भुवनेश्वर। ओडिशा विकास कॉन्क्लेव (OVC) 2025 ने भारत की दीर्घकालिक जलवायु और विकास नीति को दिशा देने वाले सबसे प्रभावशाली बहु-हितधारक मंचों में अपनी पहचान मजबूती से स्थापित की। 26 और 27 नवंबर को भुवनेश्वर में आयोजित इस कॉन्क्लेव में 600 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिसमें नीति-निर्माताओं, सिविल सोसाइटी संगठनों, एनजीओ, निजी क्षेत्र के नेताओं, शिक्षाविदों, विशेषज्ञों, जमीनी संस्थाओं और विकास कार्यकर्ताओं ने एक साथ मिलकर विक्सित भारत 2047 के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने पर चर्चा की।
ओडिशा डेवलपमेंट इनिशिएटिव (ODI) द्वारा आयोजित और CYSD, विभिन्न नागरिक संगठनों, शैक्षणिक साझेदारों, निजी क्षेत्र और बहुपक्षीय एजेंसियों—विशेषकर UNFPA—के सहयोग से सम्पन्न इस दो-दिवसीय कार्यक्रम का केंद्र ओडिशा विज़न 2036 को मूर्त रूप देने पर रहा। पांच थीमेटिक स्तंभ—इकोसिस्टम संरक्षण, जस्ट ट्रांजिशन, लचीला शासन, संवेदनशीलता में कमी और सामाजिक नेतृत्व—के अंतर्गत 15 सत्रों में ऐसा रोडमैप तैयार किया गया जो ओडिशा को 2036 तक जन-केंद्रित, जलवायु-सुदृढ़ और समावेशी विकास के मार्ग पर अग्रसर करेगा, और जो स्वाभाविक रूप से भारत की 2047 की राष्ट्रीय आकांक्षाओं से मेल खाता है।
ओडिशा सरकार के मुख्य सचिव मनोज आहूजा ने कॉन्क्लेव की शुरुआत करते हुए साझा नेतृत्व की अपरिहार्यता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि “ओडिशा की विकास यात्रा तभी आगे बढ़ेगी जब विभिन्न क्षेत्रों में गहरा सहयोग स्थापित होगा। समुदाय-आधारित संगठन और समावेशी अकादमिक जुड़ाव वास्तविक परिवर्तन की धुरी हैं।” यह विचार कॉन्क्लेव के उस मूल उद्देश्य के अनुरूप है जिसमें विकेंद्रीकृत और सहभागितापूर्ण योजना निर्माण को सुदृढ़ करने पर बल दिया गया।
सीवाईएसडी के सह-संस्थापक डॉ. जगदानंद ने राज्य की जमीनी कमजोरियों को रेखांकित करते हुए कहा कि विकास के केंद्र में सबसे वंचित समुदायों को रखना अनिवार्य है। उन्होंने कहा, “एक गरीबी-मुक्त ओडिशा तभी संभव है जब हम अंतिम छोर तक पहुंचने वाली चुनौतियों का सामना करें। सबसे गरीब परिवारों की तकलीफों को पहचानना ही असली बदलाव की शुरुआत है।”
कॉन्क्लेव से उभरती प्रमुख अनुशंसाओं में मल्टी-एक्टर प्लेटफॉर्म (MAPs) की स्थापना को विशेष महत्व दिया गया—ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर ऐसे प्लेटफॉर्म विभिन्न विभागों और संस्थाओं को साझा प्रणालियों व साझा निर्णय-प्रक्रिया के ज़रिए जोड़ेंगे। वक्ताओं का स्पष्ट मत था कि सिलो आधारित कार्यशैली अब व्यावहारिक नहीं है; सामूहिक निर्णय-निर्माण ही प्रभावी शासन का भविष्य है।
कॉमन ग्राउंड इनिशिएटिव के डॉ. सिसिर के. प्रधान ने कहा कि ग्राम पंचायत स्तर पर जलवायु-आपदा आकलन, महिलाओं द्वारा संचालित उद्यम, ग्रीन टैक्सोनॉमी और शॉक-रेस्पॉन्सिव सामाजिक सुरक्षा—ये सभी 2047 के उभरते राष्ट्रीय विकास ढांचे के केंद्रीय तत्व हैं। प्रतिभागियों का सर्वसम्मत मत था कि राज्य और राष्ट्र दोनों की विकास आकांक्षाएं तभी पूरी होंगी जब साझी प्रणालियाँ, साझा संदेश और साझा कार्रवाई का ढांचा मजबूत होगा।
कॉन्क्लेव के विभिन्न सत्रों में इस बात पर गहन चर्चा हुई कि ओडिशा जैसे जलवायु-संवेदनशील राज्य के लिए जलवायु लचीलापन ही विकास का मूल आधार है, न कि कोई वैकल्पिक विकल्प। महिलाओं और युवाओं को आर्थिक विकास के “इंजन” के रूप में स्थापित करना, शहरी क्षेत्रों को सांस्कृतिक पहचान और जलवायु तैयारी के आधार पर पुनर्परिभाषित करना और हरित अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण में समुदायों को केंद्र में रखना—इन सभी बातों को व्यापक समर्थन मिला।
कॉन्क्लेव की सिफारिशों—जस्ट ट्रांजिशन, क्लाइमेट-स्मार्ट पब्लिक सर्विसेज, डिजिटल पब्लिक गुड्स, बेसिन-स्तरीय शासन, लचीले शहरी विकास और महिलाओं की आर्थिक नेतृत्वकारी भूमिका—ने राज्य और राष्ट्र दोनों के लिए एक सुसंगत मॉडल प्रस्तुत किया। इन निष्कर्षों ने दिखाया कि सबूत-आधारित शासन, जमीनी नेतृत्व और सहयोगात्मक ढांचे कैसे भारत के विकास की अगली निर्णायक यात्रा को गति दे सकते हैं और विक्सित भारत 2047 की दिशा में नया अध्याय लिख सकते हैं।

