वाराणसी/तमिलनाडु। काशी–तमिल संगमम 4.0 के अंतर्गत वाराणसी से आए विद्यार्थियों के एक दल ने तमिलनाडु की शैक्षणिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत को निकट से जानने का अनूठा अनुभव प्राप्त किया। इस शैक्षणिक–सांस्कृतिक यात्रा के दौरान छात्रों ने गणपति तुलसी जैन इंजीनियरिंग कॉलेज का भ्रमण किया, जहाँ ‘तमिल करकलम’ थीम के तहत आयोजित विशेष सत्रों में भाग लेकर तमिल भाषा, जीवनशैली और स्थानीय परंपराओं से परिचय किया।
कॉलेज परिसर में आयोजित तमिल भाषा शिक्षण सत्रों के माध्यम से छात्रों ने दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाले मूल तमिल शब्दों और वाक्यों को सीखा। भाषा के साथ-साथ उन्हें तमिल संस्कृति की जीवंत झलक भी देखने को मिली। क्षेत्रीय व्यंजनों का स्वाद चखते हुए छात्रों ने महसूस किया कि भाषा, भोजन और परंपरा किसी भी संस्कृति को गहराई से समझने का सशक्त माध्यम होते हैं।
इस सांस्कृतिक अनुभव को और समृद्ध बनाते हुए विद्यार्थियों ने तमिलनाडु की प्राचीन और पारंपरिक युद्धकला सिलंबम का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। लाठी आधारित इस मार्शल आर्ट ने छात्रों को आत्मरक्षा के साथ-साथ अनुशासन, संतुलन और आत्मविश्वास का पाठ पढ़ाया तथा तमिल शारीरिक विरासत से जोड़ा।
सिलंबम तमिलनाडु की एक प्राचीन हथियार-आधारित युद्धकला है, जिसमें मुख्य रूप से बांस की छड़ी (सिलंबम) का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा इसमें तलवार, खंजर और लचीली तलवार उरुमी जैसे हथियार भी शामिल हैं। संगम साहित्य में उल्लिखित इस युद्धकला को चोल, चेर और पांड्य शासकों का संरक्षण प्राप्त था। लयबद्ध गतियों, तेज फुटवर्क और मानसिक एकाग्रता के लिए प्रसिद्ध सिलंबम शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभकारी मानी जाती है।
काशी–तमिल संगमम 4.0 के तहत विद्यार्थियों का एक समूह भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास भी पहुँचा, जहाँ सीखने और मानसिक–शारीरिक कल्याण पर केंद्रित एक विशेष दिन आयोजित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत योग सत्र से हुई, जिससे छात्रों में ऊर्जा और एकाग्रता का संचार हुआ। इसके बाद सीआईसीटी (CICT) के संसाधन विशेषज्ञों द्वारा संचालित इंटरैक्टिव तमिल भाषा कक्षाओं में छात्रों ने गतिविधि-आधारित तरीकों से बोलचाल की तमिल सीखी।
यह संयुक्त शिक्षण वातावरण छात्रों में जिज्ञासा, सहभागिता और सांस्कृतिक आदान–प्रदान की भावना को प्रोत्साहित करता नजर आया, जो तमिल करकलम की मूल भावना को प्रतिबिंबित करता है।
यात्रा के अंतिम चरण में विद्यार्थियों ने पुडुचेरी के बोम्मयारपालयम समुद्र तट पर आयोजित सिलंबम सत्र में भाग लिया। खुले समुद्र तट की पृष्ठभूमि में हुआ यह अभ्यास तमिल शारीरिक परंपरा की ऊर्जा, अनुशासन और सौंदर्य का जीवंत अनुभव बन गया। यह सत्र केवल प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि परंपरा, प्रकृति और संस्कृति के संगम का सशक्त उदाहरण भी बना।
कुल मिलाकर, काशी–तमिल संगमम 4.0 के अंतर्गत यह पूरी यात्रा विद्यार्थियों के लिए भाषा, संस्कृति, आत्मरक्षा और जीवन मूल्यों को समझने का एक प्रेरक और जीवंत मंच सिद्ध हुई, जिसने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक सेतु को और अधिक मजबूत किया।

