Book Fair 2026 : हिंदी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं की पुस्तकों के भी हैं विश्व पुस्तक मेला 2026 में खरीदार

नई दिल्ली। विश्व पुस्तक मेला 2026 में केवल हिंदी ही नहीं, बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं की पुस्तकों के लिए भी पाठकों की उत्साहजनक भीड़ देखने को मिल रही है। भारत मंडपम के विभिन्न हॉलों में असमिया, उर्दू, पंजाबी, कन्नड़, उड़िया, गुजराती, तेलुगु, बांग्ला, मलयालम, सिंधी सहित अनेक भाषाओं के स्टॉल पाठकों को आकर्षित कर रहे हैं।

मेले में यह साफ नजर आ रहा है कि पाठक अपनी मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं में साहित्य, ज्ञान और शिक्षा से जुड़ी पुस्तकों को प्राथमिकता दे रहे हैं। युवाओं और बच्चों में खासतौर पर क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियों, बाल साहित्य और शैक्षणिक पुस्तकों को लेकर खासा उत्साह है। प्रकाशकों के अनुसार, डिजिटल युग के बावजूद प्रिंट में भारतीय भाषाओं की पुस्तकों की मांग लगातार बनी हुई है। कई स्टॉलों पर विज्ञान, इतिहास, संस्कृति और समकालीन विषयों पर भारतीय भाषाओं में प्रकाशित पुस्तकों को अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है।

इस बार मेले में युवाओं और बच्चों के बीच मातृभाषा की पुस्तकों को लेकर अप्रत्याशित उत्साह देखने को मिला। डिजिटल युग के बावजूद प्रिंट माध्यम में भारतीय भाषाओं की किताबों के प्रति बढ़ती रुचि इस बात का संकेत है कि पाठक अपनी जड़ों से जुड़ना चाहते हैं। ‘पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया’ की भावना भारतीय भाषाओं के माध्यम से और अधिक सशक्त होती नजर आ रही है।

हिंदी स्टॉलों पर केवल साहित्यिक कृतियाँ ही नहीं, बल्कि विज्ञान, तकनीक, अंतरराष्ट्रीय संबंध और कूटनीति से जुड़ी हिंदी पुस्तकों का भी खासा क्रेज दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ज्ञान के विविध क्षेत्रों में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की उपस्थिति बढ़ना एक सकारात्मक बदलाव है।

नई शिक्षा नीति के तहत मातृभाषा में शिक्षा पर दिए जा रहे जोर का असर भी इस पुस्तक मेले में साफ नजर आया। शैक्षणिक पुस्तकों के क्षेत्रीय भाषा संस्करणों की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली, जिससे प्रकाशकों में भी उत्साह है।

मेले में भाषाई विविधता की एक सुंदर तस्वीर उभरकर सामने आई है, जहाँ एक ही हॉल में 10–12 भारतीय भाषाओं के स्टॉल एक-दूसरे से सटे हुए हैं और पाठक सहज रूप से बहुभाषी अनुभव प्राप्त कर रहे हैं।

कुल मिलाकर, विश्व पुस्तक मेला 2026 यह साबित करता है कि किताबें केवल पढ़ने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे भाषा, संस्कृति और पहचान को सशक्त करने का भी सशक्त जरिया हैं।

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