नई दिल्ली। भारत में कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) अब केवल अनुपालन या खर्च तक सीमित नहीं रही है। आज सबसे बड़ा सवाल मंशा का नहीं, बल्कि स्पष्टता और तालमेल का है। भले ही कॉरपोरेट सामाजिक निवेश का पैमाना बढ़ा हो, लेकिन बिखरी हुई योजना, अलग-अलग स्तरों पर किया गया क्रियान्वयन और अल्पकालिक मापदंड, स्थायी और गहरे प्रभाव को सीमित कर देते हैं।
इसी संरचनात्मक चुनौती को संबोधित करते हुए हाउस ऑफ़ तर्क का औपचारिक शुभारंभ नई दिल्ली में किया गया। यह लॉन्च एक क्यूरेटेड, क्लोज़-डोर CSR लीडरशिप राउंडटेबल के माध्यम से हुआ, जिसमें कॉरपोरेट, सामाजिक और संस्थागत क्षेत्रों के वरिष्ठ नेताओं ने भाग लिया।
हाउस ऑफ़ तर्क को कॉरपोरेट सोशल रिटर्न्स के लिए एक एकीकृत ढांचे के रूप में विकसित किया गया है। इसके माध्यम से संस्थापक और यह पूरा इकोसिस्टम स्वयं को भारत के पहले कॉरपोरेट सोशल रिटर्न्स आर्किटेक्ट्स के रूप में स्थापित करता है; जहाँ रणनीति, कहानी और ज़मीनी क्रियान्वयन एक ही सुसंगत प्रणाली में जुड़े होते हैं। यह मॉडल न तो केवल सलाह देने तक सीमित है और न ही केवल क्रियान्वयन तक; बल्कि यह मंशा से लेकर प्रभाव तक निरंतरता सुनिश्चित करता है।
इस संरचना के तहत Tarq रणनीति और स्टोरीटेलिंग का दायित्व संभालता है, जहाँ संगठनों को CSR आर्किटेक्चर, गवर्नेंस डिज़ाइन और प्रभाव की कथा गढ़ने में सहयोग दिया जाता है। वहीं Tarq Foundation अपने सॉल्यूशंस वर्टिकल के माध्यम से कार्यक्रमों के ज़मीनी क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी निभाता है, ताकि रणनीति को मापनीय और ठोस परिणामों में बदला जा सके।
Tarq Foundation के सॉल्यूशंस वर्टिकल का केंद्र है उसका स्वामित्व वाला IMPACT फ्रेमवर्क, जो भारत की विकास यात्रा के लिए महत्वपूर्ण छह प्राथमिक क्षेत्रों में CSR कार्यक्रमों को संरचित करता है: इन्फ्रास्ट्रक्चर, मेडिकल एवं न्यूट्रिशन, जन-जागरूकता, शिक्षा तक पहुंच, जलवायु एवं पर्यावरण, और प्रशिक्षण व आजीविका। यह फ्रेमवर्क विविध CSR पोर्टफोलियो में स्पष्टता, गवर्नेंस और स्केलेबिलिटी सुनिश्चित करने के लिए तैयार किया गया है।
इसके साथ ही DYOP (डिज़ाइन योर ओन प्रोग्राम) फ्रेमवर्क कॉरपोरेट्स और भागीदारों को IMPACT थीम्स के अंतर्गत कस्टमाइज़्ड CSR हस्तक्षेप सह-निर्मित करने की सुविधा देता है; जहाँ स्थानीय संदर्भ की लचीलापन और संरचित क्रियान्वयन, निगरानी और जवाबदेही के बीच संतुलन बना रहता है।
हाउस ऑफ़ तर्क के सह-संस्थापक मनोविराज सिंह ने कहा, “CSR मंशा की कमी से नहीं, बल्कि तब लड़खड़ाता है जब सिस्टम आपस में संवाद नहीं करते। कॉरपोरेट सोशल रिटर्न्स के लिए ज़रूरी है कि ज़िम्मेदारी को एक स्पष्ट ढांचा दिया जाए, जहाँ रणनीति, गवर्नेंस और क्रियान्वयन एक साथ मिलकर ऐसे परिणाम दें जो केवल रिपोर्टिंग साइकिल तक सीमित न रहें।” सह-संस्थापक लक्षणा अस्थाना ने जोड़ा,
“जब कार्यक्रम, साझेदार और उनकी कहानियाँ अलग-अलग दिशाओं में चलती हैं, तो प्रभाव कमजोर पड़ जाता है। हाउस ऑफ़ तर्क को इसी उद्देश्य से बनाया गया है कि डिज़ाइन और डिलीवरी के बीच तालमेल हो, ताकि CSR निवेश विश्वसनीय और दीर्घकालिक सामाजिक रिटर्न्स में बदल सकें।”
लॉन्च का समापन भारत में CSR की बदलती भूमिका पर विचार-विमर्श के साथ हुआ, जिसने हाउस ऑफ़ तर्क को स्पष्टता, प्रभावी क्रियान्वयन और मापनीय सामाजिक रिटर्न्स पर केंद्रित एक दीर्घकालिक संस्थागत साझेदार के रूप में स्थापित किया।

