कृष्णमोहन झा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हिंदू धर्म को हमेशा मानव धर्म के रूप में परिभाषित किया है । जब वे अपने विद्वतापूर्ण व्याख्यानों में धर्म की सूक्ष्म विवेचना करते हैं तो उसमें कर्त्तव्य पालन का भाव प्रमुखता से उभर कर सामने आता है । संघ प्रमुख मोहन भागवत के अनुसार धर्म का अर्थ केवल ईश्वर की उपासना नहीं है बल्कि यह व्यक्ति के जीवन में अलग अलग रूपों में सामने आता है और उसके अनुरूप आचरण करने के लिए प्रेरित करता है। संघ प्रमुख ने नागपुर में धर्म जागरण न्यास के नवनिर्मित कार्यालय के उदघाटन समारोह में मुख्य अतिथि की आसंदी से दिए गए अपने सारगर्भित उद्बोधन में भी धर्म की अवधारणा को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि मातृत्व धर्म , पितृ धर्म , मित्र धर्म, पुत्र धर्म,राजधर्म , प्रजा धर्म, ये सभी धर्म हैं । जो इन्हें निष्ठा पूर्वक निभाता है वहीं सच्चा धार्मिक है। भागवत ने कहा कि धर्म का कार्य समाज के लिए होता है। धर्म ठीक रहने से शांति सद्भाव का वातावरण बना रहता है समाज में कलह और विषमता नहीं होती है ।
भागवत ने जोर देकर कहा कि धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति जीवन में सही मार्ग पर चलता है। धर्म के मार्ग पर चलने से व्यक्ति को संकट के समय साहस और रास्ता खोजने का संकल्प मिलता है। भागवत ने कहा कि यह सुनिश्चित करना समाज का दायित्व है कि लोग धर्म के मार्ग से न कभी विचलित न हों। भागवत ने अपनी इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया कि यदि आपका धर्म के प्रति समर्पण दृढ़ है,आपकी तो आप कभी साहस नहीं खोएंगे ।संघ प्रमुख ने कहा कि आज दुनिया को ऐसे धर्म की आवश्यकता है जो विविधताओं को अपनाने में समर्थ हो। उन्होंने इस संदर्भ में हिंदू धर्म का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंदू धर्म हमें अपनापन और विविधताओं को अपनाना सिखाता है। हिंदू धर्म को सच्चे अर्थों में मानव धर्म है जिसे सबसे पहले हिन्दुओं ने समझा और अपने आचरण में उतारा।
भागवत ने कहा कि धर्म का कार्य हमेशा पवित्र होता है। हम भारत के लोग जिसे धर्म कहते हैं वह सत्य है। आप उसको मानो या न मानो लेकिन उसका अस्तित्व है। इस संदर्भ में भागवत गुरुत्वाकर्षण का उदाहरण देते हुए कहा कि आप उसको मानो या न मानो वह काम करेगा।उसको मानकर आप चलेंगे तो आप अच्छी तरह चल सकेंगे लेकिन अगर आप यह तय कर लेंगे कि उसे नहीं मानना तो हो सकता है कि आपको ठोकर लग जाए।
मोहन भागवत ने कहा कि दुनिया के लोग कहते हैं कि हम अलग हैं ।हमें एक होने के लिए एक सा होना पड़ेगा। हम कहते हैं कि हम विविध हैं लेकिन एक दूसरे से अलग नहीं हैं । सत्य यही है कि हम अलग दिख सकते हैं परन्तु एक हैं। संघ प्रमुख ने इस बात को रेखांकित किया कि हमारा धर्म अपनापन सिखाता है और विविधताओं को अपने अंदर समाहित करने की अनुमति देता है। संघ प्रमुख ने कहा कि सबका मार्ग अलग-अलग हो सकता है लेकिन गंतव्य एक ही है इसलिए अपने रास्ते पर तो चलें परन्तु दूसरे के रास्ते को जबरदस्ती बदलने का प्रयास नहीं करना चाहिए। संघ प्रमुख ने इतिहास के पन्नों में दर्ज उन प्रेरक घटनाओं का उल्लेख भी किया जब लोगों ने धर्म रक्षा के लिए हंसते-हंसते बलिदान दे दिया लेकिन अपने धर्म के मार्ग पर अडिग रहे। इसी संदर्भ में भागवत ने छत्रपति संभाजी महाराज के जीवन पर आधारित फिल्म छांवा का विशेष रूप से उल्लेख किया।


