कृष्णमोहन झा
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने संसद के मानसून सत्र के पहले ही दिन अपने पद से इस्तीफा देने की अचानक जो घोषणा की उसने सबको आश्चर्यचकित कर दिया। उपराष्ट्रपति होने के नाते वे राज्य सभा के पदेन सभापति भी थे। संसद के मानसून सत्र के पहले दिन प्रातःकाल उन्होंने उच्च सदन में सभापति के आसन पर बैठकर सदन की कार्यवाही का संचालन भी किया था और शाम को अचानक उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया। जगदीप धनखड़ ने कहा है कि वे स्वास्थ्य संबंधी कारणों से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे रहे हैं। धनखड़ देश के ऐसे पहले उपराष्ट्रपति हैं जिन्होंने संसद सत्र के दौरान अपना पद छोड़ने का फैसला किया है। जगदीप धनखड़ सोमवार रात को अपने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के बाद मंगलवार को राज्यसभा की बैठक में नहीं आए। उनकी जगह सभापति की कुर्सी पर उपसभापति हरिवंश आसीन थे यद्यपि सदन में हंगामा शुरू होने के बाद उन्होंने दोपहर सदन की कार्यवाही 12 बजे तक के लिए स्थगित कर दी।
जगदीप धनखड़ ने भले ही यह कहा है कि वे स्वास्थ्य कारणों से उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे रहे हैं लेकिन अचानक इस्तीफा देने के उनके फैसले ने राजनीतिक क्षेत्रों में हलचल मचा दी है। कोई भी यह समझने में असमर्थ है कि अगर स्वास्थ्य कारणों ने ही उन्हें उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने के लिए विवश किया है तो उन्होंने संसद का मानसून सत्र प्रारंभ होने का इंतजार क्यों किया इसके साथ ही यह सवाल भी स्वाभाविक है कि अपने पद से इस्तीफा देने के लिए धनखड़ क्या सत्र समाप्त होने का इंतजार नहीं कर सकते थे। यहां यह ध्यान देने योग्य बात है कि मानसून सत्र के पहले दिन जब राज्य सभा की कार्रवाई शुरू हुई तब सभापति के आसन पर बैठे धनखड़ को देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि चंद घंटों के बाद ही वे स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा देने का मन बना चुके हैं। इसलिए अब यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या मानसून के पहले दिन के शुरुआती चंद घंटों में ऐसा क्या हुआ कि धनखड़ ने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफे की घोषणा करके सबको अचरज में डाल दिया। उससे भी अधिक अचरज की बात यह है कि सत्ता पक्ष के द्वारा धनखड़ से एक बार भी यह अनुरोध नहीं किया गया कि वे उपराष्ट्रपति पद छोड़ने के अपने फैसले पर पर पुनर्विचार करे ।आनन फानन में उनका इस्तीफा भी राष्ट्रपति ने स्वीकार कर लिया। इस्तीफा स्वीकार होने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने X पर अपने संदेश में लिखा कि श्री जगदीप धनखड़ जी को भारत के उपराष्ट्रपति सहित कई भूमिकाओं में देश की सेवा करने का मौका मिला है। मैं उनके उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूं। प्रधानमंत्री के इस संदेश में श्री धनखड़ की कार्यकुशलता को लेकर किसी भी तरह के प्रशंसात्मक शब्दों की कमी के अलग-अलग अर्थ निकाले जा रहे हैं। इस पूरे मामले में भाजपा और केंद्र सरकार के मंत्रियों की चुप्पी भी रहस्यमय प्रतीत होती है। इस पूरे मामले में सबसे मजेदार बात यह रही कि जिस कांग्रेस पार्टी ने अतीत में राज्यसभा के सभापति के रूप में जगदीप धनखड़ के फैसलों से नाराज़ होकर उनके विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव पेश किया था उसने सरकार से कहा कि वह धनखड़ को अपना इस्तीफा वापस लेने के लिए मनाए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश के अनुसार धनखड़ के इस्तीफे के पीछे स्वास्थ्य से भी बढ़कर कोई और वजह है । धनखड़ के विरुद्ध कांग्रेस पार्टी का यह महाभियोग प्रस्ताव तकनीकी कारणों से रद्द हो गया था लेकिन स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास में उपराष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की यह एकमात्र घटना थी। जगदीप धनखड़ के प्रति कांग्रेस के मन में अचानक उपजी सहानुभूति यह संकेत दे रही है कि कांग्रेस से उनकी कम होती दूरियां उनके इस्तीफे का कारण बन गईं ।
उल्लेखनीय है कि जगदीप धनखड़ ने अभी कुछ दिन पूर्व ही एक कार्यक्रम में कहा था कि ईश्वर की कृपा से मैं दो साल बाद रिटायर हो जाऊंगा परंतु उनके ‘ स्वास्थ्य ‘ ने तीन साल में ही उपराष्ट्रपति की कुर्सी छोड़ने के लिए विवश कर दिया। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि स्वास्थ्य संबंधी कारणों से अलग हटकर सोचें तो विगत कुछ दिनों में कुछ तो ऐसा हुआ है जिसकी वजह से जगदीप धनखड़ पर सरकार का भरोसा कम होता जा रहा था। तात्कालिक कारणों में यह माना जा रहा है कि संसद के मानसून सत्र के पहले दिन राज्यसभा में विपक्ष के 63 सांसदों के द्वारा जस्टिस यशवंत वर्मा के विरुद्ध पेश महाभियोग प्रस्ताव को सभापति जगदीप धनखड़ द्वारा स्वीकार किया जाना सत्ता पक्ष को रास नहीं आया। गौरतलब है कि कुछ माह पूर्व जस्टिस वर्मा के घर से करोड़ों रुपए की नगदी बरामद हुई थी। इसी मामले में लोकसभा में भी सत्तारूढ़ गठबंधन ने महाभियोग का नोटिस दिया था जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के 152 सांसदों के हस्ताक्षर थे। राज्य सभा में पहले ही दिन सत्ता पक्ष को संभवतः यह भी पसंद नहीं आया कि पहलगाम हमले और आपरेशन सिंदूर को लेकर विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को सदन में काफी देर तक सरकार को निशाना बनाने का मौका दिया गया। उस दौरान उन्हें टोंकते हुए केंद्रीय मंत्री जे पी नड्डा ने कहा कि सदन की कार्यवाही में कुछ भी रिकॉर्ड नहीं हो रहा है । जेपी नड्डा ने यह भी कहा कि जो कुछ मैं बोल रहा हूं वही सदन की कार्यवाही में रिकार्ड हो रहा है। यह सवाल भी उठाया जा सकता है कि सदन की कार्यवाही में किसी सदस्य की टिप्पणी को रिकॉर्ड न करने का आदेश तो केवल सभापति ही दे सकते हैं तो क्या नड्डा की बात से सभापति की कुर्सी पर बैठे जगदीप धनखड़ ने स्वयं को अपमानित महसूस किया। इसके बाद शाम को साढ़े चार बजे सभापति ने बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की जो बैठक बुलाई थी उसमें केंद्रीय मंत्री द्वय जेपी नड्डा और किरण रिरिजू का न पहुंचना शायद यह संकेत दे रहा था कि तब तक उपराष्ट्रपति पद से जगदीप धनखड़ के इस्तीफे की पटकथा लिखी जा चुकी थी। इसके कुछ ही घंटों बाद जगदीप धनखड़ के इस्तीफे की खबर ने सबको आश्चर्यचकित कर दिया परंतु शायद सत्तापक्ष को तो धनखड़ की ओर से इसी घोषणा के इंतजार में था इसीलिए उनकी मान-मनौव्वल के कोई प्रयास नहीं किए गए। उपराष्ट्रपति पद से जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के पीछे चाहे जो कारण रहे हों परन्तु इसमें दो राय नहीं हो सकती कि उन्होंने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और देश के उपराष्ट्रपति के रूप में अपने पदों की जिम्मेदारियों का निष्पक्ष होकर निर्वहन करके विवादों से परहेज़ करने में शायद कभी रुचि नहीं दिखाई।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक हैं)


