनात्मक शमन उपायों का कार्यान्वयन महंगा पड़ता है क्योंकि इसे  भूस्खलन के एक छोटे क्षेत्र पर लागू किया जा सकता है। इसलिए, उनके कार्यान्वयन को अक्सर जोखिम वाले कारकों और खतरे के प्रति उनके खुलेपन के स्तर द्वारा निर्धारित किया जाता है।

 

जीएसआई पहले से ही एक राष्ट्रीय परियोजना को पूरा करने के नजदीक है। यह परियोजना है  नेशनल लैंडस्‍लाइड ससेप्टिबिलिटी मैपिंग (एनएलएसएम) जिसमें, रिमोट सेंसिंग और फील्ड-आधारित इनपुट डेटा दोनों का उपयोग करते हुए नेशनल लैंडस्‍लाइड (राष्ट्रीय भूस्खलन ) सूची का निर्माण समेत भारत में समग्र भूस्खलन प्रवण क्षेत्रों के लिए 1: 50,000 पैमाने पर भूस्खलन की संभावना (4.2 लाख किमी 2) वाले क्षेत्र का मानचित्र तैयार किया जा रहा है । 2019-20 तक, जीएसआई ने एनएलएसएम परियोजना के तहत कुल लक्ष्य (3.57 लाख वर्ग किमी) का 85% पूरा कर लिया है। देश के आपदा प्रबंधन योजना में उपयोग के लिए ये विशाल भू-डेटाबेस सार्वजनिक क्षेत्र में चरणों में उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

इस जीआईएस-सक्षम मानचित्र डेटा (2.55 लाख किमी 2) का 61% पहले से ही किसी भी हितधारक के लिए मुफ्त डाउनलोडिंग और उपयोग के लिए जीएसआई के भूकोश मैप पोर्टल (http://bhukosh.gsi.gov.in/Bhukosh/Public) पर अपलोड किया गया है। उपरोक्त पहले से अपलोड किए गए एनएलएसएम डेटाबेस में 52 भूस्खलन पॉलीगॉन डेटा और 25,184 भूस्खलन बिंदु डेटा है, जो 18 भूस्खलन संवेदी राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों में किसी भी हितधारकों द्वारा उपयोग के लिए क्षेत्र-मान्य भू-पैरामीट्रिक विशेषताओं के साथ है। इस प्रयास में, जीएसआई का एनएलएसएम डेटाबेस  मध्यम पैमाने पर एक सबसे प्रभावी बुनियादी भू-विरूपण उपकरण है, जिसका उपयोग और भारत के पहाड़ / पहाड़ी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास और योजना के साथ किया जाना चाहिए। अगर इसे ठीक से लागू किया जाए, तो यह कई नए भूस्खलन से बचा सकता है जो अमूमन मानव निर्मित क्रियाओं के कारण  होते हैं।

जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के जीएचआरएम डिवीजन के निदेशक डॉ. साईबाल घोष ने कहा कि,  ”भूस्खलन की संभावना का मानचित्र एक उत्कृष्ट स्थानिक पूर्वानुमान उपकरण है, जिसका उपयोग भूमि उपयोग ज़ोनिंग नियमों को लागू करने के लिए किया जा सकता है। भारत में, नीलगिरि जिला और नैनीताल इसका उपयोग कर रहे हैं, लेकिन भूस्खलन को लेकर अन्‍य संवेदनशील राज्यों को भी पहाड़ी क्षेत्र के विकास और प्रबंधन के लिए इस महत्वपूर्ण भू-सूचना उपकरण का उपयोग शुरू करना चाहिए।

भूस्खलन को क्षेत्र विशेष के रूप में जाना जाता है और इसीलिए उनके उपचार के तरीके भी अलग-अलग होते हैं। हालांकि, सभी संरचनात्मक शमन उपायों की एक सामान्य श्रेणी में भूतल संरक्षण और कटाव नियंत्रण के उपाय, ज्यामिति संशोधन और बड़े पैमाने पर वितरण के उपाय, जल विज्ञान (सतह जल निकासी) और जल-भूवैज्ञानिक (उप-सतही जल निकासी) संशोधन उपाय, ढाल सुधार उपायों (भूमि विशेषताओं का संशोधन/परिवर्तन, सक्षम जमीन पर भार स्थानांतरित करना) और अवधारण संरचनाएं आदि शामिल हैं।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.