जब दुनिया महिला उद्यमिता दिवस मना रही है, तो चर्चाएँ अक्सर शहरी संस्थापकों, टेक इनोवेटर्स और कॉरपोरेट नेताओं पर केंद्रित होती हैं। लेकिन भारत के ग्रामीण इलाक़ों में ऐसी अनगिनत कहानियाँ लिखी जा रही हैं जहाँ महिलाएँ अपनी मेहनत, नवाचार और सामूहिक शक्ति से समुदायों को बदल रही हैं।
ये ग्रामीण महिला उद्यमी भले ही निवेशकों को प्रज़ेंटेशन न देती हों, लेकिन खेती, पशुपालन और खाद्य प्रणालियों में उनका उद्यम आत्मनिर्भरता और सतत विकास की नई परिभाषाएँ लिख रहा है। यहाँ कुछ प्रेरक कहानियाँ हैं, जो भारत में जमीनी स्तर पर चल रहे महिला नेतृत्व वाले उद्यमों की तस्वीर पेश करती हैं।
1. अनीता मूड़ी: सूखे की धरती पर उगाई समृद्धि
बांकुरा के दक्षिण कमलपुर गाँव की अनीता मूड़ी ने वर्षों तक फसल विफलता और मजबूरी में पलायन का सामना किया। 2020 में उन्होंने बंजर ज़मीन पर तरबूज़ की खेती का साहसिक कदम उठाया, जो उनके क्षेत्र में पहली बार हुआ।
2022 में PRADAN के साथ जुड़कर अनीता एक किसान से सामुदायिक नेतृत्वकर्ता बन गईं। उन्होंने महिलाओं को साथ लाकर एक फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी बनाई, जिससे सामूहिक विपणन, संसाधन साझा करने और सोलर सिंचाई जैसे टिकाऊ तरीकों को अपनाया गया।
तीन वर्षों में अनीता की आय ₹26,100 से बढ़कर ₹2.8 लाख हो गई — यानी 980% की वृद्धि। गाँव में तरबूज़ खेती का दायरा दस गुना बढ़ा और महिलाओं ने बैंक खातों के माध्यम से वित्तीय स्वतंत्रता हासिल की। अनीता का सफ़र दिखाता है कि सामूहिकता और जलवायु-स्मार्ट तरीकों से महिलाएँ पूरे समुदाय को बदल सकती हैं।
2. कांती उराँव: खाद्य असुरक्षा से आर्थिक स्वावलंबन तक
झारखंड के टेलिया गाँव की कांती उराँव कभी परिवार को दो वक़्त का खाना भी मुश्किल से दे पाती थीं। PRADAN के सहयोग से उन्होंने उन्नत खेती तकनीकें सीखीं और सब्ज़ी उत्पादन व पशुपालन को आजीविका का हिस्सा बनाया।
अब वे हर साल अतिरिक्त ₹60,000 कमा रही हैं। उन्होंने अपनी आय से सोलर सबमर्सिबल पंप, पावर टिलर खरीदा और ₹1 लाख बचत भी की। आज कांती एक बहु-आय स्रोत वाली उद्यमी हैं, जिन्होंने धान कुटाई मशीन खरीदकर गाँव के लिए मिलिंग सेंटर स्थापित करने की योजना बनाई है। यह कहानी बताती है कि जानकारी, बाज़ार और क्रेडिट मिलने से ग्रामीण महिलाएँ कितना आगे बढ़ सकती हैं।
3. सिया मरावी: जमीनी स्तर पर हरी क्रांति की अगुआ
मध्य प्रदेश के मंडला जिले की सिया मरावी नर्मदा जैविक खाद समिति का नेतृत्व करती हैं, जहाँ 10 महिलाओं की टीम बायो रिसोर्स सेंटर (BRC) चलाती है। वे द्रव जीवामृत, सुपर कम्पोस्ट और वर्मी कम्पोस्ट बनाकर किसानों को बेचती हैं, जिससे रासायनिक खाद का प्रयोग घट रहा है।
उनका सबसे बड़ा नवाचार है सोलर-ऑपरेटेड ऑटोमेटेड जीवामृत यूनिट, जो केवल चार दिनों में 2,000 लीटर जैविक इनपुट तैयार करती है। समूह अब तक 48 टन वर्मी कम्पोस्ट और 9,500 लीटर जीवामृत बेच चुका है। सिया की वजह से महिलाओं की आय बढ़ी है, बाज़ारों से सीधा जुड़ाव मिला है और समुदाय टिकाऊ खेती की ओर बढ़ रहा है।
4. ललिता महाता: एक जोड़ी बैलों से बदली पहचान
पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले की ललिता महाता गर्व से कहती हैं “मैं अपने पैसे से बैल खरीदने वाली गाँव की पहली महिला हूँ।”
वे रानीबांध महिला फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी का हिस्सा हैं, जहाँ महिलाओं को खेती संबंधी निर्णय लेने, बाज़ार भाव जानने और बिचौलियों के बिना सीधे बिक्री करने में मदद मिलती है। यह सिर्फ़ आर्थिक बदलाव नहीं था—पहली बार महिलाओं ने खेती के संसाधनों पर अपना नियंत्रण पाया। ललिता के बैल आज ग्रामीण महिलाओं की बढ़ती आर्थिक आज़ादी का प्रतीक हैं।
5. रेनू देवी: बकरियों से बदला सैकड़ों परिवारों का भविष्य
झारखंड की रेनू देवी, जो कभी टीकाकरण से बकरियों की मौत का डर रखती थीं, आज 35 पशु सखियों में से एक हैं। वे 2,000 से अधिक बकरीपालकों को टीकाकरण, कृमिनाशन और स्वास्थ्य सेवाएँ देती हैं।
उनकी सहायता से ललो उराँव जैसी महिलाओं की वार्षिक आय ₹1.1 लाख तक पहुँच गई है। रेनू जैसी महिला उद्यमी स्थानीय स्तर पर विशेषज्ञता और भरोसे की प्रणालियाँ खड़ी कर रही हैं, जो सच्चे अर्थों में ग्रामीण उद्यमिता है।
PRADAN जैसी संस्थाओं ने अब तक 8.25 लाख ग्रामीण परिवारों को स्थायी आय और महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों से जोड़कर नई ऊर्जा दी है। झारखंड, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में ग्रामीण महिलाएँ सीख रही हैं, नेतृत्व कर रही हैं और पारंपरिक आजीविकाओं को सफल उद्यमों में बदल रही हैं।
ये महिलाएँ दिखाती हैं कि उद्यमिता केवल स्टार्टअप्स और बोर्डरूम तक सीमित नहीं यह गाँवों, खेतों और समुदायों में भी उतनी ही जीवंत है।

