प्रदूषण मुक्त दिल्ली के लिए सीएम केजरीवाल की नई पहल

 

नई दिल्ली। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में बढ़ रहे प्रदूषण को लेकर एहतियाती तौर पर कई कदम उठा रहे है। बीते दिनों कनाॅट प्लेस में स्माॅग टावर लगाने की बात हुई थी। आज बुराड़ी विधानसभा के हिरणकी गांव में आएं। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वहां पराली के धुएं से समाधान के लिए नई शुरुआत की और इसे युद्ध प्रदूषण के विरूद्ध अभियान में बेहद अहम दिन बताया। उन्होंने पराली के धूएं के समाधान के लिए डी कंपोजर घोल का प्रयोग होने की शुरुआत की।
बुराड़ी के विधायक संजीव झा का कहना है कि आज हिरणकी गांव में जो मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने नई पहल की शुरुआत की है, वह पूरे उत्तर भारत के लिए अनुकरणीय है। यह शुरुआत पूरे उत्तर भारत को पराली के धूएं से निजात दिला सकती है। हम अपने पड़ोसी राज्यों से आग्रह करते है कि वे भी अपने यहां के किसानों के साथ मिलकर ये पहल करें। इससे पराली के प्रदूषण से काफी हद तक छुटकारा मिल सकता है।

बता दें कि दिल्ली स्थिति भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा ने पराली से खाद बनाने वाली एक नई तकनीक विकसित की है, जिससे इसकी वजह से होने वाले प्रदूषण से छुटकारा मिल सकता है। दिल्ली सरकार ने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की नई तकनीक का उपयोग करने का ऐलान भी कर दिया है। इसके साथ ही दिल्ली सरकार इस बारे में दूसरी राज्य सरकारों से भी बात करेगी, जो हर साल पराली जलाने की घटनाओं के चलते प्रदूषण की समस्या को झेलने को मजबूर होते हैं। ठंड के दिनों में पराली के चलते प्रदूषण की समस्या से दिल्ली-एनसीआर समेत पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य बहुत ज्यादा प्रभावित होते हैं और पिछले साल तो हालत बहुत ही खराब हो गई थी।
पराली को खाद में बदलने वाली इस तकनीक का जायजा लेने दिल्ली सरकार के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट पहुंचे थे और उनके सामने वैज्ञानिकों ने इसका प्रदर्शन करके भी दिखाया। इस दौरान बायो-डिकम्पोजर से तैयार घोल को मशीनों के जरिए पराली पर छिड़क कर दिखाया गया। इस प्रक्रिया में छिड़काव के अलावा एक मशीन का और इस्तेमाल किया जाता है, जो उसमें मौजूद मिट्टी और कंकड़ों को अलग कर देती है। गोपाल राय ने कहा है कि इस तकनीक से पराली जलाने की समस्या का समाधान निकल सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली सरकार किसानों को यह सुविधा मुफ्त में देगी, ताकि किसान खेत में ही पराली को खाद बना सकें।

 

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