एलपीजी आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में सरकार का निर्णायक कदम

अनंत अमित

वैश्विक अस्थिरता और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े संकटों के बीच देश के नागरिकों को राहत और सुरक्षा प्रदान करना किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार द्वारा तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया कदम न केवल दूरदर्शिता का परिचायक है, बल्कि यह देश की ऊर्जा सुरक्षा के प्रति सरकार की गंभीरता को भी दर्शाता है।

यह कदम इसलिए उठाया गया है क्योंकि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण भारत को मिलने वाली तरलीकृत पेट्रोलियम गैस की आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावित होने से सऊदी अरब से आने वाली गैस आपूर्ति में भी रुकावट आई है। इसका असर देश के कई शहरों में दिखने लगा है, जहां कुछ होटलों और भोजनालयों को गैस की कमी के कारण अपनी रसोई अस्थायी रूप से बंद करनी पड़ी। इसके अलावा पिछले सप्ताह एलपीजी सिलेंडरों की कीमतों में की गई वृद्धि से लोगों की जेब पर भी बड़ा असर पड़ा है। इस संभावित संकट को देखते हुए भारत सरकार ने मार्च 2026 से आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के प्रावधानों को लागू करते हुए एलपीजी और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति व वितरण को नियंत्रित करने का निर्णय लिया है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी परिस्थिति में घरेलू उपभोक्ताओं और आवश्यक क्षेत्रों को गैस की कमी का सामना न करना पड़े।

सरकार के निर्देशों के अनुसार देश की सभी तेल रिफाइनरी कंपनियों को उपलब्ध प्रोपेन और ब्यूटेन से अधिकतम मात्रा में एलपीजी उत्पादन करने को कहा गया है। इसके साथ ही स्पष्ट कर दिया गया है कि इन गैसों का उपयोग पेट्रो-रसायन या अन्य औद्योगिक कार्यों में नहीं किया जाएगा। यह निर्णय इस बात का संकेत है कि मौजूदा परिस्थितियों में सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता आम नागरिकों के लिए रसोई गैस की उपलब्धता बनाए रखना है। सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 3 और 5 का उपयोग करते हुए तेल विपणन कंपनियों के लिए आपूर्ति से जुड़ी सीमाएं भी तय कर दी हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख कंपनियां भारतीय तेल निगम, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम निगम और भारत पेट्रोलियम निगम को निर्देश दिया गया है कि खरीदी गई तरलीकृत पेट्रोलियम गैस केवल घरेलू उपभोक्ताओं तक ही पहुंचाई जाए। इसके अलावा जमाखोरी रोकने के लिए गैस सिलेंडर की नई बुकिंग के बीच कम से कम 25 दिन का अंतराल अनिवार्य किया गया है।

सरकार ने प्राकृतिक गैस के वितरण को नियंत्रित करने के लिए प्राकृतिक गैस आपूर्ति विनियमन आदेश 2026 भी लागू किया है। इसके तहत घरेलू पाइप गैस, संपीडित प्राकृतिक गैस तथा उर्वरक कारखानों को गैस आवंटन में प्राथमिकता दी जाएगी। यह कदम कृषि और परिवहन क्षेत्र को प्रभावित होने से बचाने के लिए उठाया गया है। इसके तहत घरेलू पाइप गैस, संपीडित प्राकृतिक गैस (सीएनजी) और उर्वरक उद्योग को गैस आवंटन में प्राथमिकता दी जाएगी। यह कदम कृषि, परिवहन और शहरी जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण क्षेत्रों को संभावित संकट से बचाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

फिलहाल तेल कंपनियां आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में स्थित तरलीकृत पेट्रोलियम गैस भंडारण गुफा का उपयोग आयातित प्रोपेन और ब्यूटेन को सुरक्षित रखने के लिए कर रही हैं। इसके अलावा हिन्दुस्तान पेट्रोलियम निगम ने कर्नाटक के मंगलुरु में पिछले वर्ष देश की सबसे बड़ी भूमिगत चट्टानी गुफा आधारित गैस भंडारण परियोजना शुरू की थी। इस भंडारण केंद्र की क्षमता लगभग अस्सी हजार टन है और यह एक मौजूदा गैस संयंत्र परिसर के भीतर बनाया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार भूमिगत चट्टानी गुफाएं बड़ी मात्रा में गैस को सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल तरीके से संग्रहित करने का प्रभावी माध्यम हैं। इससे न केवल आपूर्ति व्यवस्था मजबूत होती है बल्कि परिवहन और वितरण की लागत भी कम हो सकती है। इससे भविष्य में आपूर्ति संकट की स्थिति में देश को बेहतर ढंग से तैयार रहने में भी मदद मिलेगी।

समग्र रूप से देखा जाए तो वैश्विक परिस्थितियों के बीच भारत सरकार द्वारा उठाए गए ये कदम समय की मांग के अनुरूप हैं। आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 का उपयोग, घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता और ऊर्जा भंडारण क्षमता में विस्तार जैसे उपाय न केवल वर्तमान संकट से निपटने में सहायक होंगे, बल्कि आने वाले समय में भारत की ऊर्जा सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, उद्योग और नागरिक—तीनों मिलकर ऊर्जा संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग की दिशा में आगे बढ़ें, ताकि देश की विकास यात्रा बिना किसी रुकावट के आगे बढ़ती रहे।


(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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