सुभाष चन्द्र
एक महीना तक काशी ने अतुलनीय मेजबानी की। काशी-तमिल संगमम का उद्घाटन 17 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया, तो समापन 16 दिसंबर, 2022 को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने ओजपूर्ण संबोधनों से हुआ। दोनों ही खास अवसर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति रही। कई अन्य भारत सरकार के मंत्री और उत्तर प्रदेश के मंत्री रहे। समापन के अवसर पर तमिलनाडु के राज्यपाल आर एन रवि की गरिमामय उपस्थिति भी कई संदेश देने के लिए काफी रही। आदिदेव महादेव के जयघोष के साथ भारत को सर्वश्रेष्ठ बनाने का संकल्प लिए जनसमूह पूरे देश में काशी-तमिल संगमम के संदेश का प्रसार करेगा।
यूं तो इसका आयोजन केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और संस्कृति मंत्रालय ने किया। इसमें सहयोग उत्तर प्रदेश सरकार सहित कई दूसरी संस्थाओं का रहा। काशी हिंदू विश्वविद्यालय और आईआईटी मद्रास विशेष साझेदार रहा। उसके साथ ही रेल मंत्रालय और विशेषकर आईआरसीटीसी, केंद्रीय खेल मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय सहित केंद्र की कई विभागों का बेहतर समन्वय देखने को मिला। इसका उद्देश्य तमिलनाडु व काशी के बीच सदियों पुराने संबंधों को पुनर्जीवित करना रहा। तमिलनाडु के शास्त्रीय व लोक कलाकारों, साहित्यकारों, उद्यमियों, किसानों, धर्मगुरुओं, खिलाड़ियों आदि के छोटे जत्थों में ढाई हजार से अधिक प्रतिनिधियों ने उत्सव में भाग लिया।
நான் தமிழக அரசை மீண்டும் கேட்டுக்கொள்கிறேன், பொறியியல், மருத்துவம் மற்றும் சட்டக் கல்வி பாடத்திட்டத்தை தமிழ் மொழியில் உருவாக்குங்கள்.
தாய்மொழி தமிழிலேயே தமிழர்கள் கல்வி கற்கும் போது தான் ஒப்புயர்வற்ற அறிவு சார்ந்த தலைமுறையை நம்மால் உருவாக்க முடியும்! pic.twitter.com/pQvwfixx70
— Amit Shah (@AmitShah) December 16, 2022
महीने भर में दिल्ली, तमिलनाडु और देश के अन्य क्षेत्र से जितने भी मेहमान आए, सभी ने आदिदेव महादेव की इस नगरी के सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक सौहार्द्र को देखा और समझा। सभी ने तमिलनाडु की संस्कृति, समाज और शिव के प्रति अनुराग का गुणगान किया। तमिल समाज के अंदर भगवान शिव और काशी के प्रति जो आस्था है, वह अलौकिक है। काशी तो आध्यातिक नगरी है। विश्व की प्राचीनतम नगरी काशी में तमिलों के साथ हजारों वर्ष पुराने संबंध की विवेचना हुई। तमाम विद्वानों ने अपने वक्तव्य में देशभक्ति, सामाजिक चेतना, आध्यात्मिक संदेश दिया। सम्मेलन में उत्तर और दक्षिण के लोगों के बीच शिक्षा, कला और संस्कृति, साहित्य, खेल आदि के क्षेत्र में विभिन्न कार्यक्रमों के अलावा कला, फिल्म, हथकरघा और हस्तशिल्प आदि की प्रदर्शनियों का आयोजन किया गया। यह आयोजन एनईपी (राष्ट्रीय शिक्षा नीति) के तहत की गई एक पहल है।
तमिलनाडु के राज्यपाल आर एन रवि ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक माह के इस आयोजन में करीब 2500 तमिलनाडु के विशेष लोग काशी आए। यहां से अपने गृहप्रदेश पहुंचने पर उनके चेहरे पर सुकून है, प्रसन्नता है और वो लोग काशी की अद्भुत आतिथ्य का जयगान कर रहे हैं। यह इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में काशी में तमिल सहित दक्षिण राज्यों से सैकड़ों में नहीं, बल्कि हजारों की संख्या में लोग आएंगे। यह एक नए सामाजिक सौहार्द्र की शुरुआत है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके उद्घाटन के अवसर पर ही काशी-तमिल संगमम के पीछे एक भारत श्रेष्ठ भारत की बात कही। काशी हिंदू विश्वविद्यालय और वाराणसी सहित पूर्वांचल के कई जिलों के छात्रों ने भाषाई अंतर को पाटते हुए जिस प्रकार से तमिल गीतों-नाट्यों-वादों का प्रस्तुतिकरण किया, वह अपने आप में अनुपम रहा। प्रख्यात कवि सुब्रह्मण्यम भारती की जयंती के दिन भारतीय भाषा उत्सव के आयोजन में तमाम हिंदी भाषी छात्र-छात्राओं ने भारत दर्जन भर से अधिक भाषाओं में अपनी प्रस्तुति देकर इस बात को सत्यापित किया कि भाषा से अधिक भाव महत्वपूर्ण है। भावना प्रबल हो, तो भाषायी अंतर मायने नहीं रखती हैं। भौगोलिक रूप से भले ही देश में कई राज्य हैं, लेकिन अंतर्मन से सभी एक भारत, श्रेष्ठ भारत के लिए संकल्पित हैं।
दरअसल, काशी धर्म-अध्यात्म की नगरी होने के अलावा ये मोक्षदायिनी नगरी रही है। यहां आके पिंडदान करने के बाद, दक्षिण भारत से ही नहीं, पूरे भारतवर्ष से लोग आते हैं यहां। जैसे गया में जाते हैं पिंडदान करने के लिए, वैसे काशी में दक्षिण भारत से तमाम लोग यहां आते रहे हैं पिंडदान करने के लिए अपने पितरों का, पुरखों का। तो उस पिंडदान करने के क्रम में काशी अनादि काल से, आदि शंकराचार्य के जमाने से लोग आते रहे और उस जमाने से काशी दक्षिण भारतीयों का एक केंद्र रहा है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रांगण में आयोजिक एक माह के महोत्सव को लेकर लोगों के मन में कई प्रकार की जिज्ञासा भी है। मसलन, प्रधानमंत्री ने आयोजन के जरिए जो कहा है कि उत्तर और दक्षिण का जो मेल कराना है, उस पर उनका फोकस है, लेकिन इसके पीछे क्या कोई राजनीतिक मकसद भी हो सकता है? देखा जाए तो आने वाले तमिलनाडु का जो चुनाव है, कर्नाटक में होने वाले चुनाव हैं, वही एक तीर से कई लक्ष्य भेदने का इनका प्रयास है। सच ये है कि तमिलनाडु ही नहीं, अभी तो कर्नाटक में बैंगलोर-वेंगलोर वगैरह शहर में एक वक्त से तमिलियन हावी हैं।
बहरहाल, विभिन्न भाषाओं, सांस्कृतिक परंपराओं और भौगोलिक परिदृश्यों का घर भारत हमेशा सर्वोत्कृष्ट विभिन्न रूपकों के एकरूपता वाले समाज के रूप जाना जाता है। यह साझा विरासत के लिए जाना जाता है, और सतत भारतीय समाज की विशेषताओं को व्यापार, यात्रा और विज्ञान में विकास के माध्यम से सतत स्थापित करता रहा है। काशी में यह प्रक्रिया युगों से आगे बढ़ रही है। ऐसा ही पहलू यह भी है कि काशी और तमिलनाडु के बीच सदियों पुराना संबंध है, जिसे एक महीने तक काशी-तमिल संगमम में मनाया गया। इतना तो तय है कि इस संगमम से जो नई सामाजिक चेतना का स्वर उभरा है, उसका असर आने वाले दिनों में पूरे देश में दिखेगा।

